पृष्ठ:स्टालिन.djvu/६४

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परेसठ] दंड को भयंकरता में कोई अन्तर नहीं भाता। इस भयानक निर्जन स्थान में जहाँ बारहों महीने बर्क जमी रहती थी, बड़े से बड़े धैर्यवान मनुष्य का धैर्य भी छूट जाता था। यदि कभी किसी अवसर पर जार ने उसे क्षमा-प्रदान भी कर दिया तो उस से क्या लाभ ? उस समय तक स्टानिन की काया पलट हो चुकेगी। यदि वह जीवित सकुशल संसार में वापिस भी भा गया तो उस समय वह बूढा, दुर्बन और जर्जरीभूत हो जावेगा। लेकिन जिनके भाग्य में जीवन हो, उन्हें साधारण कठि- नाइयों से क्या खटका १ स्टालिन के सभाग्य ने उस का सदा माथ दिया था। अब की बार भाग्य ने फिर उसका साथ दिया। उस निर्जन बीहड़ स्थान में रहते हुए उसे कुछ मास ही बीते थे कि गत महायुद्ध के प्रारम्भ होने के समाचार उसके कानों तक पहुचे। जिस समाचार से सारे संसार में आतंक फैल गया, स्टालिन को वह इस आधार पर प्राशाजनक ज्ञान पड़ा कि सम्भवत: इसी सिलसिले में कैद से निकलने की कोई सूरत निकल भावे। स्टालिन जैसे विशुद्ध क्रांतिकारी की दिव्य दृष्टि युद्ध के विस्तृत क्षेत्र में रमी रहने लगी। उसने सोचा कि इस अवसर पर किसानों और मजदूरों में शस्त्र बांटे जावेगे। इसके बाद यह प्रश्न उठेगा कि प्रजा-जन किसे अपना वास्तविक समझे? एक अनजान देश की सेना को जिससे उनका कोई झगड़ा न था अथवा इस देश के अधिकारियों को जिन्होंने उनकी स्वतंत्रता छीन रक्खी थी ? यही वह विचार था जिसने स्टालिन के हृदय में माता-प्रदीप प्रज्वलित कर रखा था। उसने सोचा कि युद्ध का अन्तिम परिणाम कुछ भी क्यों न हो, निर्वासितों की अवस्था में आवश्य परिवर्तन होगा । र्याद रूस हार गया तो देश में क्रान्ति