पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/५८

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शाप ७३ न कहीं पाले हुए पशु ही दिखाई देते थे। द्वार पर धूल उड़ रही थी। जान पड़ता था कि पक्षी घोसले से उड़ गया है, कलेजे पर पत्थर की सिल रखकर भीतर गयी तो क्या देखती हूँ कि मेरा प्यारा सिंह आँगन में मोटी-मोटी जजोरों से बँधा हुश्रा है । इतना दुर्वल हो गया है कि उसके कूल्हों की हड्डियाँ दिखाई । दे रही हैं। ऊपर-नीन्ने जिवर देखती थी, उजाड़-सा मालूम होता था। मुझे देखते ही शेरसिंह ने पूँछ हिलाई और सहसा उनकी आँखें दीपक की भाँति चमक उठीं। मैं दौड़कर उनके गले से लिपट गयी, समझ गयी कि नौकरों ने दगो की । घर की सामगियों का कहीं पता न था। सोने-चांदी के बहुमूल्य पात्र फर्श आदि सब गायब थे। हाय ! हत्यारे मेरे आभूषणों का संदूक भी उठा ले गये । इस अपहरण ने मुसीबत का प्याला भर दिया। शायद पहले उन्होंने शेरसिंह को जकड़कर बाँध दिया होगा, फिर खूब दिल खोलकर नोच-खसोट की होगी । कैसी विडम्बना थी कि धर्म लूटने गयी थी और धन लुटा बैठी। दरिद्रता ने पहली बार अपना भयकर रूप दिखाया। ऐ मुसाफिर, इस प्रकार लुट जाने के बाद वह स्थान आँखों मे कोटे की तरह खटकने लगा। यही वह स्थान था, जहाँ हमने अानन्द के दिन काटे थे। इन्हीं क्यारियों में हमने मृगों की भाँति कलोल किये थे। प्रत्येक वस्तु से कोई न-कोई स्मृति सम्बन्धित थी। उन दिनों को याद करके आँखो से रक्त के श्रोसू वहने लगते थे । वसन्त की ऋतु थी, और की महक से वायु सुगन्धित हो रही थी। महुए के वृक्षो के नीचे परियों के शयन करने के लिए मोतियों की शय्या बिछी हुई थी, करौदों और नीबू के फूलों की सुगन्धि से चित्त प्रसन्न हो जाना था। मैंने अपनी जन्म भूमि को सदैव के लिए त्याग दिया । मेरी आँखों से ओसुओं की एक बूंद भी न गिरी। जिस जन्मभूमि की याद यावजीवन हृदय को व्यथित करती रहती है, उससे मैंने यो मुँह मोड़ लिया मानो कोई बन्दी कारागार से मुक्त हो जाय । एक सप्ताह तक मैं चारों ओर भ्रमण करके अपने भावी निवासस्थान का निश्चय करती रही। अन्त में सिन्धु नदी के किनारे एक निर्जन स्थान मुझे पसन्द आया । यहाँ एक प्राचीन मन्दिर था। शायद किसी समय में वहाँ देवताओं का वास था; पर इस समय वह विल्कुल उजाइ था । देवताओं ने काल को विजय किया हो; पर समम-