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साहित्य का उद्देश्य


है। यद्यपि हमारे समाचार-पत्रो की जबाने बन्द हैं और देश में जो कुछ हो रहा है, हमे उसकी ख़बर नहीं होने पाती, फिर भी कभी-कभी त्याग और सेवा, शौर्य और विनय के ऐसे-ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं जिन पर हम चकित हो जाते है। ऐसी ही दो-एक घटनाएँ हम अाज अपने पाठको को सुनाते है।

एक नगर मे कुछ रमणियॉ कपडे की दुकानो पर पहरा लगाये खड़ी थीं। विदेशी कपडों के प्रेमी दूकानो पर आते थे । पर उन रमणियों को देखकर हट जाते थे। शाम का वक्त था। कुछ अँधेरा हो चला था । उसी वक्त एक आदमी एक दूकान के सामने अाकर कपड़े खरीदने के लिये आग्रह करने लगा। एक रमणी ने जाकर उससे कहा-महाशय, मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ, कि आप विलायती कपड़ा न खरीदे ।

ग्राहक ने उस रमणी का रसिक नेत्रो से देखकर कहा-अगर तुम मेरी एक बात स्वीकार कर लो, तो मैं कसम खाता हूँ, कभी विलायती कपड़ा न खरीदूंगा।

रमणी ने कुछ सशक होकर उसकी ओर देखा और बोली-क्या आशा है ?

ग्राहक लम्पट था । मुसकराकर बोला-बस, मुझे एक बोसा दे दो।

रमणी का मुख अरुणवर्ण हो गया, लज्जा से नहीं, क्रोध से । दूसरी दूकानो पर और कितने ही वालटियर खड़े थे । अगर वह जरा-सा इशारा कर देती, तो उस लम्पट की धज्जियाँ उड़ जाती। पर रमणी विनय को अपार शक्ति से परिचित थी। उसने सजल नेत्रो से कहा-अगर आपकी यही इच्छा है, तो ले लीजिए, मगर विदेशी कपडा न खरीदिये । ग्राहक परास्त हो गया । वह उसी वक्त उस रमणी के चरणो पर गिर पड़ा और उसने प्रण किया कि कभी विलायती वस्त्र न लूँगा, क्षमा-प्रार्थना की और लज्जित तथा सस्कृत होकर चला गया।

एक दूसरे नगर की एक और घटना सुनिए । यह भी कपडे की