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संवत् १४०५ को मगहर नगर में इहलोक छोड़ दिया। ऐसा होने से प्रायः १ शतक वर्ष इनका परमायु आता है। यह क्या सम्भव है। किन्तु भक्तिमालाग्रन्थ और कई मुसलमानी इतिहास के ग्रन्थ पढ़ने से हम समझते—कबीर सिकन्दर लोदी के समसामयिक रहे। १५५४ संवत् सिकन्दर ने राज्य पाया था। अतएव सम्भवतः मागशी उस समय कबीर विद्यमान रहे। सिखों के धर्मगुरु नानक ने कबीर का मत अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। एतद्भिन्न सत्नामियों, साधुओं, श्रीनारायणियों और शून्यवादियों के ग्रन्थों में भी इनका मत मिलता है। इससे समझ पड़ता—उक्त सम्प्रदायग्रन्थों में इनका मत ले साथ-साथ अपना धर्म प्रचार किया है।(अन्यान्य विवरण कबीरपन्थी शब्द में देखो) कबीर-उद्-दीन्—शाह-उद्-दीन इरकी के पुत्र। दिल्ली-वासी बादशाह अला-उद्-दीन के समय यह जीवित रहे। इन्होंने उनके अभिमव पर एक पुस्तक लिखा था।
{{outdent|कबीरपन्थी—सम्प्रदाय विशेष। इन्होंने महात्मा कबीर का प्रवर्त्तित धर्ममत अवलम्बन किया है। कबीरपन्थी सकल देवताओं की अपेक्षा विष्णु के प्रति अधिक भक्ति दिखाते हैं। रामानन्दी प्रभृति वैष्णव सम्प्रदाय के साथ यह सद्भाव रखते और आचार-व्यवहार में भी मिलते-जुलते हैं। इसी से कितने ही लोग इन्हें वैष्णव कहते हैं। कबीरपन्थी अपरापर वैष्णवों की भाँति तिलक लगाते, नासिका-पर चन्दन वा गोपीचन्दन की रेखा बनाते, कण्ठ में तुलसीमाला लटकाते और हाथ में भी जप की माला घुमाते हैं। किन्तु यह इस तिलकमुद्रा को वृथा बाह्याडम्बर मात्र समझते हैं। वास्तविक इनकी विवेचना में शास्त्रोक्त देवदेवी का पूजन अथवा क्रिया-कलाप का अनुष्ठान प्रयोजनीय नहीं ठहरता। कबीरपन्थियों में प्रधानतः दो दल होते हैं—गृहस्थ और संन्यासी। गृहस्थ सब-सब जातिगत और वर्णगत आचार-व्यवहार अवलम्बन करते हैं। फिर कोई निज धर्म को छोड़ हिन्दुओं के उपास्य देवों को भी पूजता है। संसारत्यागी संन्यासी एकमन नयन के अगोचर केवल कबीरदेव का ही भजन करते हैं। उन्हें |
गुरु के निकट मन्त्र लेना नहीं पड़ता। वह केवल ईश्वर ही को प्रायभर धर्मगान करने को ही उपासना समझते और अपनी इच्छा के अनुसार वेषभूषा रखते हैं। फिर कोई नग्नप्राय होकर भी पथ-पथ घूमता फिरता है। संन्यासियों के महन्त मस्तक पर टोपी लगाते हैं। उक्त दोनों दल प्रायः १२ शाखा में विभक्त हैं। इन १२ शाखाप्रवर्त्तकों के नाम नीचे लिखते हैं,— (१) श्रुत गोपालदास—सुखनिधान के प्रणेता रहे। इनके शिष्य-परम्परा से द्वारका के अखाड़े, वाराणसी के कबीर-चौरा, मगहर के समाधि और जगन्नाथ के अखाड़े पर अधिकार रखते हैं। (२) भगोदास—बीजक के रचयिता थे। इनके अनुयायी मिथिला-प्रन्थि धनौती नामक स्थान में रहते हैं। (३) नारायण दास और (४) चूड़ामणि दास—धर्मदास नामक वणिक् के पुत्र तथा गृहस्थ रहे। इसी से सब लोग इन्हें 'वंशगुरु' की भाँति सम्बोधन करते थे। आजकल चूड़ामणिका वंश समाज-भ्रष्ट और नारायण का वंश नष्ट हो गया है। (५) जीवनदास—सत्नामी सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक थे। (सत्नामी देखो) (६) जगूदास की गद्दी कटक में है। (७) कमाल को लोग कबीर का पुत्र बताते हैं। किन्तु इस पर पर कोई विशेष प्रमाण नहीं मिलता। यह विरक्त रहते थे। इनके मतावलम्बी योगाभ्यासी होते हैं। (८) टकसाली—वरदावासी थे। (९) ज्ञानी—सहसराम के निकट सभनी ग्राम में रहते थे। (१०) साहबदास—कटकनिवासी और मूलपन्थी नामक सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक थे। (मूलपन्थी देखो) (११) नित्यानन्द और (१२) कमलानन्द—दक्षिणवासवासी थे। सिवा इनके दान-कबीरी, मंगरेल-कबीरी, हंस-कबीरी प्रभृति दूसरी शाखा भी विद्यमान हैं। |
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कबीर—उद्-दीन् कबीरपन्थी