पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१२

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सेवासदन
 


ने कहा, हां, यह तो मालूम है, किन्तु साधुसन्तों पर कृपा रखनी ही चाहिए। इसके बाद दोनो सज्जनों में कानाफूसी हुई। मुख्तार ने कहा, नहीं सरकार, पाच हजार बहुत होते है, महन्त जी को आप जानते है, वह अपनी टेक पर आ जायँगे तो चाहे फासी हो ही जाय पर जी भर न हटेगे । ऐसा कीजिये कि उनको कष्ट न हो और आपका भी काम निकल जाय। अन्त में तीन हजार पर बात पक्की हो गई ।

पर कडवी दवा को खरीद कर लाने, उसका काढा बनाने और उसे उठा कर पीने में बडा अन्तर है । मुख्तार तो महन्त के पास गया और कृष्णचन्द्र सोचने लगे, यह मैं क्या कर रहा हूँ ?

एक ओर रुपया का ढेर था और चिन्ताव्याधि से मुक्त होने की आशा दूसरी ओर आत्मा का सर्वनाश और परिणाम का भय। न हाँ करते बनता था, न नाही ।

जन्म भर निर्लोभ रहने के बाद इस समय अपनी आत्मा का बलि- दान करने में दारोगा जी को बडा दुख होता था । वह सोचते थे, यदि यही करना था तो आज से पचीस साल पहले ही क्यो न किया, अब तक सोने की दीवार खडी कर दी होती । इलाके ले लिये होते । इतने दिनो तक त्याग का आनन्द उठाने के बाद बुढापे मे यह कलक ! पर मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्या अपराध ? तुमसे जब तक निभ सका, निवाहा । भोग-विलास के पीछे अधर्म नही किया; लेकिन जब देश, काल, प्रथा और अपने बन्धुओ का लोभ तुम्हे कुमार्ग की ओर ले जा रहे है तो तुम्हरा दोष ? तुम्हारी आत्मा अब भी पवित्र है । तुम ईश्वर के सामने अब भी निरपराध हो। इस प्रकार तर्क कर के दरोगा जी ने अपनी आत्मा को समझा लिया।

लेकिन परिमाण का भय किसी तरह पीछा न छोडता था । उन्होने कभी रिश्वत नही ली थी । हिम्मत न खुली थी । जिसने कभी किसी पर हाथ न उठाया हो, वह सहसा तलवार का वार नही कर सकता। यदि कही बात खुल गई तो जेलखाने के सिवा और कही ठिकाना नही;