रंगभूमि/४९

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रंगभूमि  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद
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इधर सूरदास के स्मारक के लिए चंदा जमा किया जा रहा था, उधर कुलियों के टोले के शिलान्यास की तैयारियाँ हो रही थीं। नगर के गण्यमान्य पुरुष निमंत्रित हुए थे। प्रांत के गवर्नर से शिला-स्थापना की प्रार्थना की गई थी। एक गार्डनपार्टी होनेवाली थी। गवर्नर महोदय को अभिनंदन-पत्र दिया जानेवाला था। मिसेज सेवक दिलोजान से तैयारियाँ कर रही थीं। बँगले की सफाई और सजावट हो रही थी। तोरण आदि बनाये जा रहे थे। अँगरेजी बैंड बुलाया गया था। मि० क्लार्क ने सरकारी कर्मचारियों को मिसेज सेवक की सहायता करने का हुक्म दे दिया था और स्वयं चारों तरफ दौड़ते फिरते थे।

मिसेज सेवक के हृदय में अब एक नई आशा अंकुरित हुई थी। कदाचित् विनय-सिंह की मृत्यु सोफिया को मि० क्लार्क की ओर आकर्षित कर दे, इसलिए वह मि० क्लार्क की और भी खातिर कर रही थीं। सोफिया को स्वयं जाकर साथ लाने का निश्चय कर चुकी थीं-जैसे बनेगा, वैसे लाऊँगी, खुशी से न आयेगी, जबरदस्ती लाऊँगी, रोऊँगी, पैरों पड़ूँगी, और बिना साथ लाये उसका गला न छोड़ूँगी।

मि० जॉन सेवक कंपनी का वार्षिक विवरण तैयार करने में दत्तचित्त थे। गत साल के नफे की सूचना देने के लिए उन्होंने यही अवसर पसंद किया था। यद्यपि यथार्थ लाभ बहुत कम हुआ था किंतु आय- व्यय में इच्छा-पूर्वक उलट-फेर करके वह आशातीत लाभ दिखाना चाहते थे, जिसमें कंपनी के हिस्सों की दर चढ़ जाय और लोग हिस्सों पर टूट पड़ें। इधर के घाटे को वह इस चाल से पूरा करना चाहते थे। लेखकों को रात-रात-भर काम करना पड़ता था और स्वयं मि० सेवक हिसाबों की तैयारी में उससे कहीं ज्यादा परिश्रम करते थे, जितना उत्सव की तैयारियों में।

