पृष्ठ:विनय पत्रिका.djvu/८

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[११] पद-संख्या पद-सूचना पद-सूचना पद-संख्या श्रीरघुवीरकी यह वानि ... २१५ | सेइय सहित सनेह देह भरि २२ श्रीरामचन्द्र कृपालुभजु मन ४५ | सेइये सुसाहिब राम सो • १५७ श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु २०३ सेवहु सिव-चरन-सरोज-रेनु १३ शंकर, शंप्रद सज्जनानंदद १२ | सोइ सुकृती सुचि साँचो २४० सकल सुखकद आनन्दवन ६१ / सो घौं को जोनाम-लाजते... १४४ सकल सौभाग्यप्रद • ५३ | हरति सब आरती रामकी .. ४८ सकचत हो अति राम ... १४२ हरनि पाप त्रिविध ताप ... १९ संत-सतापहर ५५ हरि तजि और भजिये काहि २१६ सदा राम जपु, राम जपु" ४६ हरि तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों १०२ सब सोच-विमोचन चित्रकूट २३ | हरि-सम आपदा-हरन .. २१३ समरयसुअन समीरके ... ३३ हे हरि ! कवन जतन भ्रम भागै ११९ सहज सनेही रामसों तें • • १९० साहिब उदास भये .. २६० हेहरि! कवन जतन सुख मानहु ११८ सिव ! सिव होइ प्रसन्न करु दाया ९ | हे हरि | कवन दोष तोहिं दोजै ११७ सुनहराम रघुवीरगसाई.. १४३ | हेहरि! कस न हरहु भ्रम भारी १२० सुनि सीतापति-सीलसुभाउ १०० हे हरि । यह भ्रमकी अधिकाई १२१ सुनु मन मूढ सिखावन मेरो ८७ है नीको मेरो देवता ... १०७ सुमिरु सनेहसोंतू नाम-रामरायको ६९ है प्रभु । मेरोई सब दोसु .... १५९ सुमिरु सनेह-सहित सीतापति १२८ हौं सब विधि रामारावरो ... १४६