पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/१९

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- - www. uk - यो सोचते सोचते वह कुटीर के बाहर आई। प्रायः दोपहर होगया था, किन्तु आकाश अभी तक मेघाच्छन्न था; इससे सूर्य के किरण की तेजी नहीं थी। सहसा कुटीर छोड़कर जिधर मुंह पड़ा, उसी ओर अनाथिनी जाने लगी। किस लिये ? छोटे भाई के खोजने को। . बालिका के मन में निश्चय था कि, 'मैं अपने भाई को खोज लूंगी।' कुछ दूर जाने पर एक तिरमुहानी मिली। तीनों पथ लोगों के आने जाने बिना प्रायः असंस्कृत हो रहे थे। एक पथ में कीचड़ होने से कई मनुष्यों के पैर के चिन्ह उखड़े थे। बालिका ने देखकर वही पथ पकड़ा। वह कहां जाती है, इस पथ का कहां अन्त है, इसका कुछ ठिकाना नहीं। जाते जाते अनाथिनो एक सघन बन में पहुंची । असंख्य वृक्षराजि, अनन्त फूल-फल, अनेक पशु-पक्षी, और अशेष प्राकृतिक शोभा की रमणीयता से बन शोभायमान था। अनाथिनी को देखकर पशु-पक्षी भागने लगे। यह देख उसने मृदु स्वर से हंसकर आप ही आप कहा,-"मुझसे क्यों डरते हो ?" एक सुन्दर पुष्करिणी के निर्मल जल में जलचर कलोल करते थे। वृक्षों की शाखाओं की एकता से उस बन में सूर्य की किरण नहीं घुसने पाती थी । बालिका खड़ी हो धन की शोभा देखने लगी। अन्त में एक वृक्ष-कोटर में दो चिल्ली के बच्चों को क्रीड़ा करते देख उसने दीनिश्वास त्याग करके कहा,-"इस समय भाता कहां है ?" उसके मन में बहुत कष्ट हुआ और वह इधर उधर टहलने लगी। कुछ दूर आगे जाने पर मनुष्य का पदचिन्ह दिखाई दिया। उसके मन में आशा हुई और कई कदम आगे जाकर कुछ देखकर वह बड़ो बिस्मित हुई ! उसने देखा कि, 'एक वट-वृक्ष में जीर्ण-शीर्ण घोड़ा बंधा हैं !' अनाथिनी ने सोना कि, 'यह अश्व किसका है और कहां से आया ?' क्यों कि वह जिस पथ से आई थी, वह यहीं समाप्त होगया था। अश्व की ओर से आँख फेर कर सामने क्या देखा कि, एक पक्का मकान है, किन्तु भग्नप्राय होरहा है !' तब तो अनाथिनी डरी। अनन्तर भाई के खोजने की अभिलाषा ने भय को दूर किया। आशा से हदय पूर्ण करके बालिका उस घर के आंगन में जाकर प्रेमावेश से उन्मत्त होकर हठात् "सुरेन्द्र सुरेन्द्र !” कहकर जोर से पुकारने