पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/४५०

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· परिशिष्ट शापसे गोकुलमें अर्जुन वृक्ष बन गये । एक दिन यशोदाजीने किसी अपराधके कारण बालक श्रीकृष्णको ऊखलसे बॉध दिया । भगवान् रेगते हुए, जुड़े हुए वृक्षोंके पास जा पहुंचे और वृक्षोको, बीचमें ऊखलको अड़ाकर ऐसा झटका दिया कि तुरंत दोनों वृक्ष गिर पड़े और वृक्ष-रूप त्यागकर दिव्य यक्षरूपसे भगवान्की स्तुति करने लगे। भगवान्ने उन्हे मुक्ति प्रदान कर दी। ८३-तरयोगयंद जाके एक नॉय-- एक बार एक तालाबमें एक बड़ा भारी मतवाला हाथी हथिनियोंके साथ जल-विहार कर रहा था । इतनेमें एक ग्राहने आकर उसका पैर पकड़ लिया । हाथीने अपने पैरको छुड़ानेके लिये सारी शक्ति लगा दी पर ग्राहने पैर न छोडा, न छोड़ा। वह उसे गहरे जलमें खींचने लगा। जब वह हाथी निराश हो गया तो उसने आर्त्तभावसे भगवानको पुकारा । उसके मुंहसे 'हरि' नाम निकालना था कि भक्त-भयहारी प्रभु अपने वाहन गरुड़को छोडकर शीघ्र वहाँ उपस्थित हो गये और उन्होंने ग्राहको मारकर उस हाथीके दु.खको दूर किया । श्रीमद्भागवतके आठवेंस्कन्धमें यह कथा 'गजेन्द्रमोक्ष'नामसे विस्तारपूर्वक लिखी गयी है। ८६-सुरुचि- राजा उत्तानपादकी दो रानियाँ थीं-सुरुचि और सुनीति । राजा सुरुचिको ही अधिक मानते थे। दोनों रानियोंके दो पुत्र थे। एक दिन सुनीतिका पुत्र ध्रुव सुरुचिके लड़केके सामने राजाकी गोदमें जा बैठा । सुरुचिसे यह देखा न गया । वह दौड़ी आयी और उसको