रंगभूमि/४६

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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चारों आदमी शफाखाने पहुँचे, तो नौ बज चुके थे। आकाश निद्रा में मग्न, आँखें बंद किये, पड़ा हुआ था, पर पृथ्वी जाग रही थी। भैरो खड़ा सूरदास को पंखा झल रहा था, लोगों को देखते ही उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे। सिरहाने की ओर कुर्सी पर बैठी हुई सोफिया चिंताकुल नेत्रों से सूरदास को देख रही थी। सुभागी अंगठी में आग बना रही थी कि थोड़ा-सा दूध गर्म करके सूरदास को पिलाये। तीनों ही के मुख पर नैराश्य का चित्र खिंचा हुआ था। चारों ओर वह नि:स्तब्धता छाई हुई थी, जो मृत्यु का पूर्वाभास है।

सोफ़ी ने कातर स्वर में कहा-"पंडाजी, आज शोक की रात है। इनकी नाड़ी का कई-कई मिनटों तक पता नहीं चलता। शायद आज की रात मुश्किल से कटे। चेष्टा बदल गई।”

भैरो-“दो पहर से यही हाल है; न कुछ बोलते हैं, न किसी को पहचानते हैं।" सोफी-“डॉक्टर गंगुली आते होंगे। उनका तार आया था कि मैं आ रहा हूँ। यों तो मौत की दवा किसी के पास नहीं; लेकिन संभव है, डॉक्टर गंगुली के हाथों कुछ यश लिखा हो।"

सुभागी-“मैंने साँझ को पुकारा था, तो आँखें खोली थीं; पर बोले कुछ नहीं।" ठाकुरदीन-"बड़ा प्रतापी जीव था ।"

यही बातें हो रही थीं कि एक मोटर आई और कुँवर भरतसिंह, डॉक्टर गंगुली और रानी जाह्नवी उतर पड़ी, गंगुली ने सूरदास के मुख की ओर देखा और निराशा.की मुस्किराहट के साथ बोले-"हमको दस मिनट का भी देर होता, तो इनका दर्शन भी न पाते । विमान आ चुका है। क्यों दूध गरम करता है भाई, दूध कौन पियेगा ? यमराज तो दूध पीने का मुहलत नहीं देता।"

सोफिया ने सरल भाव से कहा-"क्या अब कुछ नहीं हो सकता डॉक्टर साहब?" गंगुली-"बहुत कुछ हो सकता है मिस सोफ़िया !हम यमराज को परास्त कर देगा। ऐसे प्राणियों का यथार्थ जीवन तो मृत्यु के पीछे ही होता है, जब वह पंचभूतों.के संस्कार से रहित हो जाता है । सूरदास अभी नहीं मरेगा, बहुत दिनों तक नहीं मरेगा। हम सब मर जायगा, कोई कल, कोई परसों; पर सूरदास तो अमर हो गया, उसने तो काल को जीत लिया। अभी तक उसका जीवन पंचभूतों के संस्कार से सीमित था । अब वह प्रसारित होगा, समस्त प्रांत को, समस्त देश को जागृति प्रदान करेगा, हमें कर्मण्यता का, वीरता का आदर्श बनायेगा । यह सूरदास की मृत्यु नहीं है सोफी, यह उसके जीवन-ज्योति का विकास है। हम तो ऐसा ही समझता है।'

यह कहकर डॉक्टर गंगुली ने जेब से एक शोशी निकाली और उसमें से कई बूंदें
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सूरदास का मुँह खोलकर पिला दी। तत्काल उसका असर दिखाई दिया। सूरदास के विवर्ण मुख-मंडल पर हलकी-हलकी सुरखी दौड़ गई। उसने आँखें खोल दी, इधर-उधर अनिमेप दृष्टि से देखकर हँसा और ग्रामोफोन की-सी कृत्रिम, बैठी हुई, नीरस आवाज से बोला-"बस बस, अब मुझे क्यों मारते हो? तुम जीते, मैं हारा। यह बाजी तुम्हारे हाथ रही, मुझसे खेलते नहीं बना। तुम मँजे हुए खिलाड़ी हो, दम नहीं उखड़ता, खिलाड़ियों को मिलाकर खेलते हो और तुम्हारा उत्साह भी खूब है। हमारा दम उखड़ जाता है, हॉफने लगते हैं और खिलाड़ियों को मिलाकर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मार-पीट करते हैं, कोई किसी की नहीं मानता। तुम खेलने में निपुण हो, हम अनाड़ी हैं। बस, इतना ही फरक है। तालियाँ क्यों बजाते हो, यह तो जीतने-वालों का धरम नहीं? तुम्हारा धरम तो है हमारी पीठ ठोकना। हम हारे, तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धाँधली तो नहीं की। फिर खेलेंगे, जरा दम ले लेने दो, हार-हारकर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक-न-एक दिन हमारी जीत होगी,जरूर होगी।'

