पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१७२

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सेवासदन
१९३
 

बारात को लौटाने का हुकुम क्यो देते है ? ऐसा कुछ करो कि दोनो ओर की मर्यादा बनी रहे,अब उनकी और आपकी इज्जत एक है । लेन-देन में कुछ कोर कसर हो तो तुम्हीं दब जाओ, नारायणने तुम्हें क्या नहीं दिया है ? इनके धनसे थोडे ही धनी हो जाओगे ? मदनसिंहने कुछ उत्तर नही दिया ।

महफिलमें खलबली पड़ गई। एक दूसरे से पूछता था,यह क्या बात है? छोलदारीके द्वार पर आदमियों की भीड़ बढ़ती ही जाती थी ।

महफिल में कन्याकी ओर के भी कितने ही आदमी थे। वह उमानाथ से पूछने लगे, भैया, ये लोग क्यों बरात लौटाने पर उतारू हो रहे है ? जब उमानाथ ने कोई संतोषजनक उत्तर न दिया तो से सबके सब आकर मदन सिंह से विनती करने लगे,महाराज,हमसे ऐसा क्या अपराध हुआ है। और जो दण्ड चाहे दीजिये पर बारात न लौटाइये नही तो गाँव बदनाम हो जायगा। मदनसिहं ने उनसे केवल इतना कहा,इसका कारण जाकर उमानाथ से पूछो,वही बतलायेगे।

पण्डित कृष्णचन्द्र ने जबसे सदनको देखा था, आनन्द से फूले न समाते थे । विवाह का मुहूर्त निकट था, वह वरके आनेकी राह देख रहे थे कि इतने मे कई आदमियों ने आकर उन्हें यह खबर दी । उन्होने पूछा क्यों लौट जाते है ? क्या उमानाथ से कोई झगड़ा हो गया है ?

लोगों ने कहा,हमें यह नहीं मालूम, उमानाथ तो वही खड़े मना रहे है ।

कृष्णचन्द्र झल्लाये हुए बारातकी ओर चले । बारात का लौटना क्या लड़कों का खेल है ? यह कोई गुड्डे गुड्डों का ब्याह है क्या ? अगर विवाह नहीं करना था तो यहां बारात क्यों लाये । देखता हूं, कौन बारात को फेर ले जाता है ? खून की नदी बहा दूंगा । यही न होगा फांसी हो जायगी, पर इन्हें इसका मजा चखा ढूंगा। कृष्णचन्द्र अपने साथियों से ऐसी ही बाते करते, कदम बढ़ाते हुए जनवासे मे पहुँचे और ललकारकर बोले, कहाँ है पण्डित मदनसिह ? महाराज,जरा बाहर आइये ।

मदनसिह यह ललकार सुनकर बाहर निकल आये और दृढ़ता के साथ बोले, कहिये, क्या कहना है ?