पृष्ठ:रंगभूमि.djvu/८२

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[७]

संध्या हो गई थी। किंतु फागुन लगने पर भी सरदी के मारे हाथ-पाँव अकड़ते थे। ठंडी हवा के झोंके शरीर की हड्डियों में चुभे जाते थे। जाड़ा, इंद्र की मदद पाकर, फिर अपनी बिखरी हुई शक्तियों का संचय कर रहा था, और प्राण-पण से समय-चक्र को पलट देना चाहता था। बादल भी थे, बूंदें भी थीं, ठंडी हवा भी थी, कुहरा भी था। इतनी विभिन्न शक्तियों के मुकाबिले में ऋतुराज की एक न चलती थी। लोग लिहाफ में यों मुँह छिपाये हुए थे, जैसे चूहे बिलों में से झाँकते हैं। दूकानदार अँगीठियों के सामने बैठे हाथ सेंकते थे। पैसों के सौदे नहीं, मुरौवत के सौदे बेचते थे। राह चलते लोग अलाव पर यों गिरते थे, मानों दीपक पर पतंग गिरते हों। बड़े घरों की स्त्रियाँ मनाती थीं-“मिसराइन न आये, तो आज भोजन बनायें, चूल्हे के सामने बैठने का अवसर मिले।" चाय की दुकानों पर जमघट रहता था। ठाकुरदीन के पान छबड़ी में पड़े सड़ रहे थे; पर उसकी हिम्मत न पड़ती थी कि उन्हें फेरे। सूरदास अपनी जगह पर तो आ बैठा था; पर इधर-उधर से सूखी टहनियाँ बटोरकर जला ली थीं, और हाथ सेंक रहा था। सवारियाँ आज कहाँ! हाँ, कोई इक्का-दुक्का मुसाफिर निकल जाता था, तो बैठे-बैठे उसका कल्याण मना लेता था। जब से सैयद ताहिरअली ने उसे धमकियाँ दी थीं, जमीन के निकल जाने की शंका उसके हृदय पर छाई रहती थी। सोचता-क्या इसी दिन के लिए मैंने इस जमीन का इतना जतन किया था? मेरे दिन सदा यों ही थोड़े ही रहेंगे कभी तो लच्छमी प्रसन्न होंगी। अंधों की आँखें न खुले; पर भाग तो खुल सकता है। कौन जाने, कोई दानी मिल जाय, या मेरे ही हाथ में धीरे-धीरे कुछ रुपये इकट्ठे हो जाय। बनते देर नहीं लगती। यही अभिलाषा थी कि यहीं एक कुओं और एक छोटा-सा मंदिर बनवा देता, मरने के पीछे अपनी कुछ निसानी रहती। नहीं तो कौन जानेगा कौन था। पिसनहारी ने कुओं खुदवाया था, आज तक उसका नाम चला जाता है। झक्कड़ साई ने बावली बनवाई थी, आज तक झक्कड़ की बावली मशहूर है। जमीन निकल गई, तो नाम डूब जायगा। कुछ रुपये मिले भी, तो किस काम के?

नायकराम उसे ढाढ़स देता रहता था-"तुम कुछ चिंता मत करो, कौन माँ का बेटा है, जो मेरे रहते तुम्हारी जमीन निकाल ले! लहू की नदी बहा दूँगा। उस किरंटे की क्या मजाल, गोदाम में आग लगा दूँगा, इधर का रास्ता छुड़ा दूँगा। वह है किस गुमान मे, बस तुम हामी न भरना।” किंतु इन शब्दों से जो तत्कोन हाती थो, वह भैरो और जगधर की ईर्ष्या-पूर्ण वितंडाओं से मिट जाती थी, और वह एक लंबी साँस खींच-कर रह जाता था।

वह इन्हीं विचारों में मग्न था कि नायकराम कंधे पर लट्ठ रखे, एक अंगोछा कंधे पर डाले, पान के बीड़े मुँह में भरे, आकर खड़ा हो गया और बोला-"सूरदास,