पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/५२८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


बोषगया कर गए हैं। यूएनचुअङ्गके वर्णनसे पता चलता है, कि | आये थे, वे अपने अपने भ्रमणको जो स्मृति चिह रख ४थी शताब्दीके मध्यभागमें इस मन्दिरका कुछ अंश गए हैं, वर्तमान अनुसन्धानमें वे सब माविष्कृत हो कर संस्कृत हुआ और मन्दिरको प्राङ्गनभूमि तथा वोधि- प्राचीन इतिहासमें नूतन ज्याति प्रदान करते हैं।* तरुतलस्थ वज्रासन फल्गु नदोकी बालुराशिसे परिपूर्ण ११वीं शताब्दी के प्रारम्भमें धर्मराज गुरु नामक एक हो गया ।* सुतरां इसके बादसे ही इस तीर्थ में मनुष्यों | व्यक्तिको ब्रह्मराजने महाबोधिमन्दिर बनवाने के लिए को आगमनाकांक्षा कम हो गई, इसमें सन्देह नहीं। भेजा। उक्त कर्मचारी १०३५ ई०में स्वर्णरञ्जित ताम्र- ____७वीं शताब्दीके प्रारम्भमें बौद्धधर्मके प्रधान शत् । छत्र दान कर गए हैं। एक और दूसरी शिलालिपिसे राजा शशाङ्कने यह बोधिद्र म काट डाला, किन्तु अभ्य जाना जाता है, कि १०७१ ई० में उक्त मन्दिरका निर्माण- न्तरस्थ बुद्धमूर्तिको उनके मन्त्री पूर्णबर्माके सुकौशलसे कार्य समाप्त न होनेके कारण उसी वर्ष एक और कर्म रक्षा हुई थी। यह मूर्ति भो कालक्रमसे नष्ट हो गई है। चागे भेजा गया। वे ७ वर्ष १० मास यहां पर रह कर ___इस बोधिवृक्षको पूर्वास्थामें लानेके लिए ६२० ई०में १०७६६०में निर्माणकार्य समाप्त कर स्वदेश लौटे थे। राजा पूर्ण वर्माने उसके चारों ओर २४ फुट ऊंची एक ____ अनन्तर १२वीं शताब्दीके शेष भाग ( अर्थात् ११६८ दीवार बनवा दी। ई०को मुसलमान आक्रमणके पहिले )में सपादलक्षपति चीन-परिवाजक यएनचुअङ्गके बाद ३८ में अशोकबल्लने इसके किसी किसी अशका पुननिर्माण यूअन चनने भारतमें आ कर चार वर्ष तक महाबोधिमें किया । वास किया । वे फिर ६६५ ई०को महाबोधि वजा १३वों और १४वों शताब्दीमे गया भादि स्थान सन देखने भापे । ६४०ई में हूलुन महाबोधि में चना- मुसलमानोंके हाथ आये। मेवाड़के राजेतिहाससे पता सनका दर्शन करनेके लिए भाये थे।+ लगता है, कि राजपूतवीरोंने विधर्मियोंके हाथसे पवित्र ७वीं शताब्दी में बौद्धराज हर्षवर्धनके समय जब ' गयाधामकी रक्षाके लिए प्राणपणसे युद्ध किया था। बौद्धप्राधान्य स्थापित हुआ, तव चीनदेशीय धौद्ध-परि- भट्टकवियोंकी आख्यायिकामें बुद्धगयाका कोई प्रसङ्ग नहीं वाजोंने भारतके साथ धर्मसम्बन्ध विस्तार किया था। रहने पर भी सहजमें अनुमान किया जा सकता है, कि ८वीं और स्वीं शताब्दी में ब्राह्मण धर्मकी प्रतिष्ठा होने पर मुसलमान बिजयके परवत्ती छः वर्ष तक विधर्मियों के बौद्धधर्म होनप्रभ हुआ । सुतरां चीनवासो बौद्धोंका। अत्याचारसे पीड़ित हो कर यहांके अधिवासिगण महा- भारतमें आना एकबारगी बन्द-सा हो गया। १०वीं , बोधिमन्दिर छोड़ भागे और जलबायुका प्रभाव न सह शताब्दी में मगधके पालवंशीय बौद्धराजाओंका अधिः सकनेके कारण उक्त प्राचीन कीर्तियां क्रमशः ध्वंसाव- कार होनेसे पुनः दोनों देशों में धर्म-प्रचारसम्बन्ध विस्तृत · शेषमें परिणत हो गई। हुआ। राजा महिपालके राजस्वकालमें (१०००.१०४० बुद्धगयामें जो सब भास्करशिल्प पाये गए हैं, उनकी ई०में) जो सब चीनपरिव्राजक महाबोधिके दर्शन करने आलोचना करनेसे भारतीय शिल्पेतिहासका एक भपूर्व

  • बहतोंकी धारणा है, कि ब्रह्मराज पदोड परिच्छेद बढ़ जाता है । अशोकका महाबोधिमन्दिर

निर्माणकार्य सम्पादित हुभा है। | और प्रस्तरप्राचीर एक अलौकिक कीर्ति है । उक्त मन्दिर tJulien's P.ven Thsang Vol, 11p, 101 और उसका तोरणद्वार, प्राचीन महावोधिसङ्गाराम, पा इसके द्वारा अनुमान होता है, कि इन्होंने सम्भवतः इस चंक्रमणचैत्य, बोधिद्म, प्राङ्गणमध्यस्थ स्त्प तथा समय बोधिवृषके मूलस्थ पुरातन बज्रासनको दूसरी जगह स्था- चीन पुरोहित युन-षु १०२१ ईमें बुद्धकी माहात्म्य पित किया होगा । १८८१ हमें यह सिंहासन देवलके मध्य प्रकाशक कीर्त्तनगाथा प्रस्तरमें भङ्कित कर गए हैं । Royal पोस्ताके भग्नावशेषमें पाया गया है। Isiatic Society's Journal 1881, Vol. X111. p. 557 + Indian Antiquery Vol, X.p, 209 Indian Antiquary, X, 341-346,