पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२१०

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सेवासदन
२३९
 


सर्वथा निराधार हो गई। लेकिन नैराश्य ने उसके जीवन को उद्देश्यहीन नहीं होने दिया। उसका हृदय और भी कोमल हो गया। कृष्णचन्द्र ने चलते-चलते उसे जो शिक्षा दी थी, उसमें अब विलक्षण प्रेरणा शक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था। आज से शान्ता सहिष्णुताकी मूर्ति बन गई। पावस की अंतिम बूंदो के सदृश मनुष्य की वाणी के अंतिम शब्द कभी निष्फल नहीं जाते। शान्ता अब मुँह से कोई ऐसा शब्द न निकालती, जिससे उसके पिता की आत्मा को दुख हो, उनके जीवनकाल में वह कभी-कभी उनकी अवहेलना किया करती थी, पर अब वह अनुदार विचारों को हृदय में भी न आने देती थी। उसे निश्चय था कि भौतिक शरीर से मुक्त आत्मा के लिये अन्तर और वाह्य में कोई भेद नहीं। यद्यपि अब वह जान्हवी को संतुष्ट रखने के निमित्त कोई बात उठा न रखती थी, तथापि जान्हवी उसे दिन मे दो-चार बार अवश्य ही उल्टी सीधी सुना देती। शान्ता को क्रोध आता, पर वह विष का घूंट पीकर रह जाती, एकान्त में भी न रोती। उसे भय था कि पिताजी की आत्मा मेरे रोनेसे दु:खी होगी।

होली के दिन उमानाथ अपनी दोनों लड़कियो के लिये उत्तम साड़ियाँ लाये। जान्हवी ने ने भी रेशमी साड़ी निकाली, पर शान्ता को अपनी पुरानी धोती ही पहननी पड़ी। उसका हृदय दु:ख से विदीर्ण हो गया, पर उसका मुख जरा भी मलिन न हुआ। दोनो बहने मुँह फुलाये बैठी थी कि साड़ियाँ में गोट नहीं लगवाई गई और शान्ता प्रसन्न वदन घर का काम काज कर रही थी, यहाँ तक कि जान्हवी को भी उसपर दया आ गई। उसने अपनी एक पुरानी लेकिन रेशमी साड़ी निकालकर शान्ता को दे दी। शान्ता ने जरा भी मान न किया। उसे पहनकर फिर पकवान बनाने में मग्न हो गई।

एक दिन शान्ता उमानाथ की धोती छँटनी भूल गई। दूसरे दिन प्रातःकाल उमानाथ नहाने चले तो धोती गीली पड़ी थी। वह तो कुछ न बोले, पर जान्हवी ने शान्ता को इतना कोसा कि वह रो पड़ी। रोती थी और धोती छाँटती थी। उमानाथ को यह देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने मन में सोचा, हम केवल पेट की रोटियों के लिये इस अनाथ को इतना कष्ट दे रहे हैं?