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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 4.djvu/४५९

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कामरूप

विश्वास और भक्ति करते थे। रुद्रसिंहके पुत्र शिव सिंहने भी सपरिवार उनसे मन्त्र लिया। शिवसिंह 'स्वर्गदेव सपरिवार भट्टाचार्य महाशयके उपास्य देवी- मन्त्रमें दीक्षित हुये। किसी समय शिवसिंहको छत्रभन दोष नगा था। ज्योतिषी पण्डितों और मन्त्रियों ने परामर्श किया। फिर वह शिवसि'को प्रथमा पत्नी रानी फूलेखरीको सिंहासन पर बैठा कर राजकार्य चलाने लगे। उसी प्रकार शिवसिंहके दीर्घ राजत्व में उनको चार महिषी-फूलेश्वरी, प्रमत्तेखरी, द्रौपदी, वा अम्बिका और अनादेवी या सखरीने बारी बारी सिंहासनाधिरोहण किया। फलेखरी देवीके प्रति विशेष भक्तिमती थीं।एक वर्ष दुर्गोत्सवके समय उन्होंने मोयामरियाकै महन्त और अन्यान्य स्थानके कई महन्त मिमग्वस देकर बुलाये थे। फिर उन्होंने भगवतीका प्रसादित सिन्दूर, रक्तचन्दन और वलिका रक्तादि छिड़क उन्हें लाछित किया। दूसरों की अपेक्षा मोयामारीवाले महन्तके हृदय पर उच्छा व्यवहारसे दारुण भाघात लगा था। उन्होंने सब शिष्यों को बुलाकर कहा,-"इसका प्रति शोध लेना आवश्यक है। उसके लिये प्राणपणसे चेष्टा करनी पड़ेगी। कालक्रममे वह भी सिद्ध हो १७५१९०को राजेश्वर राजा बने। उनकी अन्तिम दशामें मोयामारीके महन्तने शिष्यों को एकत्र कर शिवसिंह रानाके पनीवत अपमानका प्रतिशोध लेने के लिये सबसे साहाय्य मांगा। शिष्य भी गुरुके ' अपमानका बदला सेनेको प्रतिघ्राबद्ध हुये। उसके पीछे लक्ष्मीसिंहको राज्य मिला। राजा रुद्र मिहके पन्तिम समयमें उन्होंने जन्म लिया था। पाकसिगत सौसादृश्य न रहनेसे गना रुद्रसिइ उन्हें अपना पुत्र न मानते थे। उसीसे राज्य अन्यान्य प्रधान लोगों में भी उनका वैसा पादर न रहा। फिर राजाके कुलगुरु पर्वतिया गोसाई भी उन्हें दीक्षा देने पर असम्मत हुये। समीसिहने खीय विद्यागुरु रमानन्द भट्टाचार्य नामक किसी प्रध्यापकको दीक्षागुरु बना लिया। बाल्यकाल में उन्होंसे राजाने शिवको पूजा खोखी थी। फिर उन्होंने दीक्षा भो शिवमन्त्रको ही

ली। राजगुरु होनेरी रमानन्द ने बहुत इति पायो थी। फिर वह पहुमरिया गोसाई नामसे पाख्यात हुये। उनको वैसी पदमर्यादासे अन्यान्य महन्त वहुत चिढ़े थे । विशेषतः मोयामारीके महन्त कटु वचन प्रयोग करनेसे गनाके विरागभाजन हो गये। उसी वर्ष पाश्विन मासमें वर्गदेव नौका पर भमणार्थ बाहर निकले थे। साथ ही स्वतन्त्र नौकामें बड़बडुवा मोयामारीके महन्तने साचात् कर क्षमा मांगी थी। किन्तु बड़बड़वाने महन्तको यथेष्ट विद्रूप किया। महन्तने उससे अपना प्रतिपय अप- मान समझा था। उनके मनमें पूर्व अपमान भी दूना भड़क उठा। उन्होंने बुला कर भीतर ही भीतर थियोंको दलबद्ध किया। फिर महन्तने रुद्रसिंह स्वगंदेवके किसी ताड़ित राजवंशीयको दलपति होने के लिये बुलाया था। नाहरखोरा और राघमरान दो व्यक्ति सेनापति बने । विद्रोहमें योग देनेवाले कुरा,. कुल्हाड़ा, कमान, कांता, बरछा प्रमृति प्रस्त्रोंसे समित प्रायः नौ हजार पादमी अग्रहायणके प्रथम ही रङ्गापुरकी पोर चल खड़े हुये। प्रवादानुसार महन्तने अन्यायसे लक्ष्मोसिंहको राजा बनाने के लिये उस युद्ध. यात्रा की थी।

मोयामरियाके लोगोंका उक्त उद्योग देख भूपाई बड़ गोसाई, बूढ़े गोसाई कीर्तिचन्द बड़बडुवा प्रभृति' मन्त्रियों ने भी परामर्श कर एक दल संन्य भेजाया। युद्दमें राजसैन्य हार गया। मोयामरियाके सैन्यदलने नगर पर अधिकार कर राजा, सेनापति और बड़बडुवा. प्रभृति मन्त्रियों को बांध लिया। राजा जयसागरके निकट बन्दी रहे और गोसाई, बूढ़े गोसाई प्रभृति प्रधान प्रधान लोग मारे गये। फिर मोयामरियावालोंने कोर्तिचन्द्रको सूली दे उनके पुत्रों को बध किया। खोरा- मरानके पुत्र रमाकान्स गनाये। उस घटना अग्र- हायणकी थी। किन्तु चैव मासमें लीकान्तकै पक्षसे कुंये, गयां, घनशाम प्रभृति कई लोगोंने सामिश कर रमाकान्सका दासत्व स्वीकार किया। उनके कौयससे रमाकान्त. मोयामरीयाके सेनापति प्रमसिने अपने प्राए गंवाये। उसके पीछे सच्चीसिह रावा बने। सनी