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प्रबन्ध-पुष्पाञ्जलि/विस्यूवियस के विषम स्फोट

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प्रबन्ध पुष्पाञ्जलि  (1935) 
द्वारा महावीर प्रसाद द्विवेदी
[ १२८ ]

विस्यूवियस के विषम स्फोट।
(१)

पृथ्वी पहले एक प्रकार का जलता हुआ प्रवाही पदार्थ थी। लोहा और ताँबा आदि धातु गलने पर जैसे तरल और अग्निमय हो जाते हैं, पृथ्वी भी वैसी ही थी। वह धीरे धीरे ठण्डी हो गई है। उसके पेट में, परन्तु, अभी तक ज्वाला भरी हुई है। पृथ्वी का जो भाग समुद्र के पास है वहाँ बड़ी बड़ी दरारों से, कभी कभी, पानी का प्रवाह पृथ्वी के जलते हुए पेट में चला जाता है। वहाँ आग का संयोग होने से पानी की भाफ हो जाती है और वह बड़े वेग से पृथ्वी के ऊपरी भाग को तोड़ कर बाहर निकलने का यत्न करती है। इस प्रकार की भीषण भाफ जब पृथ्वी के उदर में इधर उधर आघात करती है तभी भूकम्प आता है। जहाँ वह पृथ्वी को तोड़ कर ऊपर निकलने लगती है वहाँ ज्वालामुखी पर्वत हो जाते हैं। ऐसे पर्वतों के नीचे की भाफ निकल जाने पर वे शान्त हो जाते हैं। जब फिर [ १२९ ]कभी वहाँ पानी का प्रवाह पहुँचता है, तब फिर वहाँ की आग कुपित हो उठती है और उत्पन्न हुई भाफ पहले मार्ग से ऊपर निकलने लगती है। इस निकलने में पृथ्वी के उदर के पदार्थ वह ऊपर फेंकती है।

पानी पहुँचने से पृथ्वी के पेट की ज्वाला कहीं कहीं अत्यन्त कुपित हो उठती है, और बटलोही के ढकने के समान, पृथ्वी के ऊपरी भाग को वह बलपूर्वक ऊपर उठा देती है। ऐंडीज़ ओर अल्पस आदि ऊँचे ऊँचे पर्वत इसी प्रकार ऊपर उठ आये हैं। भूगर्भ-शास्त्र के जानने वालों ने इस बात को सप्रमाण सिद्ध किया है।

जिन पर्वतों में पृथ्वी के ऊपर की उबलती हुई भाफ के निकलने का मार्ग हो जाता है, अर्थात् जिनमें भीतर से ऊपर तक, एक विशाल कुवाँ सा बन जाता है उनसे, कभी कभी, आग की विकराल ज्वाला निकल पड़ती है। ऐसे पर्वतों को ज्वालामुखी अथवा अग्निगर्भ पर्वत कहते हैं।

संसार में जितने अग्निगर्भ पर्वत हैं उन सब में विस्यूरियस बड़ा ही भयङ्कर है। प्रशान्त महासागर के वेस्टइंडीज़ नामक द्वीपों में, उस वर्ष, जो एक ज्वालामुखी का स्फोट हुआ और उससे एक शहर का शहर विध्वंस हो गया, वह विस्यूवियस के हृत्कम्पकारी स्फोटों के सामने कोई चीज़ न था। विस्यूवियस, इटली में, नेपल्प की खाड़ी से थोड़ी दूर पर है। उसके चारों ओर घनी बस्ती [ १३० ]है। अङ्गूर और शहतूत के बाग दूर दूर तक चले गये हैं। तरु, लता, पशु, पक्षी और मनुष्यों से परिपूर्ण, ऐसी मनोहर भूमि के बीच, यह भीम भूधर खड़ा है। समुद्र की सतह से यह कोई ४,००० फुट ऊँचा है।

जिस मुँह से विस्यूवियस ज्वलन्त ईंट, पत्थर, राख भाफ और धातु-रस उगलता है उसकी परिधि ५ मील है। यह अनादि अग्नि गर्भ पर्वत है। किसी समय यह एक दूसरे ही मुख से ज्वाला वमन करता था। इस प्राचीन मुख का घेरा नये मुँह से भी बड़ा है। परन्तु उस मुँह ने चिरकाल से मौन धारण कर लिया है। विस्यूवियस की इस समय, जितनी ऊँचाई है, प्राचीन समय में वह उससे दूनी थी। परन्तु एक महा वेगवान् स्फोट में उस के सब से ऊँचे शिखर उड़ गये। तब से उसे यह वामन रूप मिला है।

