पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२३८

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२४३ विनय-पत्रिका सिवा यह दुःख और सुनाता भी किसे, क्योंकि ) देवता तो खार्थी, असमर्थ, अयोग्य और निष्ठुर हैं। उनके चित्तमें तो दया नहीं है। मैं कहाँ जाऊँ ? ( तुम्हारे सिवा ) कौन विपत्ति दूर करनेवाला है ? कौन इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाला है ? ॥ ६॥ तुलसी यद्यपि नीच है, पर है तो तुम्हारा ही, और किसीका गुलाम तो नहीं है। अपना जानकर एक बार भक्तिरूपी बॉह दे दो, जिससे यह (तुम्हारे नामका ) गाँव अच्छी तरह आबाद हो जाय । अर्थात् हृदयमें तुम्हारी भक्तिके प्रतापसे भजन, ज्ञान, वैराग्यका विकास होकर काम- क्रोधादिका नाश हो जाय ॥ ७ ॥ [ १४६] हौं सव विधि राम, रावरो चाहत भयो चेरो। ठोर ठौर साहवी होत है, स्याल काल कलि केरो॥१॥ काल-करम-इंद्रिय-विषय गाहकगन घेरो। ही न कबूलतः बाँधि के मोल करत करेरो ॥२॥ बंदि-छोर तेरो नाम है, विरुदैत बड़ेरो। मैं कहो, तव छल-प्रीति कै माँगे उर डेरो॥३॥ नाम-ओट अब लगि बच्यो मलजुग जग जेरो। अब गरीव जन पोषिये पाइवो न हेरो॥४॥ जेहि कौतुकवक खानको प्रभु न्याव निवेरो। तेहि कौतुक कहिये कृपालु ! 'तुलसी है मेरो ॥५॥ ____भावार्थ-हे रामजी ! मैं सब प्रकार आपका दास बनना चाहता हूँ पर यहाँ तो जगह-जगह साहबी हो रही है । भाव यह कि मन और इन्द्रियाँ सभी मेरे मालिक बन बैठे हैं। यह सब कलिकालके