पृष्ठ:वैदेही-वनवास.djvu/८३

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
४७
तृतीय सर्ग

लवण अपने उद्योगों में।
सफल हो कभी नही सकता ।।
गये गंधर्व रसातल को।
रहा वह जिनका मुंह तकता ॥७४।।

बहाता है अब भी ऑसू ।
याद कर रावण की बाते ।।
पर उसे मिल न सकेगी अब ।
पाप से भरी हुई राते ॥७५॥

राज्य की नीति यथा संभव ।
उसे सुचरित्र बनायेगी ।
अन्यथा दुष्प्रवृत्ति उसकी।
कुकर्मों का फल पायेगी ॥७६।।

कठिनता यह है दुर्जनता।
मृदुलता से बढ़ जाती है ।
शिष्टता से नीचाशयता।
बनी दुर्दान्त दिखाती है॥७७।।

बिना कुछ दण्ड हुए जड़ की।
कब भला जड़ता जाती है।
मूढ़ता किसी मूढ़ मन की।
दमन से ही दब पाती है।॥७८॥