विस्यूवियस कई सौ वर्ष तक शान्त था। जान पड़ता था कि उस की जठराग्नि मन्द हो गई और वह हमेशा के लिए शिथिल पड़ गया। इसलिए मनुष्यों ने उसके इर्द गिर्द अनेक बाग लगा दिये, अनेक नगर और गाँव बसा दिये; यहाँ तक कि पर्वत के ऊपर उस के ज्वाला वाहक मुँह तक वे अपनी भेड़ बकरियाँ चराने के लिए ले जाने लगे। उस के शिखर नाना प्रकार के हरे हरे पेड़ों और लताओं से ढक गये। उन को देख कर यह बात कभी मन में न आती थी कि वह अग्नि गर्भ पर्वत है। [ १३१ ]

६३ ईसवी में अकस्मात् भूडोल आया और विस्यूवियस के पेट में फिर, सैकड़ों वर्ष के बाद, गड़बड़ शुरू हुई। १६ वर्ष तक भूडोल आते रहे और जिस प्रान्त में यह पर्वत था उसके निवासियों के कलेजे को कँपाते रहे। अनेक मकान गिर गये; मन्दिरों के अनेक शिखर टूट पड़े; ऊँचे ऊँचे महल पृथ्वी पर उलटे लेट रहे। आगे आने वाले तूफ़ान की १२ वर्ष-व्यापी यह एक छोटी सी सूचना थी। मनुष्य संहारक प्रलय का यह आदि रूप था। भूडोल के धक्के धीरे धीरे अधिक उग्र होते गये। अन्त में २४ अगस्त ७९ ईसवी को विस्यूवियस का भीषण मुँह, महा भयङ्कर अट्टहास करके, खुल गया। क्षुब्ध हुये समुद्र में जिस प्रकार एक छोटी सी डोंगी हिलती है, एक निमेष में कई हाथ ऊपर उठ कर फिर नीचे आ जाती है––स्फोट होने के पहले, उसी प्रकार, पृथ्वी हिल उठी। सपाट जमीन पर भी जाती हुई गाड़ियाँ उलट गईं; मकान गिरने लगे और उनके भीतर से मनुष्य भागने लगे; समुद्र किनारों से कोसों दूर हट गया; अनन्त जलचर सूखी जमीन में पड़े रह गये। यह हो चुकने पर विस्यूवियस ने अपने पेट के पदार्थ वमन करना आरम्भ किया। प्रलय काल के मेघ के समान भाफ की घोर घटा हाहाकार करते हुए उस के मुँह से निकलने लगी। ठहर ठहर कर सैकड़ों वज्रपात के समान महाप्रचण्ड गड़गड़ाहट प्रारम्भ हुई। [ १३२ ]भाफ़ के साथ राख और पत्थर उड़ने लगे और दूर दूर तक गिर कर देश का सर्वनाश करने लगे। बिजली इतनी भीषणता से चमकने लगी कि पचास पचास कोस दूर तक के लोगों की आँखों में चकाचौंध आ गई। मुँह के ठीक बीच से जलते हुए धातु और पत्थरों की राशि आकाश की ओर कोसों ऊपर उड़ने लगी। तीन दिन तक आस पास का देश अन्धकार मय हो गया। विस्यूवियस ने महा प्रलय कर दिया। उसके पास के हरक्युलैनियम, पाम्पियाई और स्टेबिया नामक तीन शहर समूल लोप हो गये। उनके ऊपर बीस बीस फुट गहरी बजरी, राख और पत्थर आदि की तह जम गई। सारे जीवधारियों का सहसा संहार हो गया। विस्यूवियस ने अपने मुँह से इतनी भाफ उगली कि उसके चारों ओर महाभयङ्कर और महावेगवान नद बह निकले और अपने साथ उस पर्वत के भीतर से निकले हुए राख और पत्थर आदि पदार्थों को बहा कर, उन्होंने बाग़, खेत, गाँव, नगर जो कुछ उन्हें मार्ग में मिला, सबको दस दस पन्द्रह पन्द्रह हाथ ज़मीन के नीचे गाड़ दिया। इस स्फोट में अनन्त प्राणियों ने अपने प्राण खोये।

इसके बाद कोई १५०० वर्ष तक विस्यूवियस प्रायः शान्त रहा। बीच में कभी एक आध बार उसने धीरे से श्वास अथवा डकार लेकर ही सन्तोष किया। इन १५०० [ १३३ ]बर्षों में इस ज्वालामुखी पर्वतराज की फिर पहले की सी अवस्था हो गई। सब कहीं लतायें लटक गईं, घास से उसके शिखर लहलहे हो गये, अङ्गूर और शहतूत के उद्यान उसके आसपास उसकी शोभा बढ़ाने लगे। कितने ही गाँव बस गये। यह सब विस्यूवियस से देखा न गया। फिर भूडोल आरम्भ हुआ। छः महीने तक पृथ्वी हिलती रही। १६ दिसम्बर १६३१ ईसवी को फिर उदर-स्फोट हुआ। राख और पत्थर के समूह के समूह हृदय विदारी नाद करते हुए उड़ने लगे और सैकड़ों मील दूर जा जा कर गिरने लगे। यहाँ तक कि छोटे छोटे पत्थर कान्सैन्टिनोपल तक पहुँचे। भाफ के पानी की प्रचण्ड नदियाँ बन गईं। उनमें राख पत्थर मिल जाने से कीचड़ हो गया। कीचड़ के ये सर्वग्रास कारी भयावने नद बहे और अपीनाइन पर्वत के नीचे तक चले गये। इस बार गले हुए धातु और पत्थरों की अग्निरूपिणी नदियों के भी प्रबाह बहे, और महा भीषण रूप धारण करके पशु, पक्षी, मनुष्य, घास, फूस, वृक्ष, लता आदि को भस्म करते हुए बारह तेरह मुखों से समुद्र में आ गिरे। इस स्फोट में १८००० मनुष्यों का संहार हुआ।

