पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/५६

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शाप ७१ । 1 का एक समूह हरिद्वार चला। में भी उनके साथ हो ली। दीन दुखीजनों को दान देने के लिए रुपयों और अशर्फियों की थैलियों साथ ले ली। मैं प्रायश्चित्त करने जा रही थी, इसलिए पैदल ही यात्रा करने का निश्चय कर लिया । लगभग एक महीने में हरिद्वार जा पहुँची। यहाँ भारतवर्ष के प्रत्येक प्रात से असख्य यात्री श्राये हुए थे। संन्यासियों और तरस्थियों की संख्या गृहस्थों से कुछ ही कम होगी। धर्मशालों में रहने का स्थान न मिलता था। गंगातट पर, पर्वतों की गोद मे, मैदानों के वक्षःस्थल पर जहाँ देखिए आदमी ही आदमी नजर आते थे । दूर से वह छोटे-छोटे खिलौने की भाँति दिखायी देते थे। मीलों तक आदमियों का फर्श-सा बिछा हुआ था। भजन अोर कीर्तन की ध्वनि नित्य कानों में आती रहती थी। हृदय में असीम शुद्धि गगा की लहरों की भाँति लहरें मारती थी। वहाँ का जल, वायु, आकाश सब शुद्ध था मुझे हरिद्वार श्राये तीन दिन व्यतीत हुए थे। प्रभात का समय था । मैं गगा में ग्वदी स्नान कर रही थी। सहसा मेरी दृष्टि ऊपर की ओर उठो, तो मैंने किसी आदगी को पुल की अोर झाँकते देखा । अकस्मात् उस मनुष्य का पाँव उपर उठ गया और सैकड़ों गज की ऊँचाई से गगा में गिर पड़ा। सहसों ऑखें यह दृश्य देख रही थीं, पर किसी का साहस न हुआ कि उस अभागे मनुष्य की जान बचाये। भारतवर्ष के अतिरिक्त ऐसा सहवेदना शून्य अोर कौन देश होगा और यह वह देश है जहाँ परमार्थ मनुष्य के कर्त्तव्य बताया गया है । लोग बैठे हुए अपगुओं की भाँति तमाशा देख रहे थे । सभी हत्बुद्धि से हो रहे थे । धारा प्रबल वेग से प्रवाहित थी और जल बर्फ से भी अधिक शीतल । मैंने देखा कि वह धारा के साथ बहता चला जाता या । यह हृदय- विदारक दृश्य मुझसे न देखा गया । मैं तैरने में अभ्यस्त थी। मैंने ईश्वर का नाम लिया और मन को दृढ़ करके धारा के साथ तैरने लगी। ज्यों ज्यों में आगे बढ़ती थी वह मनुष्प मुझसे दूर होता जाता था। यहाँ तक कि मेरे सारे अंग ठंड से शून्य हो गये। मैंने कई वार चट्टानों को पकड़कर दम लिया कई बार पत्यरों से टकराई। मेरे हाय ही न उठते थे। सारा शरीर बर्फ का दाँचा-सा बना हुआ था। मेरे अंग ऐसे गतिहीन हो गये कि मैं धारा के साथ बहने लगी और मुझे विश्वास