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पृष्ठ:मुद्राराक्षस नाटक.djvu/१०१

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मुद्रा-राक्षस

कारन अकारन सोचि फैली क्रियन कों सकुचावहीं।
जे करहिं नाटक बहुत दुख हम सरिस तेऊ पावहीं॥

और भी वह दुष्ट ब्राह्मण चाणक्य---

दौवारिक---जय जय।

राक्षस---किसी भाँति मिलाया या पकड़ा जा सकता है?

दौवारिक---अमात्य---

राक्षस---(बॉए नेत्र के फड़कने का अपशकुन देख कर आप ही आप) 'ब्राह्मण चाणक्य जय जय' और पकड़ा जा सकता है 'आमात्य' यह उलटी बात हुई और उसी समय असगुन भी हुआ। तौ भी क्या हुआ, उद्यम नहीं छोड़ेंगे। (प्रकाश) भद्र! क्या कहता है?

दौवारिक---अमात्य! पटने से करभक आया है सो आप से मिला चाहता है।

राक्षस---अभी लाओ।

दौवारिक---जो आज्ञा (करभक के पास जाकर, उसको संग ले आकर) भद्र! मन्त्री जी वह बैठे है, उधर जाओ (जाता है)।

करभक---(मन्त्री को देखकर) जय हो, जय हो।

राक्षस---अजी करभक! आओ, आओ, अच्छे हो?---बैठो।

करभक---जो आज्ञा (पृथ्वी पर बैठ जाता है)।

राक्षस---(आप ही आप) अरे! मैंने इसको किस काम का भेद लेने को भेजा था यह भूला जाता है (चिन्ता करता है) (बेत हाथ में लेकर एक पुरुष अाता है)

पुरुष---हटे रहना---बचे रहना---अजी दूर रहो---दूर रहो क्या नहीं देखते?