पृष्ठ:हिंदी साहित्य का इतिहास-रामचंद्र शुक्ल.pdf/६४६

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नई धारा

जाता है। यह भावुकता इनकी अपनी है। भाषा की गद्यवत् सरल सीधी गति उस रचना-प्रवृत्ति का पता देती है जो द्विवेदीजी के प्रभाव से उत्पन्न हुई थी। पर इनकी रचनाओं में खड़ी बोली की वैसा स्वच्छ और निखर रूप नहीं मिलता जैसा गुप्तजी की उस समय की रचनाओं में मिलता है। कुछ पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं-

चढ़ जाते पहाड़ों में जाके कभी, कभी झाड़ों के नीचे फिरे विचरें।
कभी कोमल पत्तियाँ खाया करें, कभी मीठी हरी हरी घास चरें।
सरिता-जल में प्रतिबिंब लखें निज, शुद्ध कहीं जल पान करें।
कहीं मुग्ध हो झर्झर निर्भर से तरु-कुंज में जो तप-ताप हरें॥
रहती जहाँ शाल रसाल तमाल के पादपों की प्रति छाया घनी।
चर के तृण आते, थके वहाँ बैठते थे मृग औ उसकी घरनी॥
पगुराते हुए दृग मूँदै हुए वे मिटाते थकावट थे अपनी।
खुर से कभी कान खुजाते, कभी सिर सींग पै धारते थे टहनी॥

(मृगीदुःखमोचन)

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सुमन विटप वल्ली काल की क्रूरता से।
झुलस जब रही थीं ग्रीष्म की उग्रता से॥
उस कुसमय में हा! भाग्य-प्रकाश तेरा।
अयि नव लतिके! था घोर आपत्ति-घेरा॥
अब तव बुझता था जीवलोक तेरा॥
यह लख उर होता दुःख से दग्ध मेरा॥

इन प्रसिद्ध कवियों अतिरिक्त और न जाने कितने कवियों ने खड़ी बोली में फुटकल कविताएँ लिखीं जिनपर द्विवेदीजी का प्रभाव स्पष्ट झलकता था। ऐसी कविताओं से मासिक पत्रिकाएँ भी रहती थी। जो कविता को अपने से दूर की वस्तु समझते थे वे भी गद्य में चलने वाली भाषा को पद्यबद्ध करने का अभ्यास करने लगे। उनकी रचनाएँ बराबर प्रकाशित होने लगीं। उनके संबंध में यह स्पष्ट समझ रखना चाहिए कि वे अधिकतर इतिवृत्तात्मक गद्य-