डॉक्टर गंगुली इस अनर्गल कथन को आँखें बंद किये इस भाव से तन्मय होकर सुनते रहे, मानों ब्रह्म-वाक्य सुन रहे हों। तब भक्ति-पूर्ण भाव से बोले-“बड़ी विशाल आत्मा है। हमारे सारे पारस्परिक, सामाजिक, राजनीतिक जीवन की अत्यंत सुंदर विवे-चना कर दी, और थोड़े-से शब्दों में।”

सोफी ने सूरदास से कहा-"सूरदास, कुँवर साहब और रानीजी आई हुई हैं। कुछ कहना चाहते हो?"

सूरदास ने उन्माद-पूर्ण उत्सुकता से कहा- "हाँ-हाँ-हाँ, बहुत कुछ कहना है, कहाँ हैं? उनके चरणों की धूल मेरे माथे पर लगा दो, तर जाऊँ, नहीं-नहीं, मुझे उठाकर बैठा दो, खोल दो यह पट्टी, मैं खेल चुका, अब मुझे मरहम-पट्टी नहीं चाहिए। रानी कौन, विनयसिंह की माता न? कुँवर साहब उनके पिता न १ मुझे बैठा दो, उनके पैरों पर आँखें मलूंगा। मेरी आँखें खुल जायँगी। मेरे सिर पर हाथ रखकर असीस दो, माता, अब मेरी जीत होगी। अहो! वह, सामने विनयसिंह और इंद्रदत्त सिंहासन पर बैठे हुए मुझे बुला रहे हैं। उनके मुख पर कितना तेज है! मैं भी आता हूँ। यहाँ तुम्हारी कुछ सेवा न कर सका, अब वहीं करूँगा। माता-पिता, भाई-बंद, सबको सूरदास का राम-राम, अब जाता हूँ। जो कुछ बना बिगड़ा हो, छमा करना।"

रानी जाह्नवी ने आगे बढ़कर, भक्ति-विह्वल दशा में, सूरदास के पैरों पर सिर रख दिया और फूट-फूट कर रोने लगीं। सूरदास के पैर अश्रु-जल से भीग गये। कुँवर साहब ने आँखों पर रूमाल डाल लिया और खड़े-खड़े रोने लगे।

सूरदास की मुख-श्री फिर मलीन हो गई। ओषधि का असर मिट गया। ओठ नीले पड़ गये। हाथ-पाँव ठंडे हो गये।

नायकराम गंगाजल लाने दौड़े। जगधर ने सूरदास के समीप जाकर जोर से कहा-
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"सूरदास, मैं हूँ जगधर, मेरा अपराध छमा।" यह कहते-कहते आवेग से उसका कंठ रुँध गया।

सूरदास मुँह से कुछ न बोला, दोनों हाथ जोड़े, आँसू की दो बूंदें गालों पर बह आई, और खिलाड़ी मैदान से चला गया।

क्षण-मात्र में चारों तरफ खबर फैल गई। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, बूढ़े-जवान हजारों की संख्या में निकल पड़े। सब नंगे सिर, नंगे पैर, गले में अँगोछियाँ डाले शफाखाने के मैदान में एकत्र हुए। स्त्रियाँ मुँह ढाँपे खड़ी विलाप कर रही थीं, मानों अपने घर का कोई प्राणी मर गया हो। जिसका कोई नहीं होता, उसके सब होते हैं। सारा शहर उमड़ा चला आता था। सब-के-सब इस खिलाड़ी को एक आँख देखना चाहते थे, जिसको हार में भी जीत का गौरव था। कोई कहता था, सिद्ध था; कोई कहता था, वली था; कोई देवता कहता था; पर वह यथार्थ में खिलाड़ी था-वह खिलाड़ी, जिसके माथे पर कभी मैल नहीं आया, जिसने कभी हिम्मत नहीं हारी, जिसने कभी कदम पीछे नहीं हटाये, जीता, तो प्रसन्नचित्त रहा; हारा, तो प्रसन्नचित्त रहा; हारा तो जीतनेवाले से कीना नहीं रखा; जीता, तो हारनेवाले पर तालियाँ नहीं बजाई, जिसने खेल में सदैव नीति का पालन किया, कभी धाँधली नहीं की, कभी द्वंद्वी पर छिपकर चोट नहीं की। भिखारी था, अपंग था, अंधा था, दीन था, कभी भर-पेट दाना नहीं नसीब हुआ, कभी तन पर वस्त्र पहनने को नहीं मिला; पर हृदय धैर्य और क्षमा, सत्य और साहस का अगाध भांडार था। देह पर मांस न था, पर हृदय में विनय, शील और सहानुभूति भरी हुई थी।

