पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२३६

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सेवासदन २७३


है। अगर संसार में कोई प्राणी था जो सपूर्णतः उनकी अवस्था को समझता था तो वह सुभद्रा थी। वह उस तरमीम को उससे कही अधिक आवश्यक समझती थी, जितना वे स्वयं समझते थे। वह उनके सहकारियों की उनसे कही अधिक तीव्र समालोचना करती। उसकी बातों से पद्मसिह को बड़ी शांति होती थी। यद्यपि वह समझते थे कि सुभद्रा में ऐसे गहन विषय के समझने और तौलने की सामर्थ्य नही और यह जो कुछ कहती है वह केवल मेरी ही बातोंकी प्रतिध्वनि है तथापि इस ज्ञानसे उनके आनन्दमे कोई विघ्न न पडता था।

लेकिन महीना पूरा भी न हो पाया था कि प्रभाकरराव ने अपने पत्रमे इस प्रस्तावके संबंधमें एक लेखमाला निकालनी आरंभ कर दी। उसमे पद्मसिहपर ऐसी ऐसी मार्मिक चोट करने लगे कि उन्हे पढ़कर वह तिलमिला जाते थे। एक लेखमें उन्होने पद्मसिंहके पूर्व चरित्र और इस तरमीम से घनिष्ट संबंध दिखाया। एक दूसरे लेख मे उनके आचरण पर आक्षेप करते हुए लिखा, वह वर्तमानकाल के देश-सेवक है जो देशको भूल जायें, पर अपने को कभी नही भूलते, जो देशसेवाकी आड़ मे अपना स्वार्थ साधन करते है। जाति के नवयुवक कुएं मे गिरते हो तो गिरे, काशी के हाजी की कृपा बनी रहनी चाहिये। पद्मसिंहको इस अनुदारता और मिथ्या द्वेष पर जितना क्रोध आता था उतनाही आश्चर्य होता था। असज्जनता इस सीमा तक जा सकती है यह अनुभव उन्हें आज ही हुआ। यह सभ्यता और शालीनता के ठेकेदार बनते है, लेकिन उनकी आत्मा ऐसी मलिन है। और किसी मे इतना साहस नहीं कि इसका प्रतिवाद करे?

सन्ध्या का समय था। वह लेख चारपाईपर पड़ा हुआ था। पद्मसिह सामने मेजपर बैठे हुए इस लेख का उत्तर लिखने की चेष्टा कर रहे थे, पर कुछ लिखते न बनता था कि सुभद्रा ने आकर कहा,गरमी में यहाँ क्यों बैठे हो? चलो बाहर बैठो।

पद्म-- प्रभाकरराव ने मुझे आज खूब गालियाँ दी है, उन्ही का जवाब लिख रहा हूँ।