पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१८९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
२१२ सेवासदन

अच्छादित हो जाती। वह जनवासे में पण्डित पद्मसिद्दकी बात सुन-सुनकर अधीर हो रहा था। वह डरता था कि कहीं पिताजी उनकी बातों में न आ जाँय। उसको समझमे न आता कि चाचा साहबको क्या हो गया है? अगर यही बातें किसी दूसरे मनुष्य ने की होती तो वह अवश्य उसकी जबान पकड़ लेता। लेकिन अपने चाचासे वह बहुत दबता था। उसे उनका‌ प्रतिवाद करनेकी बडी प्रबल इच्छा हो रही थी; उसकी तार्किक शक्ति कभी इतनी सतेज न हुई थी, और यदि विवाद तर्क हीं तक रहता तो वह जरुर उनसे उलझ पड़ता। लेकिन मदनसिंह की उद्रताने उसके प्रतिवाद उत्सुक्ता को सहानुभूति के रूपमें परिणत कर दिया।

इधर से निराश होकर सदन का लालसापूर्ण हृदय फिर सुमन की ओर लपका। विषय-वासना का चसका पड़ जान के बाद अब उसकी प्रेमकल्पना निराधार नहीं रह सकती थी। उसका हृदय एक बार प्रेमदीपक से आलोकित होकर अब अन्धकार में नहीं रहना चाहता था। वह पद्मसिंहके साथ ही काशी चला आया।

किन्तु यहाँ आकर वह एक बड़ी दुविधा में पट गया। उसे समय होने लगा कि कही सुमनबाई को ये सब समाचार मालूम न हो गये हो। वह वहाँ स्वयं तो न रही होगी, लोगोंने उसे अवश्य ही त्याग दिया होगा, लेकिन उसे विवाह की सूचना जरूर दी होगी। ऐसा हुआ होगा तो कदाचित् वह मुझसे सीधे मुह बात भी न करेगी। सम्भव है वह मेरा तिरस्कार भी करे। लेकिन संध्या होते ही उसने कपड़े बदले, घोड़ा कसवाया और ढालमंडी की ओर चला। प्रेम मिलापकी आनन्दपूर्ण कल्पनाके सामने वे शंकाए निर्मूल हो गई। वह सोच रहा था कि सुमन मुझसे पहले क्या कहेगी, ओर में उसका उत्तर क्या दूंगा, कही उसे कुछ न मालूम हो और वह जाते ही प्रेम से मेरे गले लिपट जाय और कहे कि तुम बड़े निठुर हो। इस कल्पना ने उसकी प्रेमाग्नि को और भी भड़कया, उसने घोड़े को एट लगाई और एक क्षणमे दालमण्डी के निकट आ पहुचा, पर जिस प्रकार एक खिलाड़ी लड़का पाटशाला के द्वारपर आकर भीतर जाते हुए डरता है उसी प्रकार