पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/३३८

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[३०]

चलते-चलते संध्या हो गई। पहाड़ों की संध्या मैदान की रातों से कहीं भयानक होती है। तीनों आदमी चले जाते थे; किंतु अभी ठिकाने का पता न था। पहाड़ियों के साये लम्बे हो गये। सूर्य डूबने से पहले ही दिन डूब गपा। रास्ता न सुझाई देता था। दोनों आदमी बार-बार इंद्रदत्त से पूछते, अब कितनी दूर है, पर यही जवाब मिलता कि चले आओ, अब पहुँचे जाते हैं। यहाँ तक कि विनयसिंह ने एक बार झुंझलाकर कहा-"इंद्रदत्त, अगर तुम हमारे खून के प्यासे हो, तो साफ-साफ क्यों नहीं कहते? इस भाँति कुढ़ा-कुढ़ाकर क्यों मारते हो!" इंद्रदत्त ने इसका भी वही जवाब दिया कि चले आओ, अब दूर नहीं है; हाँ, जरा सर्तक रहना, रास्ता दुर्गम है।

विनय को अब बार-बार पछतावा हो रहा था कि इंद्रदत्त के साथ क्यों आया, क्यों न पहले उसके हाथों सोफिया को एक पत्र भेज दिया! पत्र का उत्तर मिलने पर जब सोफिया की लिपि पहचान लेता, तो निश्चित होकर इधर आता। सोफी इतनी वज्रहृदया तो है नहीं कि पत्र का उत्तर ही न देती। यह उतावली करने में मुझसे बड़ी भूल हुई। इंद्रदत्त की नीयत अच्छी नहीं मालूम होती। इन शंकाओं से उसका मार्ग और कठिन हो रहा था। लोग ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते थे, रास्ता बीहड़ ओर विषम होता जाता था। कभी टीलों पर चढ़ना पड़ता और कभी इतना नीचे उतरना पड़ता कि मालूम होता, रसातल को चले जा रहे हैं। कभी दायें-बायें गहरे खड्डों के बीच में एक पतलोसी पगडंडी मिल जाती। आँखें बिलकुल काम न देती थीं, केवल अटकल का सहारा था, जो वास्तव में अंतष्टि है। विनय पिस्तौल चढ़ाये हुए थे, मन में निश्चय कर लिया था कि जरा भी कोई शंका हुई, तो पहला वार इंद्रदत्त पर करूँगा।

सहसा इंद्रदत्त रुक गये और बोले-"लीजिए, आ गये। बस, आप लोग यहीं ठहरिए, मैं जाकर उन लोगों को सूचना दे दूं।"

विनय ने चकित होकर पूछा-“यहाँ पर तो कोई नजर नहीं आता, बस सामने एक वृक्ष है।"

इंद्रदत्त-"राजद्रोहियों के लिए ऐसे ही गुप्त स्थानों की जरूरत होती है, जहाँ यमराज के दूत भी न पहुँच सकें।"

विनय-"भई, यों अकेले छोड़कर मत जाओ। क्यों न यहीं से आवाज दो १ या चलो, मैं भी चलता हूँ।"

इंद्रदत्त-“यहाँ से तो शायद शंख की ध्वनि भी न पहुँचे, और दूसरों को ले चलने का मुझे अधिकार नहीं; क्योंकि घर मेरा नहीं है और दूसरों के घर मैं आपको कोकर ले जा सकता हूँ? इन गरीबों के पास यहाँ कोई सेना या दुर्ग नहीं, केवल मार्ग को दुर्गमता ही उनकी रक्षा करती है। मुझे देर न लगेगी।"