तृतीय व्याख्यान
आपेक्षिकता का सामान्य सिद्धान्त
THE GENERAL THEORY OF RELATIVITY
पिछली सभी अभिधारणायें इस अनुमान पर आधारित थी कि किसी भी भौतिक घटना के वर्णन के लिए सभी जड़त्वीय निर्देश तंत्र समतुल्य होते हैं लेकिन गति की विभिन्न प्रावस्थाओं में निर्देश तंत्र का चयन प्रकृति के नियमों के सूत्रीकरण की सरलता के अनुरूप किया जाता है। हमारे पूर्व के विचार-विमर्श के अनुसार न तो दृश्य पिण्डों में और न ही गति की अवधारणा में अन्य सभी कीअपेक्षा निश्चित गति की स्थितियों के प्रति इस प्राथमिकता का कोई कारण हम सोच सकते हैं; इसके विपरीत इसे दिक्-काल सांतत्यता का एक स्वतंत्र गुण माना जाना चाहिए।
जिस प्रकार न्यूटन के दृष्टिकोण से दोनों कथनों का उच्चारण आवश्यक था, टेम्पस एस्ट एब्सोल्यूटम, स्पैटियम एस्ट एब्सोल्यूटम, उसी प्रकार सापेक्षता के विशेष सिद्धांत के दृष्टिकोण से हमें कहना होगा, कंटिन्यूम स्पैटि एट टेम्पोरिस एस्ट एब्सोल्यूटम। इस अंतिम कथन में एब्सोल्यूटम का अर्थ न केवल "भौतिक रूप से वास्तविक" है, बल्कि "अपने भौतिक गुणों में स्वतंत्र, भौतिक प्रभाव रखने वाला, लेकिन स्वयं भौतिक परिस्थितियों से प्रभावित न होने वाला" भी है। विशेष रूप से जड़त्व के सिद्धान्त से ऐसा प्रतीत होता है कि यह हमें दिक्-काल सांतत्यता को भौतिक रूप से वस्तुनिष्ट गुणधर्म प्रदान करने के लिए विवश करता है। जैसे न्यूटनीय यांत्रिकी में समय निरपेक्ष है और दिक्काश निरपेक्ष है दोनों वाक्य आवश्यक हैं, वैसे ही विशिष्ट आपेक्षिकता सिद्धान्त के अनुसार हमें कहना चाहिए कि दिक्-काल सतत निरपेक्ष है। यहाँ निरपेक्ष (absolutum) का अर्थ न केवल "भौतिक रूप से वास्तविक" है बल्कि यह भी है कि "अपने भौतिक गुणधर्मों के अनुसार स्वतंत्र, जिसका भौतिक प्रभाव हो परन्तु स्वयं भौतिक परिस्थितियों से अप्रभावित हो।"
जब तक जड़त्व के सिद्धान्त को भौतिकी का मूल आधार
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