पृष्ठ:Ramanama.pdf/११

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बीजारोपण छह-सात सालकी अम्रसे लेकर १६ वर्ष तक विद्याध्ययन किया, परन्तु स्कूलमे मुझे कही धर्म-शिक्षा नहीं मिली । जो चीज शिक्षकोके पाससे सहज ही मिलनी चाहिये, वह न मिली। फिर भी वायुमडलमे से तो कुछ न कुछ धर्म-प्रेरणा मिला ही करती थी। यहा धर्मका व्यापक अर्थ करना चाहिये। धर्मसे मेरा अभिप्राय है आत्म-भानसे, आत्म-ज्ञानसे। वैष्णव सप्रदायमे जन्म होनेके कारण बार-बार वैष्णव मदिर (हवेली) जाना होता था। परन्तु असके प्रति श्रद्धा न अत्पन्न हुओ। मन्दिरका वैभव मुझे पसन्द न आया। मदिरोमे होनेवाले अनाचारोकी बाते सुन-सुनकर मेरा मन अनके सम्बन्धमे अदासीन हो गया। वहासे मुझे कोसी लाभ न मिला। परन्तु जो चीज मुझे अिस मन्दिरसे न मिली, वह अपनी धायके पाससे मिल गयी। वह हमारे कुटुम्बमे अक पुरानी नौकरानी थी। उसका प्रेम मुझे आज भी याद आता है। मैं पहले कह चुका हूं कि मै भूत-प्रेत आदिसे डरा करता था। अिस रम्भाने मुझे बताया कि जिसकी दवा रामनाम है। किन्तु रामनामकी अपेक्षा रम्भा पर मेरी अधिक श्रद्धा थी। अिसलि बचपनमे मैने भूत-प्रेतादिसे बचनेके लिअ रामनामका जप शुरू किया। यह सिलसिला यो बहुत दिन तक जारी न रहा, परन्तु जो बीजारोपण बचपनमे हुआ, वह व्यर्थ न गया। रामनाम जो आज मेरे लिखे अक अमोघ शक्ति हो गया है, सुसका कारण अस रम्भाबाजीका बोया हुआ बीज ही है। परन्तु जिस चीजने मेरे दिल पर गहरा असर डाला, वह तो थी रामायणका पारायण । पिताजीकी बीमारीका बहुतेरा समय पोरबन्दरमे गया। वहा वे रामजीके मदिरमे रोज रातको रामायण सुनते थे। कथा कहनेवाले थे रामचन्द्रजीके परम भक्त बिलेश्वरके लाधा महाराज । अनके सम्बन्धमे यह कहानी प्रसिद्ध थी कि अन्हे कोढ हो गया था। अन्होने कुछ दवा न की- सिर्फ बिलेश्वर महादेव पर चढे हुओ बिल्वपत्रोको कोढवाले अगो पर बाधते रहे, और रामनामका जप करते रहे। अन्तमे अनका कोढ समूल नष्ट हो गया। यह बात चाहे सच हो या झूठ, हम सुननेवालोने तो सच ही मानी।