पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/६५

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विनय-पत्रिका ६६ ____ भावार्थ-लक्ष्मणजीकी जय हो, जो अनन्त, छः प्रकारके ऐश्वर्यसे युक्त, पृथ्वीको धारण करनेवाले सर्पराज शेषनागके अवतार, सारे ससारके खामी, पृथ्वीके भारको दूर करनेवाले, क्रोधके समय प्रलय-कालकी अग्निके समान भयकर ज्वालाएँ उगलनेवाले, जगत्के सन्तापको नाश करनेवाले और अपनी लीलासे ही अवतार धारण करनेवाले हैं॥१॥ दशरथ-पुत्र श्रीलक्ष्मणजीकी जय हो, जो संग्राममें सर्वशक्तिमान्, सुमित्राजीके पुत्र, शत्रुओंका नाश करनेवाले और श्रीरामजी तथा भरतजीके प्यारे भाई हैं। जिनके सुन्दर शरीरका रंग चम्पेके फूलके समान है, जो अत्यन्त दिव्य एवं भव्य वस्त्र और आभूषण धारण किये हैं और सौन्दर्यके महान् समुद्र हैं ॥ २ ॥ विश्वामित्र, गौतम और जनकको सुख उत्पन्न करनेवाले, संसारके लिये करोडों कॉटेके समान कुटिल राक्षसोंको मारनेवाले, चतुराईकी बहुत-सी बातोंसे ही परशुरामजीका गर्व हरनेवाले और सदा श्रीराम- जीके पीछे-पीछे चलनेवाले लक्ष्मणजीकी जय हो ॥ ३ ॥ सीतापति श्रीरामजीकी सेवामें परम अनुरागी, विषय-रसके विरागी, कपट-रहित होकर श्रीराम-सेवारूपी धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, अनन्त वलके आदिस्थान, सिंहके समान पराक्रमवाले, मेघनादका मर्दन करनेवाले अत्यन्त महावीर लक्ष्मणजीकी जय हो ॥ ४॥ भयानक संग्रामरूपी समुद्रको अनायास ही पार कर जानेवाले, श्रीरामजीके हितके लिये अपनी सुन्दर भुजाओंका पुल बनानेवाले, उर्मिलाजीके पति, कल्याण तथा मंगलके स्थान और तुलसीदासके पापोंके नाश करनेमे मुख्य कारण, ऐसे श्रीलक्ष्मणजीकी जय हो ॥ ५॥