पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष सप्तदश भाग.djvu/५७५

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मालागुंगा–पालिक ५०३ हैं। सुगंधके लिये इसमें कपूर कचरीको जड़ भी पोस मालाधरयसु-श्रीकृष्णायिजयके प्रणेता प्रसिद्ध पद कर मिलाई जाती है। (वि०)२ मालागिरि रंग में रंगा | कवि। इनको उपाधि गुणराज सा थी। हुआ। ___गुणराज खो देखो। मालागुण (सं० पु० ) १ मालामन्धनसूत्र, माला गुथनेका | मालाघाट ( सं० पु०) दिल्यायदानके अनुमार यौद्धोंके सूता । २ करठहार, गले में पहननेका गहना। एक देवताका नाम । मालागुणा (सं० स्त्री०) एक प्रकारका असाध्य रोग जिसे | मालाप्रस्थ (सं० पु०) एक प्राचीन नगरका नाम । दता भी कहते है। | मालाफल । सं० लो०) रुद्राक्ष । मालाप्रन्थि (सं० पु०) मालेय प्रन्थिरस्य । मालार्वा, मालामणि (सं० पु० ) रुद्राक्ष ! पल्लो नामक दूय । मालामनु (सं० पु०) मालामन्त । माला (सं० पु०) एक राजकवि । इन्होंने मालतीमाधय मालामन्त (सं० पु०) मन्त्रविशेष । और वृन्दावन नामक ग्रन्थकी टोका लिखी। मालामय ( सं०नि०) बहु मालायुक्त । मालातृण (सं० को०) मालाकारं तृणम । ।भस्तण. : मालामाल (फा० वि०) धनधान्यसे पूर्ण, संपन्न । खयो। २ आन्ध्रदेश में प्रसिद्ध रोहिल नामको घास। । मालारिष्टर (सं० सी०) पाटी लता। इसके पत्तोंकी मालातृणक (सं० लो०) मालातृण खार्थे कन् । भूस्तण, गणना सुगंधि द्रव्यमें होती है। घटियारी नामको घास। पर्याय-रोहिप, भति, भमिक मालालिका ( सं० नो०) माला भलतीति अल-पल, कुटुम्बक, भूस्तृण, पालघ्न, छवातिच्छन। भायप्रकाश- राप, इत्यश्च। पृका, असयरग। फे मतसे पर्याय-गुह्यवीज, भूतोक, सुगंध । गुण-- : मालाली (सं० स्ना० ) मालामलतोति भल्भच, वता जामुनके जैसा उत्करगंधयुक्त और भूमिलग्न । (भरत )। डोम् । पृणा, असवरण। २ आन्ध्रदेश में प्रसिद्ध रोहिप तृण। मालावती ( सं० स्रो०) एक संकर रागिनोका नाम । यह मालादीपक (संको०) अर्थालड्रारभेद । इसमें एक पंचम, हम्मो, नट और कामोदके संयोगसे बनती है। धर्मके साथ उत्तरोत्तर धर्मियोंका संबंध वर्णित दोता है। कुछ लोग इसे मेघरागको पुत्रवधू भी मानते है। या पूर्य-कथित बस्तुको उत्तरोत्तर यस्तुके उत्कर्षका हेतु ) मालावत् ( सं० त्रि०) माला विद्यतेऽस्य माला-मतुप । . दतालाया जाता है। इस अलङ्कारको कविराज मुरारि- मालाविशिष्ट मालाधारी। । दानने संकर अलङ्कार माना है और इसे दोपक तथा | मालाश्रेष्ठतमा (सं० स्त्रो०) तुलसीपक्ष । शृङ्खलालंकारका समुन्धय कहा है। | मालि (सं० पु०) एक राक्षस । प्रामणो गन्धको कन्या मालादुर्या (सं० स्रो०) माला इव प्रन्पियुक्ता दूर्वा देवयतोके गर्भसे राक्षस सुफशके भौरससे यह उत्पन दूर्वाविशेष, एक प्रकारको छ । इसमें बहुत-सी गाठे] दुमा था। (रामा• उत्त० ५ सर्ग) होती है। पर्याय-पलोदा, अलिदूर्वा, मालाग्रन्थि, | मालिक (सं० पु०) मालास्य पण्या ( तदस्य पययम् । पा परिचला,, प्रन्थि, शलमयि, येलनी, प्रन्थिमूला, ५१ ) माला ठक, यदा मालामन्यनं शिल्पमस्पेति रोहस्पो , पर्यवल्ली, शियागा । गुण-सुमधुर, माला ( शिल्पम् । पा ४५५) इति डम् । १माला- तिक्त, शिशिर, पित्तदोषनाशक और फफ, पमि और कार, मालो। २ पक्षिपिशेष, एक प्रकारको चिहिया। तृष्णापह। ३ रजक, धोपी। ४ द्राक्षामध, दासको शराव। ५ मालाधर (सं० वि०) मालाधारक, मालाधारी । २ मलिकायिशेप, एक प्रकारको चमेली । ६ मध, शराद सतह अक्षरोंके एक यणिक वृत्तका नाम। इसके प्रत्येक सप्तला, सातला। ८ मतसी, पलसो। . चरणमें नगण, सगण, जगण फिर सगण भोर यगण | मालिक ( अ० पु०) १ ईयर, अधिपति। २ सामी ।। तथा अन्तमें एक लघु और फिर गुर होता है। पति, गौदर। .