पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/३०९

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३०३ बाणयुद्ध-बाणलिङ्ग पण्डित थे। काव्यप्रकाशके टीकाकार पण्डितोंने बाणभट्ट बाणविद्या (स. स्त्री० ) वह विद्या जिससे बाण चलाना और हर्षदेवके सम्बन्धमें एक विलक्षण झमेला डाल | आये, तीरंदाजी । दिया है। काव्यप्रकाशको वृत्तिमें एक स्थान पर लिखा | बाणलिङ्ग ( स० क्ली० ) वाणाच नाथ कृतं लिङ्ग। नर्म- है "श्रीहर्षादर्धावकादीनामिव धनम्” अर्थात् श्रीहषसे दादि नदीजात शिवलिङ्गविशेष । जिस प्रकार धावक आदिको धन प्राप्त हुआ था। काव्य- नर्मदा नदीमें जो शिवलिङ्ग पाया जाता है वही प्रकाशके टीकाकार महेश्वर इसका अर्थ इस प्रकार करते बाणलिंग है। यह बाणलिंग सब लिङ्गों की अपेक्षा श्रेष्ठ है-"श्रीहर्षो राजा, धावकेन रत्नावली नाटिकां तन्नाम्ना | है। शिवलिङ्ग-पूजनमें कोमललिङ्गके मध्य मृल्लिङ्ग और कृत्वा बहुधनं लब्धम्" काव्यप्रकाशकी टीकामें वैद्यनाथ- कठिन लिङ्गके मध्य बाणलिंग ही सर्वोत्कृष्ट है । ने लिखा है-"श्रीहर्षाख्यस्य राज्ञो नाम्ना रत्नावली. "कोमलेषु च लिङ्गषु पार्थिव श्रेष्ठमुच्यते। नाटिकां कृत्वा धावकाख्यः कविबहुधनं लेभे' दूसरे टोका- कठिनेषु च पाषाणं पाषाणात् स्फाटिकं घरम् ॥ कारोंने भी इसी प्रकारका अपना मत प्रकाशित किया है। हैरण्यं राजतात् श्रेष्ठ हैरण्याद्धीरकं वरम् । काव्यप्रकाशके टीकाकार प्रसिद्ध विद्वानोंने जो लिखा है हीरकात् पारद श्रेष्ट बाणलिङ्ग ततः परम् ॥ उसको माननेके पहिले कुछ विचार करना आवश्यक है । (मेरुतन्त ६०) कालिदास-रचित मालविकाग्निमित्र नामक नाटककी प्रस्तावनामें लिखा है.-"प्रथितयशसां धावकसौमिल्लक नर्मदा, देविका, गङ्गा और यमुना आदि नदियों में विपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य वत्तमानकवेः कालि- बाणलिङ्ग पाया जाता है। इस लिङ्गका पूजन करनेसे दासस्य कृतौ किं कृतो बहुमानः।" अर्थात् प्रसिद्ध विद्वान इहजन्मका समस्त अभीष्टलाभ और परजन्ममें मुक्ति धावक सौमिल कविपुत्र आदिके बनाये नाटको के रहते होती है। हुए भी वर्तमान कवि कालिदासके नाटकका इतना बाणलिङ्ग भिन्न भिन्न चिह्न द्वारा भिन्न भिन्न आम यों किया जाता है। इससे दो बातोंका पता नामसे प्रसिद्ध है। यथा-जो लिङ्ग मधु और पिङ्गल लगता है, एक तो यह कि धावक एक प्रसिद्ध नाटक वर्णाभ तथा कृष्ण कुण्डलिकायुत होता है उसे स्वय- लेखक थे और कालिदाससे प्राचीन थे। अतः ७वीं/ म्भु लिङ्ग ; जो नाना वर्ण तथा जटा और शूलचिह्नयुक्त है सदीके हर्षदेवके नामसे कालिदाससे भी प्राचीन धावक उसे मृत्युञ्जय लिङ्ग, दीर्घाकार, शुभवर्ण और कृष्णविन्दु- कविने रत्नापली नामकी नाटिका बनायी हो, यह किसी चिह्नवालेको नीलकण्ठः शुक्लाभ, शुक्लकेश और तीन नेत्र प्रकार युक्तिसंगत नहीं समझा जा सकता । इसकी चिह्नयुक्तको महादेव; कृष्णवर्ण आभायुक्त और स्थूल- मीमांसामें केवल दो ही उत्तर पर्याप्त हैं। एक तो यह, विग्रहको कालाग्निरुद्र तथा मधु और पिङ्गलवर्णाभ, कि मालविकाग्निमिनके रचयिता कालिदास रघुवंशके श्वेत यज्ञोपवीतयुक्त, श्वेतपद्मासीन और चन्द्ररेखा भूषित रचयिता कालिदाससे भिन्न हैं। क्योंकि रघुवंशप्रणेता लिङ्गको त्रिपुरारि लिङ्ग कहते हैं। कालिदास विनयी थे और मालविकाग्निमित्रप्रणेता बाणलिङ्गमें महादेव सर्वदा अवस्थित रहते हैं। बाण- कालिदास उद्धत । लिङ्गकी पूजा करनेमें वेदिका बनाना आवश्यक है। क्योंकि, बाणभट्ट ७वीं शताब्दीमें विद्यमान थे। कहा उस वेदिकाके ऊपर लिङ्गस्थापन करके पूजा करनी जाता है, कि युएनचुवंगके भारत आनेके समय बाणभट्ट होती है। बिना आधारके पूजा नहीं करनी चाहिये। वर्तमान थे। सूर्य शतककर्ता मयूरभट्ट बाणके जामाता और जैन पण्डित मानतुङ्गाचाय इनके मित्र थे। ये तीनों। वह वेदिका ताम्र, स्फाटिक, स्वर्ण, पापाण और रौप्य इन- ही हषवर्द्धनके सभा-पण्डित थे। मेंसे किसी एककी होनी चाहिये । प्रतिदिन इस प्रकार वाणयुद्ध (संक्ली० ) बाणेन सह युद्ध। बाणराजके | वेदिकाके ऊपर बाणलिङ्ग रख कर पूजा करनेसे मुक्ति- साथ श्रीकृष्यका संग्राम । बाण देखो। .... .. . | लाभ होता है।