पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/२९४

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विनय-पत्रिका दूसरोंको यह कहकर समझाता फिरता हूँ, कि 'देखो, संसाररूपी नदीके पार जाने के लिये सतजन ही नौका हैं—किन्तु हे हरे ! — मैं (खयं ) उनसे बड़ी भारी शत्रुता करके आपसे अपना कल्याण चाहता हूँ ॥५॥ (पर ऐसा होनेपर भी कहाँ जाऊँ) मुझे और कहीं ठौर-ठिकाना नहीं है, इसीसे ( नालायक होता हुआ भी) आपसे जबरदस्ती सम्बन्ध जोड़ता फिरता हूँ। हे दाताओंमें शिरोमणि रघुनाथ ! यह तुलसीदास आपके गुण गा रहा है, (भलाई-बुराईकी ओर न देखकर अपने दयालु खभावसे ही ) इसको अपना लीजिये ॥६॥ [१८६ ] कौन जतन विनती करिये। निज आचरन विचारि हारि हिय मानि जानि डरिये ॥१॥ जेहि साधन हरि ! वहु जानि जन सो हठि परिहरिये । जाते विपति जाल निसिदिन दुख, तेहि पथ अनुसरिये ॥२॥ जानत हूँ मन वचन करम पर-हित कीन्हें तरिये। सो विपरीत देखि पर-सुख, विनु कारन ही जरिये ॥३॥ श्रुति पुरान सवको मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिये। निज, अभिमान मोह इरिषा वस तिनहिं न आदरिये ॥४॥ संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जाते भवनिधि परिये । कही अव नाथ, कौन बलते संसार-सोग हरिये ॥५॥ जव कव निज करुना सुभावते, द्रवह तो निस्तरिये। तुलसिदास विस्वास आन नहि, कत पचि-पचि मरिये ॥६॥ भावार्थ-हे नाथ ! मैं किस प्रकार आपकी विनती करूँ? जब अपने (नीच ) आचरणोंपर विचार करता हूँ, और समझता हूँ, तब