हाँ, वह साधु न था, महात्मा न था, देवता न था, फरिश्ता न था। एक क्षुद्र, शक्ति-हीन प्राणी था, चिंताओं और बाधाओं से घिरा हुआ, जिसमें अवगुण भी थे, और गुण भी। गुण कम थे, अवगुण बहुत। क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ये सभी दुर्गुण उसके चरित्र में भरे हुए थे, गुण केवल एक था। किंतु ये सभी दुर्गुण उस पर गुण के संपर्क से, नमक की खान में जाकर नमक हो जानेवाली वस्तुओं की भाँति, देवगुणों का रूप धारण कर लेते थे-क्रोध सत्रोध हो जाता था, लोभ सदनुराग, मोह सदुत्साह के रूप में प्रकट होता था और अहंकार आत्माभिमान के वेष में! और वह गुण क्या था? न्याय-प्रेम, सत्य-भक्ति, परोपकार, दर्द, या उसका जो नाम चाहे रख लीजिए। अन्याय देखकर उससे न रहा जाता था, अनीति उसके लिए असह्य थी।

मृत देह कितनी धूमधाम से निकली, इसकी चर्चा करना व्यर्थ है। बाजे-गाजे न थे, हाथी-घोड़े न थे, पर आँसू बहानेवाली आँखों और कीर्ति-गान करनेवाले मुखों की कमी न थी। बड़ा समारोह था। सूरदास की सबसे बड़ी जीत यह थी कि शत्रुओं को भी उससे शत्रुतान थी। अगर शोक-समाज में सोफिया, गंगुली, जाह्नवी, भरतसिंह, नायकराम,भैरो आदि थे, तो महेंद्रकुमारसिंह, जॉन सेवक, जगधर, यहाँ तक कि मि० क्लार्क भी थे। चंदन की चिता बनाई गई थी, उस पर विजय-पताका लहरा रही थी। दाह-क्रिया
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कोन करता? मिठुआ ठीक उसी अवसर पर रोता हुआ आ पहुँचा। सूरदास ने जीते-जी जो न कर पाया था, मरकर किया!

इसी स्थान पर कई दिन पहले यही शोक-दृश्य दिखाई दिया था। अंतर केवल इतना था कि उस दिन लोगों के हृदय शोक से व्यथित थे, आज विजय-गर्व से परिपूर्ण, वह एक वीरात्मा की वीर मृत्यु थी, यह एक खिलाड़ी की अंतिम लीला। एक बार फिर सूर्य की किरणें चिता पर पड़ी, उनमें गर्व की आभा थी, मानों आकाश से विजय-गान के स्वर आ रहे हैं।

लौटते समय मि० क्लार्क ने राजा महेंद्रकुमार से कहा- 'मुझे इसका अफसोस है कि मेरे हाथों ऐसे अच्छे आदमी की हत्या हुई।"

राजा साहब ने कुतूहल से कहा- “सौभाग्य कहिए, दुर्भाग्य क्यों?

क्लार्क-"नहीं राजा साहब, दुर्भाग्य ही है। हमें आप-जैसे मनुष्यों से भय नहीं, भय ऐसे ही मनुष्यों से है, जो जनता के हृदय पर शासन कर सकते हैं। यह राज्य करने का प्रायश्चित्त है कि इस देश में हम ऐसे आदमियों का वध करते हैं, जिन्हें इँगलैंड में हम देव-तुल्य समझते।"

सोफिया इसी समय उनके पास से होकर निकली। यह वाक्य उसके कान में पड़ा। बोली-“काश ये शब्द आपके अंतःकरण से निकले होते!"

यह कहकर वह आगे बढ़ गई। मि० क्लार्क यह व्यंग्य सुनकर बौखला गये, जब्त न कर सके। घोड़ा बढ़ाकर बोले-“यह तुम्हारे उस अन्याय का फल है, जो तुमने मेरे साथ किया है।"

सोफी आगे बढ़ गई थी। ये शब्द उसके कान में न पड़े।

गगन-मण्डल के पथिक, जो मेघ के आवरण से बाहर निकल आये थे, एक-एक करके विदा हो रहे थे! शव के साथ जानेवाले भी एक-एक करके चले गये। पर सोफिया कहाँ जाती? इसी दुविधा में खड़ी थी कि इंदु मिल गई। सोफिया ने कहा-"इंदु, जरा ठहरो। मैं भी तुम्हारे साथ चलूंँगी।"