पृष्ठ:मानसरोवर भाग 6.djvu/९३

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११० मानमरोवर प दिन यहाँ और रहना पड़ा तो वह जीती न बचेगी। मुझ पर एक अबला के हत्या का अपराध लग जायगा । मैंने उससे झालावाड़ जाने के लिए कहा, वह राजी न हुई । आज तुम उन दोनों की बातें सुनो । अगर वह मन्दार-कुमा के साथ जाने पर राजी हो, तो प्रसन्नता-पूर्वक अनुमति दे दूँगा। मुझसे कुढ़न नहीं देखा जाता। ईश्वर इस सुन्दरी का हृदय मेरी ओर फेर देता तो मेर जीवन सफल हो जाता । किन्तु जब यह सुख भाग्य में लिखा ही नहीं है, ह क्या वश है । मैंने तु से ये बातें कहीं, इसके लिए मुझे क्षमा करना । तुम्हा पवित्र हृदय ऐसे विषयों के लिए स्थान कहाँ ? मीरा ने आकाश की ओर सकोच से देखकर कहा--तो मुझे आशा है में चोर-द्वार खोल दूँ ? राणा-तुम इस घर की स्वामी हो, मुझसे पूछने की जरूरत नहीं । मीरा राणा को प्रणाम कर चली गयी। आधी रात बीत चुकी थी। प्रभा चुपचाप बैठी दीपक को ओर देख रह थी और सोचती थी, इसके घुलने से प्रकाश होता है , यह बत्ती अगर जलत है तो दूसरों को लाभ पहुँचाती है । मेरे जलने से किसी को क्या लाभ ? मैं क्य घुलूँ ? मेरे जीने की क्या जरूरत है ? उसने फिर खिड़की से सिर निकालकर श्राकाश की तरफ देखा । काले पट पर उज्ज्वल तारे जगमगा रहे थे । प्रभा ने सोचा, मेरे अन्धकारमय भाग्य में ये दीप्तिमान तारे कहाँ हैं ? मेरे लिए जीवन के सुख कहाँ हैं ? क्या रोने के लिए जीऊँ ? ऐसे जीने से क्या लाभ ? और जीने में उपहास भी तो है। मेरे मन का हाल कौन जानता है ? ससार मेरी निन्दा करता होगा । झालावाड़ की स्त्रियो मेरी मृत्यु के शुभ समाचार सुनने की प्रतीक्षा कर रही होगी। मेरी प्रिय माता लबा से आँखें न उठा सकती होगी। लेकिन जिस समय मेरे मरने की स्वबर मिलेगी, गर्व मे उनका मत्तक उँचा हो जायगा। यह वेहयाई का जीना है । ऐसे जीने से मरना कहीं उत्तम है। प्रभा ने तकिये के नीचे से एक चमकती हुई कटार निकाली। उसके हाथ फॉप रहे थे। उसने कटार की तरफ़ आँखें जमाई। हृदय को उसके अभिवादन