पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२१०

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२१५ विनय-पत्रिका जपि नाम करहि प्रनाम कहि गुन-ग्राम, रामहि धरिहिये। विचरहि अवनि अवनीस-चरनसरोजमन मधुकर किये ॥ ५॥ ' भावार्थ-अरे, जिन्होंने तुझे देव-दुर्लभ मनुष्य-शरीर दिया उन परम प्रेमी श्रीरामजीके साथ तूने प्रेम नहीं किया । उन्होंने ऐसे अच्छे कुलमें जन्म और सुन्दर शरीर दिया है, जो अर्थ, धर्म, काम और मोक्षका कारण है। जिसे पाकर ज्ञानी लोग भगवान् शिव अथवा कृष्णके* परमपदको प्राप्त करते हैं । फिर यह भारतवर्ष देश, पास ही देवनदी गङ्गाजी, कैसा सुन्दर स्थान है। साथ ही सत्सङ्ग भी उत्तम है। इतनेपर भी अरे कायर ! तेरी कुबुद्धिके कारण इन सब साधनोंकी कल्पलता भी (जन्ममरणरूपी) विषैले फल फला चाहती है ! अर्थात् इतने सुन्दर साधनोंको पाकर भी तू अपने बुद्धिदोषसे इनका दुरुपयोग ही कर रहा है ॥ १॥ अब भी समझ ले। मन लगाकर परमार्थकी बात सुन । वह वात कल्याण करनेवाली है और इस संसारमें भी उससे अपना खार्थ सिद्ध होता है। यदि तुझे खार्थ ही अच्छा लगता है, विचार कर, वह कौन है जिससे खार्थ प्राप्त होगा, और जिसे वेद गाते हैं ( अर्थात् श्रीरामजी ही हैं )। अरे दुष्ट ! देख, (विषयरूपी ) सॉपके साथ खेलना छोड़ दे, उस खामीको पहचान, जिस (सबमें रमनेवाले आत्मारूपी राम ) के प्रेमके कारण ही पिता, गुरु, खामी, शरीर, पुत्र, सेवक, मित्र आदि सब प्रिय जान पड़ते हैं, उस अहैतुक हित करनेवाले परम सुहृद् प्रभुको तूने नहीं पहचाना ।। २ ।। वह तेरा हितकारी प्रभु हरि दूर • इससे यह सिद्ध है कि गोसाईजी भगवान् शिव, कृष्ण और राममें कोई भेद नहीं मानते थे।