चि० मणिलाल, १०४. पत्र : मणिलाल गांधीको सोमवार [२१ फरवरी, १९२७] तुम्हारा पत्र मिला । मैं सुशीलासे कोई प्रतिज्ञा नहीं कराना चाहता । उसे में इतना जानता भी नहीं हूँ । लेकिन तुम्हें इस कुटुम्बको जान लेना चाहिए। यह बड़ा सुसंस्कारी कुटुम्ब है। सभी लोग खादी पहनते हैं । तुम्हारे लिये खादी पहनना मुश्किल है, यह बात मैंने मान ली है। सुशीला यदि देशी ढंगसे साड़ी आदि पहनती रही तो उसके लिए [खादी पह्नना] मुश्किल नहीं है। मामूली खर्च करके खादीकी अच्छी पोशाक बनवा ली जा सकती है। अब तो एडनबरा तकमें खादी पह्ननेवाले मिल जाते हैं । मेरा प्रयत्न तुम्हें अथवा सुशीलाको संन्यासी बनानेका नहीं है। हाँ, तुम्हें मर्यादा- शील गृहस्थ अवश्य बनाना चाहता हूँ । यदि तुम्हें संन्यासी बनाना मेरा उद्दिष्ट होता तो तुम्हें विवाहकी झंझटमें क्यों डालता ? तुम मर्यादामें रहकर विषय-सुखका सेवन करो, मैं इसका विरोधी नहीं हूँ । इतना कहनेके बावजूद तुम स्वतन्त्र हो और अपनी इच्छाके अनुसार व्यवहार करो। मैं तुमपर तनिक भी दबाव न डालूंगा । जमनालालजी संन्यासी नहीं बन गये हैं; उन्होंने बहुतसे विषय भोगोंको जरूर त्याग दिया है । तुम्हारी आयु कम नहीं है। मैं तुम्हें बालक नहीं मानता । में सभी बातोंमें तुमसे पूछ-पूछकर कदम उठा रहा हूँ । विवाह-विधिके बारेमें भी तुम कोई परिवर्तन करना चाहो अथवा समारोहकी इच्छा करो तो मुझे अवश्य बताना । मैंने तो जो उचित लगा है सो तुम्हें सुझाया है और किया है। लेकिन मेरी इच्छा अपने धर्मका अनुसरण करते हुए जितनी हदतक तुम्हारे अनुकूल बन सकूँ उतनी हदतक अनुकूल बननेकी है। युवा स्त्री या पुरुषके जीवनमें विवाह एक महत्त्व- पूर्ण परिवर्तन है, यह मैं जानता हूँ। उसमें माता-पिताको बीचमें नहीं पड़ना चाहिए, यह भी मैं जानता हूँ । तुमपर किसी भी तरहका दबाव है, ऐसा न मानना । में इससे ज्यादा खुलकर और क्या लिखूं और इससे ज्यादा अभय दान क्या दूँ ? पण्डितजीको नानाभाईने बुलाया है, इसलिए वे तुम्हारे साथ आयेंगे। तुम दोनों ताप्ती घाटी के मार्ग से आकर मेरे साथ ही चल सकते हो। इस तरह समय भी बच सकता है। लेकिन जैसा तुम दोनोंको ठीक लगे वैसा करना । गुजराती (सी० डब्ल्यू० १११९) से । सौजन्य : सुशीलाबह्न गांधी बापूके आशीर्वाद १. इस पत्र में तथा अगले दो पत्रोंमें मणिलालके विवाहको तथा पण्डितजीको विवाहमें आनेका सन्देश भेजे जानेकी चर्चासे लगता है कि ये सब पत्र एक ही तारीखको लिखे गये थे। Gandhi Heritage Portal
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 33.pdf/१५२
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