पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२९८

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सेवासदन
३५३
 

देखकर बड़ा आनंद हुआ। उसने मनमें सोचा, सुमन इतने बड़े आश्रम को अकेले कैसे चलाती होगी, मुझसे तो कभी न हो सकता। कोई लड़की मलोन या उदास नही दिखाई देती।

सुमन ने कहा, मैंने यह भार अपने ऊपर ले तो लिया, पर मुझमें उसके सँभालनेकी शक्ति नही है। लोग जो सलाह देते है, वही मेरा आधार है। आपको भी जो कुछ त्रुटि दिखाई दे, वह कृपा करके बता दीजिये। इससे मेरा उपकार होगा।

सुभद्रा ने हँस कर कहा, बाई जी मुझे लज्जित न करो, मैंने तो जो कुछ देखा है उसीसे चकित हो रही हूँ, तुम्हें सलाह क्या दूंगी, बस इतना ही कह सकती हूँ कि ऐसा अच्छा प्रबन्ध विधवा आश्रम का भी नहीं है।

सुमन— आप संकोच कर रही है।

सुभद्रा— नही, सत्य कहती हूँ। मैने जैसा सुना था इसे उससे कहीं बढकर पाया। हाँ तो बताओ, इन बालिकाओं की माताएँ इन्हे देखने आती है या नही?

सुमन— आती है, पर मैं यथासाध्य इस मेल-मिलापको रोकती हूँ

सुभद्रा— अच्छा, इनका विवाह कहाँ होगा।

सुमन— यही तो टेढ़ी खीर है। हमारा कर्त्तव्य यह है कि इन कन्याओंको चतुर गृहिणी बनानेके योग्य बना दे। उनका आदर समाज करेगा या नही, मैं कह नहीं सकती।

सुभद्रा— वैरिस्टर साहबकी पत्नीको इस काम से बड़ा प्रेम है।

सुमन— यह कहिये कि आश्रम की स्वामिनी वही है। मैं तो केवल उनकी आज्ञाओ का पालन करती हूँ।

सुभद्रा— क्या कहूँ में किसी योग्य नही, नही तो मैं भी यहाँ कुछ काम किया करती।

सुमन— आते-आते तो आप आज आई है, उस पर शर्मा जी को को नाराज करके। शर्माजी फिर इधर आनेतक न देगे।