पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५७

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मस्तिष्क- पस्तो ५६ जोधन भर के लिये निर्वाध और यायपान्य हो जाता है। क्योंकि गुरुपाक भोजन देनेसे पाचनक्रिया में गड़बड़ी इन दोनों तरहके रोगों के प्रतिकारफे लिपे मस्तिष्कफे होती है जिससे मस्तिष्क फिर विस्त हो सकता है। रखताधिषयको कम करना चाहिये, जिससे मस्तिएको नीयूका रस, सिहाड़ा, पके फल, मंगूर आदि सुगीतल अधिक रपतका सञ्चार न होने पाये। फल और जलधारली या इमली और वारली पका कर ऐसा करनेके लिये रोगीको मयंदा निश्चेए और . सानेको देना चाहिये । लघु भोजन मात्र हो यिशेष फल. शान्तमावसे निजम स्थानमें रखना फतव्य है। क्योंकि प्रद है। अधिक लोगों के साथ रहनेसे शब्दों के आघातपतिधातः इस रोगमें नाफसे खून पहना, शिरच्छेद (फस्त से चिन्तास्रोतके व्याधात या इन्द्रिय माविको उत्तेजना., खोलयाना ) और रगमें जोक लगा कर रक्त सुसपानेके से रोगके बढ़ जानेका भय रहता है। रोगोफे घरमे ' सिवा और कोई लाभप्रद औषधि दिखाई नहीं देतो। अधिक प्रमाणका रहना भी उचित नहीं। ऐसे रोगियों शिरा और धमनियोंसे निरन्तर रक्तका गिरना मसम्मय • के लिये कुछ अन्धकारयुक्त तथा नातिशीतोष्ण स्थान है। इससे नाकसे खून गिरगाही उत्तम है। नाकफे हो विशेष लाभप्रद है। किन्तु यदि ममफे मुनापिक ! छिद्रों में कुछ घास पात हूँस देनेसे दी धीरे धीरे रक रोगोको मित मिल जाये, तो उसके मधुर प्रेमालापसे बहने लगता है। रोगीको मायेमें जहां विशेष दर्द हो रोगीकी मानसिक दुर्यलताका बहुत कुछ लाधय हो रहा है, उस जगहमें झोंक लगा दिया जाये, तो उससे सकता है। बिलकुल अन्धकारपूर्ण स्थानमें अधिक | धड़ा उपकार होता है। समय तक रहनेसे रोगी पर विपादोन्मत्तता ( Mcian- ___यदि उसको यमासीर हो, तो उससे निरन्तर गून cholin )का माझमण होता है। बहते रहनेसे मी लाम होता है। यदि दो सफे, तो उस रोगीकी इच्छाफे विपरीत कोई काम करना उचित ) स्थानमें जोक लगा दे। यदि पयासीरका मशा भीतर. नहीं। यदि कभी रोगो किसी भसम्मय विपयको अय. की ओर हो, तो पापधि द्वारा यत्तीका प्रयोग करना तारणा करे अथया किसी दुष्प्राप्य या बहुमूल्य यस्तुको अथया मधु मुसय्यर या घृतकुमारी और सैन्धय लपण प्राप्तिको कामना करे, तो उसे छलपूर्वक पातॊमें भुलथा कर मिला कर लेप करना चाहिये। इसी तरह यदि रोगी तोपामोदसे उसके मनको सन्तुष्ट कर देना चाहिये । पयोंकि स्त्री हो और उसका रजाम्राय बन्द हो गया दी, तो उसके मतको विपरीतता होनेसे उसके प्रदाहको वृद्धि रजाप्राय करानका यथाविधि यन करना चाहिये। और मस्तिष्कको विकृति बढ़ जायेगी। इससे पराव फल ) उपस्थि हो सकता है। मलयात किजिसको यह रोगोको कभी कपड़े से टक कर मत राना. ऐसा प्यार कर, फिर उसके शरीर स्वास्थ्य के लिये विशेष यरन करना चाहिये, कि रोगी उएडा गौर साजी हामिकर भी न हो और मधुर गोत, दिलचस्प किस्से, जो याम सास छोर ओर ले मफे भीर अपने मस्तिक- चित्त संयत कर मानसिक चिन्ताको प्रशमित कर सफे को शीतल एप सफे। फिर मुड़या कर उसमें मिनी. ऐसे हो विषयों में उसको संलग्न रहना चाहिये। गार और गुलावका जल मलना चाहिये, इस उच्च जल- ,' सायर पुमरदेवका कहना है, कि किसी जलपूर्ण से पैर धोते रहना चाहिये। क्योंकि इससे मस्तिकका पानमै युन्द-युन्द करके जल टपकाये और उसकी संख्या प्रदाह कम होता है। उसी तरह रोटी और दूधकी गिनने के लिपे रोगीको कहे । ऐसा करनेसे रोगोफे चित्त पुलटिम देनो नाहिये। यदि रोग इससे माँ शान्त न को एकामता धनेसे बहुतेरे स्थल में सुफल होता देखा होता रेसा हो, तो गरदनमें भोर मस्तक लियर देना कर्तव्य है। गया है। इस तरह निम्न मधुरमुरलदरोम रोगोफे चित्त मस्ती (फा खो०) मत्तता, मतयालापन । २ भागको लगा मकने पर रोगोको मोद भो मा सकती है। प्रवल कामना, मसनको उत्तर २५६ घाय पेसी माया रोगोको हला पध्य देना ही उत्तम जो कुछ विशिष्ट प्रक्षों अथवा परया भादिमस विशेष