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पृष्ठ:सह्याद्रि की चट्टानें.djvu/४

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"महाराज !” पीछे आने वाला सवार क्षण भर में अग्रगामी सवार के सन्निकट आगया, और उसने विजली की भांति अपनी तलवार खींच ली । अग्रगामी सवार का घोड़ा खड़ा हो गया था। उसने भी तलवार नंगी करके कहा- "देखो, क्या है ? घोड़े ने ठोकर खाई है, यह श्रार्त्तनाद कैसा है ?" घांघूजी घोड़े से उतर पड़े, उन्होंने झुककर देखा और कहा- “महाराज, एक मनुष्य है ।" "क्या घायल है ?" "खून में लथपथ प्रतीत होता है ।" "जीवित है ?" इसी समय पड़े हुए व्यक्ति ने फिर आनाद किया । महाराज उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही घोड़े से कूद पड़े । उन्होंने बांधूजी को प्रकाश करने का आदेश दिया, और स्वयं मार्ग में पड़े व्यक्ति के सिर- हाने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उसका सिर गोद में रख लिया, नाड़ी देखी, हृदय का स्पंदन देखा, और कहा - "जीवित है । पर मालूम होता है, बहुत घाव खाए हैं, रक्त बहुत निकल गया है ।" धांवूजी ने तब तक चकमक पत्थर से अबरख की वनी, चोर- लालटेन जला ली थी । वह उसे घायल के मुख के पास लाए। देखकर कहा–“अरे, बड़ा अल्पवयस्क वालक है !” "परन्तु अंग-अंग में घाव हैं, मालूम होता है, वीरतापूर्वक युद्ध किया है ।" मुमूर्षु ने प्रकाश और मनुष्य मूर्ति को देखा, और जल का संकेत किया । महाराज ने स्वयं उसके मुख में जल डाला । जल पीकर उसने नांखें खोलीं, और क्षीण स्वर में कहा - "आप कौन हैं, प्राणरक्षक ?” और फिर कुछ ठहर कर कहा - " आप चाहे जो भी हों, यह प्रारण और शरीर आपके हुए।" उसके होठों पर मंद हास्य की रेखा आई ।