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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 5.pdf/२७१

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श्री जॉन मॉर्ले और भारत


श्री मुहम्मद कासिम आंगलिया शिक्षित हैं। उन्हें राजनीतिक कार्यकी जानकारी है। यद्यपि कांग्रेस में उन्होंने अभीतक अधिक काम नहीं किया है, तो भी उनमें मन्त्रीकी योग्यता है। अभी तो कांग्रेसके सदस्योंमें खूब उत्साह है। हमें आशा है कि इस उत्साहसे लाभ उठाकर श्री दाउद मुहम्मद, श्री उमर हाजी आमद झवेरी और श्री मुहम्मद कासिम आंगलिया कांग्रेसका काम अच्छी तरह करेंगे।

एक अरसेसे कांग्रेसमें उगाहीका काम नहीं हुआ है। कुछ राजनीतिक काम करने जरूरी हैं। ये सब काम मेहनत करनेपर आसानीसे हो सकते हैं। जिस तरह इंग्लैंडमें नया मन्त्रि- मण्डल है, उसी तरह कांग्रेसमें भी नया मन्त्रिमण्डल है। संयोग ऐसा है कि जिससे भलाईकी आशा करनेका हमें हक है।

[गुजरातीसे]
इंडियन ओपिनियन, १०-३-१९०६
 

२४४. फ्राइहीडको नेटालसे अलग करनेके लिए आन्दोलन

विलायत में उदारदलीय मन्त्रिमण्डल बननेसे डच लोगों में बड़ी हिम्मत आ गई है, और वे यह मानने लगे हैं कि अब वे जो माँगेंगे, सो मिल सकेगा। जब फाइहीडको ट्रान्सवालसे हटाकर नेटालमें जोड़ा गया था तब डच लोगोंने विरोध किया था, पर सुनवाई नहीं हुई। अब उन लोगोंने फिरसे बड़ी अर्जी भेजनेका निर्णय किया है। उन्हें नेटालके कानून पसन्द नहीं हैं, और ट्रान्सवालके साथ रहना उन्हें अच्छा लगता है। अगर फ्राइहीड ट्रान्सवालमें मिलाया जाये तो उससे भारतीयोंको बहुत लाभ होगा। आज तो ट्रान्सवाल और नेटाल दोनोंके बुरे कानून उनपर लागू होते हैं और दोनोंमें से एकके भी अच्छे कानूनोंका लाभ उन्हें नहीं मिलता।

[गुजरातीसे]
इंडियन ओपिनियन, १०-३-१९०६
 

२४५. श्री जॉन मॉर्ले और भारत

श्री जॉन मॉर्ले भारतके बारेमें बोल दिये हैं। श्री रॉबर्ट्सने उनसे बंगालके विभाजनके बारेमें पूछा था। जवाब में उन्होंने कहा कि बंगालके टुकड़े हो चुके हैं। उसकी सीमा निश्चित करनेके बारेमें लोगोंकी भावनाको ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए थी। लेकिन अब जो हो चुका है, उसमें फेरफार करनेकी जरूरत नहीं मालूम होती। राज्य-कारोबारमें बहुत दिनोंसे एक उत्तेजना चली आ रही थी, अब उसके शान्त होनेकी आवश्यकता है। शासनके काम-काज में लोगोंको हिस्सेदार बनानेका समय अभी आया नहीं है।

ये वचन निराशा पैदा करनेवाले हैं। इसका मतलब यह हुआ कि बंगालकी जनताको इन्साफ नहीं मिलेगा। अगर लगाम शुरूसे ही श्री मॉर्लेके हाथमें होती, तो विभाजन होता ही नहीं। इससे मालूम होता है कि श्री मॉर्लेसे जो यह आशा रखी जाती थी कि वे बहुत हिम्मतके साथ, बिना डरे जो करना चाहिए सो करेंगे, वह टूट गई है। फिर भी इसका सार यह