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भारतीय हिन्दू महासभा
 

सन् १९४१-४२ के बजट में, भारतीय सेना के व्यय के लिये, कुल मिलाकर, ८४ करोड़ १३ लाख रुपये मज़र किये गये थे । युद्ध-सामग्री तथा अस्त्रशस्त्र-निर्माण के लिये भी कारग्वाने खोले जा रहे हैं । सन् १९४१ से भारत में इवाई जहाज भी तैयार होने लगे हैं ।। भारतीय हिन्दू महासभा–अप्रैल १९१५ में हिन्दू महासभा की स्थापना हुई । प्रारम्भ में इसका उद्देश हिन्दू-समाज की सामाजिक उन्नति करना था, किन्तु इस दिशा में महासभा कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर सकी । बहुत कम इसका प्रचार था । किन्तु असहयोग के बाद जब देश में साम्प्रदायिक समस्या उग्र हो उठी, तो हिन्दू महासभा में भी जान पडी और सामाजिक क्षेत्र को छोडकर महासभा धीरे-धीरे राजनीतिक अखाड़े में उतर | आई । सन् १९२६ में, प्रान्तीय कौसिलो के चुनावो मे, महासभा की ओर से | तो नही किन्तु स्वतन्त्र काग्रेस दल' के नाम पर, उम्मीदवार खड़े किये गये । । तब से ही महासभा मुसलिम लीग की प्रतिस्पर्धा में एक राजनीतिक तुर्की-ब| तुर्की सस्था के रूप में परिणत होगई है, यद्यपि है मुसलिम लीग की भॉति यह एक साम्प्रदायिक सस्था ही । महामना प० मदनमोहन मालवीय बहुत वषों तक इसके संरक्षक रहे। इसके बाद लाला लाजपतराय तथा भाई परमानन्द ने इस संस्था को पुनसंगठित कर इसे नवजीवन प्रदान किया । हिन्दू महासभा का लक्ष्य भारत में पूर्णस्वराज की स्थापना है । महासभा ने १९२८ मे साइमन कमीशन का बहिष्कार किया । साम्प्रदायिक निर्वाचन-प्रणाली को इसने सदैव घोर विरोध | किया है। राजनीति में इसका दृष्टिकोण सदैव राष्ट्रीय रहा है और हिन्दू जाति, हिन्दू-सस्कृति, हिन्दू-सभ्यता तथा हिन्दू राष्ट्र के गौरव और उत्थान की रक्षा और भारत के लिये सब उचित उपायों द्वारा पूर्ण स्वराज्य प्राप्त करना महासभा का लक्ष्य है। यद्यपि दिसम्बर ४२ के अधिवेशन में महासभा घोषणा कर चुकी है कि यदि ब्रिटिश सरकार ने तत्काल देश को उसकी अधिकार नही सौंपा तो वह अप्रैल ४३ के बाद 'सीधी कार्यवाही का प्रयोग करेगी । जब से वीर विनायक दामोदर सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष चुने ।