पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/१७

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'लाक' 'एडम्‌स्मिथ' और 'ड्‌यूगल्ड स्टुअर्ट' आदि की यह सम्मति है—

"मनुष्य बहुत काल तक गूंगा रहा, संकेत और भ्रूप्रक्षेप से काम चलाता रहा, जब काम न चला तो भाषा बना ली और परस्पर सम्बाद कर के शब्दों के अर्थ नियत कर लिये"[१]

तुलनात्मक भाषा शास्त्र के रचयिता अपने ग्रन्थ के पृष्ट १९९ और २०१ में इस विषय में अपना यह विचार प्रकट करते हैं—

"पहिला सिद्धान्त यह है कि पदार्थों के और क्रियाओं के पहले नाम जड़- चेतनात्मक बाह्य जगत की ध्वनियों के अनुकरण के आधार पर रखे गये। पशुओं के नाम उनकी विशेष आवाज़ों के ऊपर रखे गये होंगे। कोकिल या काक शब्द स्पष्ट ही इन पक्षियों के बोलियों के अनुकरण से बनाये गये हैं। इसी प्रकार प्राकृतिक या जड़ जगत की भिन्न भिन्न ध्वनियों के अनुसार जैसे वायु का सरसर बहना, पत्तियों का मर्मर रव करना, पानीका झरझर गिरना या बहना, भारी ठोस पदार्थों का तड़कना या फटना इत्यादि के अनुकरण से भी अनेक नाम रखे गये। इस प्रकार अनुकरण के आधार पर मूल शब्दों का पर्याप्त कोश बन गया होगा। इन्हीं बीज रूप मूल शब्दों से धीरे २ भाषा का विकास हुआ है। इस सिद्धान्त को हम शब्दानुकरण-मूलकता-वाद नाम दे सकते हैं।

दूसरे सिद्धान्त इस प्रकार हैं। हर्ष शोक आश्चर्य आदि के भावोंके आवेग में कुछ स्वाभाविक ध्वनियाँ हमारे मुंह से निकल पड़ती हैं, जैसे हाहा, हाय हाय! वाह वाह इत्यादि। इस प्रकार की स्वाभाविक ध्वनियाँ मनुष्यों में ही नहीं और प्राणियों में भी विशेष विशेष रूप की पाई जाती हैं। प्रारम्भ में ये ध्वनियाँ बहुत करके हमारे मनोरागों की ही व्यञ्जक रही होंगी, विचारों की नहीं। भाषा का मुख्य उद्देश्य हमारे विचारों को प्रकट करना होने से इन ध्वनियों ने भाषा के बनाने में जो भाग लिया, उसके लिये यह आवश्यक था, कि ये ध्वनियां मनोरागों के स्थान में विचारों की द्योतक समझी जाने लगी हों। इन्हीं ध्वनियों के दोहराने, कुछ देर तक बोलने, और स्वरके उतार चढ़ाव द्वारा इनके अर्थ या अभिधेय का क्षेत्र


  1. देखो हारमोनिया भाग ५ पृष्ट ७३