पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/८९

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मानसरोवर और इस काम के लिए तैयार होकर गये थे। वे निश्शक थे, इस कारण उनकी हार हुई । यदि हम वहाँ से शीघ्र ही प्राण बचाकर भाग न आते तो हमारी गति वही होती जो रावसाहब ने कही थी। एक भी चित्तौड़ी न बचता। लेकिन ईश्वर के लिए यह मत सोचो कि मैं अपने अपराध के दूपण को मिटाना चाहता हूँ। नहीं, मुझसे अपराध हुआ और मैं हृदय से उस पर लज्जित हूँ। पर अब तो जो कुछ होना था, हो चुका। अब इस बिगड़े हुए खेल को मैं तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ। यदि मुझे तुम्हारे हृदय मे कोई स्थान मिले तो मैं उसे स्वर्ग सममूंगा। डूबते हुए को तिनके का सहारा भी बहुत है। क्या यह संभव है " प्रभा बोली-नहीं। राणा-झालावाड़ जाना चाहती हो? प्रमा-नहीं। राणा-मन्दार के राजकुमार के पास मेज हूँ ? प्रमा-कदापि नहीं। राणा-लेकिन मुझसे यह तुम्हारा कुढ़ना देखा नहीं जाता। प्रमा--आप इस कष्ट से शीघ्र ही मुक्त हो जायेंगे | राणा ने भयभीत दृष्टि से देखकर कहा-'जैसी तुम्हारी इच्छा" और वे वहाँ से उठकर चले गये दस बजे रात का समय था। रणछोड़जा के मन्दिर में कीर्तन समाप्त हो चुका था और वैष्णव साधु वैठे हुए प्रसाद पा रहे थे। मीरा स्वय अपने हाथों से थाल ला-लाकर उनके आगे रखती थी। साधुओं और अभ्यागतों क आदर- सत्कार मे उस देवी को आत्मिक आनन्द होता था । साधुगण जिस प्रेम से भोजन करते थे, उससे यह शका होती थी कि स्वादपूर्ण वस्तुओं मे कहीं भक्ति भजन से भी अधिक सुख तो नहीं है। यह सिद्ध हो चुका है कि ईश्वर की दी हुई वस्तुओं का सदुपयोग ही ईश्वरोपासना की मुख्य राति है। इसलिए ये महात्मा लोग उपासना के ऐसे अच्छे अवसरों को क्यों खोते ? वे कभी पेट पर हाथ फेरते और कभी श्रासन बदलते थे। मुँह से 'नहीं' कहना तो वे घोर ।