पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२८

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सेवासदन
२९
 

सुमन-—क्यों,भोली के घर जाने में कोई हानि है ? उसके घर तो बड़े-बड़े लोग आते है, मेरी क्या गिनती है ।

गजाधर—बड़े बड़े भले ही आवे,लेकिन तुम्हारा वहाँ जाना बड़ी लज्जा की बात है । मैं अपनी स्त्री को वेश्या से मेलजोल करते नही देख सकता।तुम क्या जानती हो कि जो बड़े-बड़े लोग उसके घर आते है यह कौन लोग हैं ? केवल धन से कोई बड़ा थोड़े ही हो जाता है?धर्म का महत्व कहीं धन से बढ़कर है । तुम उस मौलूद के दिन जमाव देखकर धोखे मे आ गई होगी,पर यह समझ लो कि उनमें से एक भी सज्जन पुरुष नही था । मेरे सेठजी लाख धनी हों पर उन्हे मैं अपनी चौखट न लांघने दूँगा । यह लोग धनके घमण्ड में धर्म की परवाह नही करते। उनके आने से भोली पवित्र नही हो गई है । मैं तुम्हे सचेत कर देता हूँ कि आज से फिर कभी उधर मत जाना,नही तो अच्छा न होगा ।

सुमन के मन मे बात आ गई ठीक ही है, मै क्या जानती हूँ कि वह कौन लोग थे । धनी लोग तो वेश्याओ के दास हुआ ही करते है।यह बात रामभोली भी कह रही थी। मुझे बड़ा धोखा हो गया था।

सुमन को इस विचार से बड़ा सन्तोष हुआ । उसे विश्वास हो गया कि वे लोग नीच प्रकृति के विषय-वासनावाले मनुष्य थे । उसे अपनी दशा अब उतनी दुःखदायी न प्रतीत होती थी । उसे भोली से अपने को ऊंचा समझने के लिए एक आधार मिल गया था।

8

सुमन की धर्मनिष्ठा जागृत हो गई । वह भोलीपर अपनी धार्मिकता का सिक्का जमाने के लिए नित्य गंगा स्नान करने लगी । एक रामायण मँगवाई और कभी-कभी अपनी सहेलियों को उसकी कथाएँ सुनाती । कभी अपने आप उच्च स्वर मे पढ़ती । इससे उसकी आत्मा को तो क्या शान्ति होती,पर मन को बहुत सन्तोष होता था । चैत का महीना था । रामनौमी के दिन सुमन कई सहेलियो के साथ एक बड़े मन्दिर में जन्मोत्सव देखने गई । मन्दिर खूब सजाया हुआ था । बिजली बत्तियों से दिनका-सा प्रकाश हो रहा था, बड़ी भीड थी । मन्दिर के