पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२०८

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सेवासदन
२३७
 


इच्छा और माया का अंतिम संग्राम था। माया ने अपनी संपूर्ण शक्ति से उसे अपनी ओर खींचा। सुमन विदुषी वेष में दृष्टिगोचर हुई, शान्ता शोक की मूर्ति बनी हुई सामने आई। अभी क्या बिगड़ा है क्यों न साधु हो जाऊँ? मैं ऐसा कौन बड़ा आदमी हूँ कि संसार मेरे नाम और मर्यादा की चर्चा करेगा? ऐसी न जाने कितनी कन्याएँ पाप के फन्दे में फंसती है। संसार किसकी परवाह करता है? मैं मूर्ख हूँ जो यह सोचता हूँ कि संसार मेरी हँसी उड़ावेगा। इच्छा-शक्ति ने कितना ही चाहा कि इस तर्क का प्रतिवाद करे पर वह निष्फल हुई। एक डुबकी की कसर थी। जीवन और मृत्यु में केवल एक पग का अन्तर था। पीछे का एक पग कितना सुलभ था कितना सरल! आगे का एक पग कितना कठिन था, कितना भयकारक।

कृष्णचन्द्र ने पीछे लौटने के लिये कदम उठाया। माया ने अपनी विलक्षण शक्ति का चमत्कार दिखा दिया। वास्तव में वह संसार-प्रेम नहीं था यह अदृश्य का भय था।

उस समय कृष्णचन्द्र को अनुभव हुआ कि अब मैं पीछे नहीं फिर सकता। वह धीरे-धीरे आप ही आप खिसकते जाते थे। उन्होंने जोर से चीत्कार किया, अपने शीत शिथिल पैरों को पीछे हटाने की प्रबल चेष्टा की, लेकिन कर्म की गति कि आगे ही को खिसके।

अकस्मात् उनके कानों में गजाधर के पुकारने की आवाज आई। कृष्णचन्द्र ने चिल्लाकर उत्तर दिया, पर मुझसे पूरी बात भी न निकलने पाई थी कि हवा से झूझकर अन्धकार में लीन हो जाने वाले दीपक के सदृश लहरों में मग्न हो गये। शोक, लज्जा और चितातप्त हृदयका दाह शीतल जल में शान्त हो गया।

गजाधर ने केवल यह शब्द सुने "मैं यहाँ डूबा जाता हूँ” और फिर लहरों की पैशाचिक क्रीड़ा-ध्वनि के सिवा और कुछ न सुनाई दिया।

शोकाकुल गजाधर देरतक तटपर खड़े रहे। वही शब्द चारों ओर से उन्हें सुनाई देते थे। पास की पहाडियाँ और सामने की लहरे, और चारों ओर छाया हुआ दुर्भाग्य अन्धकार उन्हीं शब्दों से प्रतिध्वनित हो रहा था।