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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४०३

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काफी

सहायक है। काफौकी क्षषिमें बड़ा. यन करना पड़ता है। अतिशय मेध चढ़ना वा प्रतिवेगसे वायु चलना, इसके लिए अशुभ है। जोरसे हवा चलने पर काफीके फूल झड़ जाते हैं और फल नहीं लगते, सुतरां कषक प्रायः पाधे शस्यको क्षति उठाता हैं। अत्यन्त ग्रीम होनेसे वृषके लिये छाया आवश्यक है। -" समुद्रके संपकूलमें काफी अच्छी नहीं होती। है, अफरीका अन्तर्गत वसीमियाके साथ समसूत्रपातसे भारतमें पड़नेवाले स्थानोमें यह भली भांति उपजती अच्छी हैं।

पबसौनियामें इसके फलको "बुन" कहते हैं। प्राचीनकालमें मिसर और सिरीयामें यह नाम प्रचलित था। उस समय सिरीयाके रहनेवाले इस वीजको केवे (Cave) कहते थे और पका कर खाते थे। अरबी ग्रन्यादिको पालोचनाके अनुसार शेण शहाबुद्दीन धमानी नामक किसी व्यक्तिने अफरीकाके उपकूलमें काफीका व्यापार देख कर सर्व प्रथम मदनबन्दर में एक दुकान खोली थी। १४७० ई०को वह मर गये। सुतरां १५वीं शताब्दीके मध्यभागमें काफी परवमै पहिले आई। १५७१ ई०को यह यमन, मका, कायरो, दामास्कस, अलेपो और कुनस्तुनियामें फैली थी। १५५४ ई.को कुनस्तुनतनियामें सर्वप्रथम काफीका एक पानागार स्थापित इमा। १५७३ ई०को पलेपो शहरमें रनडल्फ नामक किसी युरोपीयनने इसका प्रथम परिचय पायां । फिर का नहीं सकते कि भारतमें काफी कैसे प्रायो। अनेकोंके कथनानुसार बाबा बूदन नामक एक मुसल. मान सन्यासी मकेसे लौटते समय ७ वीज लेकर महिसर पहुंचे थे। दक्षिण भारतमें उता मतपर बड़ा विश्वास करते हैं। इसीसे उसका समस्त प्रमूलक होना ध्यानमें १५७६ से १५००० तक लिनसोटेन (Jan Huygen van Linschoten ) नामक एक श्रीसन्दाज इस देशमें घूमनेको पाये थे। वह अपने उल्लेख योग्य है। भमत्तान्तमें मसवार पकूलके समस्त उत्पन्न द्रव्योंकी वर्षमा कर गये हैं। किन्तु उसमें काफीका नाम नहीं मिलता। उनी समसामयिक लेखकोंके

पुस्तकमें मिसरियोंके बुन फवका काय खानेको बात देखते हैं। इससे अनुमान होता है कि भारतवर्ष में पाते समय लिनसोटेनने काफीको बात नहीं सुनो। डाकर पोयातिचने विलायतमें "हाउम- अवकामम"के समक्ष साच्य देते समय कहा था कलकत्तेके कम्पनी. वागमें जो काफी होती उसको छोड़ इमने दूसरी..कोई काफी नहीं उसके पौके मिलनेवाला विवरण भी १८वौं शताब्दीका विवरण है। सिंहलम पोर्तगोजाँके है। विशेषतः नीलगिरि उपत्यकामें काफी की उत्पत्ति दौरात्मासे पहले अरवनि इसे प्रथम प्रचार किया था।

पूर्व भारतीय होपयग्यो१६९० ई. के पन्तमें गवर्णर वान हुरनने ( Van Hoorne ) परब वपिकोंसे बीज संग्रह कर यवनोपके क्टेविया नगर में लगाये थे। इनसे जो पेड़ उगे उनका एक पौदा इङ्गलैड पहुंचाया गया। फिर इङ्गलैंडके वृक्षोंका एक पौदा १७१८० को सुरिनाम नामक स्थान में पाया था। इसके दश वर्ष पोछे अमष्टरडमके काफीबागसे एक पौटा १४वें लुईको पढौकन दिया गया, फिर उसका पौदा पश्चिम भारतीय दोपपुञ्जमे रोपित हुआ। इसमे नतम महाहीपमें काफोकी खेती फैश पड़ी। अमेरिका और यूरोपको काफी कृषिका मूल यवद्वीप है। किन्तु आजकल अमेरिकाको भांति पृथिवीके दूसरे स्थानमें कहीं काफी नहीं उपजती। अकेले ब्रेनिलम ही पांच करोड़ तीन चाख पौदोसे यन के साथ फल संग्रह किया जाता है। फिर कोष्टारिका, गोयाटिमाचा, वेनजुइना, गोयाना, पेरू, बनिविया, जाम का, किउवा, पोटारिका, अन्यान्य पश्चिम भारतीय होप, अष्ट्रेलियाके मध्य क्विन्सलेण्ड, पूर्वमारतीय दीपावली के मध्य सुमात्रा, बोरनियो, मजयउपदोप, श्यामदेग, सिंगा- पुर प्रति प्रणाली मध्यगत दोपविभाग और फिजी नहीं पाता।होपमें इसकी खेती होती है। वेजिल और यदीपकी भांति प्रावाद जमीन दूसरी जगह नहीं। उसके पीछे प्राबाद नमोन्.भारतवर्ष और सिलदीपको आवाद जमीन उद्देश्य योग्य हैं।

पाद देश में इस प्रथाके फैलने से मुसलमान धर्म- याजक काफीपानके विरूह उठे थे। कारण मसजिद और.