जब से यह स्फोट हुआ तब से विस्यूवियस को पूरी शान्ति नहीं मिली। बीच बीच में आप आग, पत्थर, भाफ, राख उगलते ही रहे हैं। १७६६, १७६७, १७७९, [ १३४ ]१७९४ और १८२२ ईस्वी में आपने विशेष पराक्रम दिखाया।

१७९४ ईसवी के स्फोट में पिघले हुए पत्थरों की एक धारा विस्यूवियस ने निकाली। वह १२ से ४० फुट तक गहरी थी। टोरड्यिल ग्रेको नामक नगर को तबाह करके वह ३५० फुट तक समुद्र में चली गई। समुद्र में प्रवेश के समय वह १२०० फुट चौड़ी थी। १८२२ ईसवी के स्फोट में धुर्वे के विशाल स्तम्भ १०००० फुट तक आकाश में उड़े। १८५५ में चटानों के टुकड़े ४०० फुट तक ऊँचे उड़े और स्फोट के समय ऐसी घोर गड़गड़ाहटें हुई कि लोगों का कलेजा काँप उठा। वे सब नेपल्स को भाग गये।

कुछ दिन से विस्यूवियस की ज्वाला वमन करने की शक्ति क्षीण सी हो गई थी। परन्तु यह क्षीणता जाती रही है। अब फिर आपने विकराल रूप धारण किया है। फिर आप आग, पानी, ईंट, पत्थर बरसाने लगे हैं। यह अद्भुत तमाशा देखने के लिए दूर दूर से लोग नेपल्प को जा रहे हैं। विस्यूवियस के पास एक यन्त्रशाला स्थापित है। वहाँ उसकी अग्नि लीला की दिनचर्य्या रक्खी जाती है और जो जो दृश्य दिखलाई पड़ते हैं उनका वैज्ञानिक विचार किया जाता है। १८८० ईसवी से वहाँ तार के रस्सों की रेल निकाली गई है। यह रेल विस्यूवियस के मुख से १५० [ १३५ ]गज तक चली गई है। इसी रेल पर लोग इस ज्वलन्त देव के दर्शन करने जाते हैं।

हरक्युलैनियम और पाम्पिपाई, जिन को विस्यूवियस ने १५ हाथ पृथ्वी के नीचे गाड़ दिया था और बहुत ढूँढ़ने पर भी जिन का कोई निशान तक न मिलता था, अब ज़मीन से खोद कर निकाले गये हैं। हरक्युलैनियम एक छोटा सा नगर है; परन्तु पाम्पिपाई बहुत बड़ा है। एक कुँवा खोदते समय पाम्पिपाई का पहले पहल पता १७४८ ईसवी में लगा। तब से बराबर उसकी खुदाई और खोज हो रही है। विस्यूवियस से वह कोई एक ही मील दूर है। उस के मकान, उस के मन्दिर और उसकी नाटक शालायें आदि इमारत सब जैसी की तैसी निकली हैं। उन में रक्खा हुआ सामान भी बहुत सा निकला है। मनुष्यों की ठठरियां भी पाई गई हैं। १८०० वर्ष के पहले रोमन लोगों के इतिहास को पाम्पिपाई ने प्रत्यक्ष कर दिया है। उस पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं और अब तक लिखी जा रही हैं। उन में लिखे गये वर्णन बहुत ही मनोरंजक हैं। उस समय इटली वालों के मकान कैसे थे; उनके रहने की रीति कैसी थी; उनके घरों में किस प्रकार का सामान रहता था; उनके आमोद-प्रमोद किस प्रकार के थे––इत्यादि बातों का पता पाम्पिपाई से खूब लगा है। कभी बुराई से भी भलाई निकलती है। विस्यू[ १३६ ]वियस के स्फोट से यदि पाम्पिपाई दब न जाता तो प्रायः दो हजार वर्ष पीछे अपने पूर्व रूप में वह क्यों दिखलाई देता?

[जनवरी १९०५


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