पृष्ठ:सप्तसरोज.djvu/६४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
सप्तसरोज
६२
 

घर के मालिक-मुख्तार हो। नौकरीमे ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीरका मजार है। निगाह चढावे और चादरपर रखनी चाहिये। ऐसा काम ढूँढ़ना जहां कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासीका चांद है, जो एक दिन दिखाई देता है और फिर घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसीसे उसमें वृद्धि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है। इसीसे उसमे बरकत होती है। तुम स्वयं विद्वान् हो, तुम्हें क्या समझाऊँ। इस विषय मे विवेककी बडी आवश्यकता है। मनुष्यको देखो, उसकी आवश्यकता को देखो और अवसर देखो, उसके उपरान्त जो उचित समझो, करो। गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ-ही-लाभ है। लेकिन बेगरजको दांवपर पाना जरा कठिन है। इन बातोंको निगाह से बांध लो। यह मेरी जन्म भर की कमाई है।

इस उपदेश के वाद पिताजीने आशीर्वाद दिया। वंशीधर आज्ञाकारी पुत्र थे। ये बातें ध्यानसे सुनी और तब घरसे खडे हुए। इस विस्तृत संसारमें उनके लिये धैर्य अपना मित्र, बुद्धि अपनी पथदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। लेकिन अच्छे शकुनसे चले थे, जाते-ही-जाते नमक-विभागके दारोगा-पदपर प्रतिष्ठित हो गये। वेतन अच्छा और ऊपरी आय का तो कुछ ठिकाना ही न था। वृद्ध मुशीजीको यह सुख-सवाद मिला तो फूले न समाये। महाजन लोग कुछ नरम पडे, फलवारकी माशालता लहलहाई। पड़ोसियों के हृदयोंमें शूल उठने लगी।