पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/९१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


१०८ मानसरोवर राजकुमार-वह नियम उस अवस्था के लिए है जब दोनों पक्ष समान शक्ति रखते हों। मीरा-ऐसा नहीं हो सकता । राजकुमार-आपने वचन दिया है, उसका पालन करना होगा। मीरा-महराज की आज्ञा के सामने मेरे वचन का कोई महत्व नहीं । राजकुमार-मैं यह कुछ नहीं जानता । यदि आपको अपने वचन की कुछ भी मर्यादा रखनी है तो उसे पूरा कीजिए । मीरा-(सोचकर ) महल में जाकर क्या करोगे? राजकुमार नयी रानी से दो दो बातें। मीरा चिन्ता में विलीन हो गयी । एक तरफ राणा की कड़ी आज्ञा यी और दूसरी तरफ़ अपना वचन और उसका पालन करने का परिणाम । कितनी ही पौराणिक घटनाएँ उसके सामने आ रही थीं। दशरथ ने वचन पालने के लिए अपने प्रिय पुत्र को वनवास दे दिया । मैं वचन दे चुकी हूँ। उसे पूरा करना मेरा परम धर्म है । लेकिन पति की श्राज्ञा को कैसे तो..? यदि उनकी आशा के विरुद्ध करती लोक और परलोक दोनों बिगड़ते हैं। क्यों न उनसे स्पष्ट कह दूँ । क्या वह यह मेरी प्रार्थना स्वीकार न करेंगे ? मैंने आज तक उनसे कुछ नहीं माँगा । आज उनसे यह दान माँगूंगी। क्या वे मेरे वचन की मर्यादा की रक्षा न करेंगे ? उनका हृदय कितना विशाल है ! निस्सदेह वे मुझ पर वचन तोड़ने का दोष न लगाने देंगे। इस तरह मन में निश्चय कर के वह बोली-कब खोल दूँ ? राजकुमार ने उछलकर कहा-आधी रात को । मीरा-मैं स्वयं तुम्हारे साथ चलूंगी। राजकुमार-क्यों ? मीरा-तुमने मेरे साथ छल किया है। मुझे तुम्हारा विश्वास नहीं है। राजकुमार ने लजित होकर कहा-अच्छा, तो आप द्वार पर खड़ी रहिएगा। मीरा-यदि फिर कोई दगा किया तो जान से हाथ धोना पड़ेगा । राजकुमार-मैं सब कुछ सहने के लिए तैयार हूँ। 1