पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/६९

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विनय-पत्रिका हैं ॥१॥ जिनके सारे अङ्ग सुन्दर हैं, जो सुमित्राजीके पुत्र और विश्व-विख्यात भरतजीकी आज्ञामें चलनेवाले हैं, जो कवच, ढाल, तलवार, धनुष, बाण और तरकस धारण किये हैं और शत्रुओंद्वारा दिये हुए संकटोंका नाश करनेवाले हैं, उन शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥ लवणासुररूपी समुद्रको पान करनेके लिये अगस्त्यके समान, बड़े-बड़े दुष्ट दानवोंका संहार करनेवाले और पापोंका नाश करनेवाले शत्रुघ्नजीकी जय हो । ये लक्ष्मणजीके छोटे भाई हैं और भरतजी, श्रीरामजी तथा सीताजीके चरणकमलोंकी रजका मस्तकपर सुन्दर तिलक धारण करनेवाले हैं ॥ ३ ॥ श्रुतिकीर्तिजीके पति हैं, दुष्टोंको दुर्लभ और सेवकोंको सुलभ हैं, प्रणाम करते ही सुख, भोग और मुक्ति देनेवाले हैं, ऐसे शत्रुघ्नजीकी जय हो । हे प्रभो ! यह तुलसीदास तुम्हारे चरणोंकी शरण आकर भी दु.ख भोग रहा है, हे दीन और आतॊके संताप हरनेवाले ! उसकी (तुलसीदासकी ) रक्षा करो ॥ ४ ॥ श्रीसीता-स्तुति* राग केदारा [४१] कबहुँक अंव, अवसर पाइ। मेरिनो सुधि द्याइवी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥ १॥

  • कई पुरानी प्रतियों में श्रीसीता-स्तुति-प्रसगमें नीचे लिखा दण्डक

भी मिलता है । इसे ४० क सख्या देकर हम यहॉ टिप्पणीके रूपमें देते हैं। क्योंकि कोई-कोई इसे क्षेपक भी समझते हैं। जयति श्रीजानकी भानुकुल-भानुको प्राणप्रियवल्लभे तरणि भूपे । राम आनंद-चैतन्यधन-विग्रहा शक्ति आवादिनी साररूपे ॥ -