पृष्ठ:सरदार पूर्णसिंह अध्यापक के निबन्ध.djvu/९३

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पवित्रता सच्चे देश को, इस बिदेश में रहना, जूते खाने से क्या लाभ ? अपने घर को मुख मोड़ो ? बाहर क्या दौड़ रहे हो ? पवित्रता का चिंतन करते हुए ये मेरे मन के कमरे की दीवारों पर जो चित्र लटक जाते हैं उनका वर्णन करना ही लेखक के लिये तो पवित्रता का स्वरूप जतलाना है । लेखक इस कमरे (पवित्रता का में कई बार घण्टों इन चित्रों के चरणो में बैठा है- स्वरूप) इन चित्रों की पूजा की और इनसे पवित्रता के स्वरूप को जितना हुअा अनुभव किया । चित्रों का जो लेखक । ने अपने इस बुतखाने में रखे हैं, वर्णन तो इस लेख में हो नहीं सकता परन्तु जितना हो सकता [सकता है उतना संक्षेप से अर्पण करता है (१) ऊँचा पर्वत है, अासपास सुहाने देवदारु के जङ्गल नीचे तक खड़े हैं । मोलों लम्बी बर्फ पड़ी है, इसके चरणों में नदियाँ किलोल कर रही हैं । इसके सिर पर एक दो, कोई एक एक मील लम्बे , पिघली बर्फ के कुएड भी हैं । ऊपर नीला अाकाश झलक रहा है । पूर्णिमा का चाँद छिटक रहा है । ठंडक, शांति और सत्वगुण बरस रहा है। सुख अासन में बैठे ताड़ी लगा खुली आँखों, मैं इस शोभा को देख रहा हूं। आँखें खुली ही हुई जुड़ गई हैं । पलक फरकाने तक की फुर्सत नहीं, मुख खुला हो रह गया है । बन्द करने का अवकाश नहीं मिला। प्राणों की गति का पता नहीं। इस अपने ही चित्र के समय घड़ियों ब्यतीत हो जाती हैं । पाठक ? बैठ जाओ, मेरी जगह अपने आपको बिठा लो और देखो जब तक आपका जी चाहै । (२) गङ्गा का किनारा है, एक शिला पर भर्तृहरिजी बैठे हैं। पद्मासन लगाए हुए हैं । ब्रह्मचिन्तन में लान हैं । उनकी मुँदी हुई आँखों से एक दो प्रेम के अश्रु निकलकर उनके तेज भरे कपोलों पर ढलककर जम गए हैं । मृग जंगल से दौड़ते अाए, और उनके शरीर को भी शिला जान अपने सींग खुजलाने लग गए । अाकाश से एक ६३