किंतु मि० ईश्वर सेवक को ये तैयारियाँ, जिन्हें वह अपव्यय कहते थे, एक आँख न भाती थीं। वह बार-बार झुंझलाते थे, बेचारे वृद्ध आदमी को सुबह से शाम तक सिरमगजन करते गुजरता था। कभी बेटे पर झल्लाते, कभी बहू पर, कभी कर्मचारियों पर, कभी सेवकों पर-"यह पाँच मन बर्फ की क्या जरूरत है, क्या लोग इसमें नहायेंगे? मन-भर काफी थी। काम तो आधे मन ही में चल सकता था। इतनी शराब की क्या जरूरत? कोई परनाला बहाना है; या मेहमानों को पिलाकर उनके प्राण लेने हैं, इससे क्या फायदा कि लोग पी-पीकर बदमस्त हो जायँ और आपस में जूती-पैजार होने लगे? लगा दो घर में आग, या मुझी को जहर दे दो, न जिंदा रहूँगा, न जलन होगी। प्रभु मसीह! मुझे अपने दामन में ले। इस अनर्थ का कोई ठिकाना है, फौजी बैंड की क्या जरूरत? क्या गवर्नर कोई बच्चा है, जो बाजा सुनकर खुश होगा? या शहर के रईश बाजे के भूखे हैं? ये आतिशबाजियाँ क्या होंगी? गजब खुदा का,
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क्या एक सिरे से सब भंग खा गये हैं? यह गर्वनर का स्वागत है,या बच्चों का खेल? पटाखे और छछूँदरें किसको खुश करेंगी? माना,पटाखे और छछूँदरें न होंगी,अँगरेजी आतिशबाजियाँ होंगी,मगर क्या गवर्नर ने आतिशबाजी नहीं देखी है? ऊट-पटाँग काम करने से क्या मतलब? किसी गरीब का घर जल जाय, कोई और दुर्घटना हो जाय,तो लेने के देने पड़ें। हिंदुस्थानी रईसों के लिए फल-मेवे और मुरब्बे-मिठाइयाँ मँगाने की जरूरत? वे ऐसे भुक्खड़ नहीं होते। उनके लिए एक-एक सिगरेट काफी थी। हाँ, पान-इलायची का प्रबंध और कर दिया जाता। वे यहाँ कोई दावत खाने तो आयेंगे नहीं, कंपनी का वार्षिक बिवरण सुनने आयेंगे। अरे, ओ खानसामा, सुअर, ऐसा न हो कि मैं तेरा सिर तोड़कर रख दूँ। जो-जो वह पगली (मिसेज सेवक) कहती है, वही करता है। मुझे भी कुछ बुद्धि है या नहीं? जानता है, आजकल ४) सेर अंगूर मिलते हैं। इनकी बिलकुल जरूरत नहीं। खबरदार, जो यहाँ अंगूर आये!" सारांश यह कि कई दिनों तक निरंतर बक-बक, झक-झक से उनका चित्त कुछ अन्य-वस्थित-सा हो रहा था। कोई उनकी सुनता न था,सब अपने-अपने मन की करते थे। जब वह बकते-बकते थक जाते,तो उठकर बाग में चले जाते। लेकिन थोड़ी ही देर में फिर घबराकर आ पहुँचते और पूर्ववत् लोगों पर वाक्यप्रहार करने लगते। यहाँ तक कि उत्सव के एक सप्ताह पहले जब मि० जॉन सेवक ने प्रस्ताव किया कि घर के सब नौकरों और कारखाने के चपरासियों को एल्गिन मिल की बनी हुई वर्दियाँ दी जायँ,तो मि० ईश्वर सेवक ने मारे क्रोध के वह इञ्जील,जिसे वह हाथ में लिये प्रकट रूप से ऐनक की सहायता से, पर वस्तुतः स्मरण से, पढ़ रहे थे,अपने सिर पर पटक ली और बोले,या खुदा,मुझे इस जंगल से निकाल। सिर दीवार के समीप था, यह धक्का लगा, तो दीवार से टकरा गया। ९० वर्ष की अवस्था, जर्जर शरीर, वह तो कहो, पुरानी हड्डियाँ थीं कि काम देती जाती थीं,अचेत हो गये। मस्तिष्क इस आघात को सहन न कर सका,आँखें निकल आई,ओठ खुल गये और जब तक लोग डॉक्टरों को बुलायें, उनके प्राण-पखेरू उड़ गये! ईश्वर ने उनकी अंतिम विनय स्वीकार कर ली,इस जंजाल से निकाल दिया। निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता कि उनकी मृत्यु का क्या कारण था, यह आघात या गृह-दाह!

सोफिया ने यह शोक-समाचार सुना,तो मान जाता रहा। अपने घर में अब अगर किसी को उससे प्रेम था,तो वह ईश्वर सेवक ही थे। उनके प्रति उसे भी श्रद्धा थी। तुरंत मातमी वस्त्र धारण किये और अपने घर गई। मिसेज सेवक दौड़कर उससे गले मिलीं और माँ-बेटी मृत देह के पास खूब रोई।

रात को जब मातमी दावत समाप्त हुई और लोग अपने-अपने घर गये,तो मिसेज सेवक ने सोफिया से कहा-"बेटी, तुम अपना घर रहते हुए दूसरी जगह रहती हो,क्या यह हमारे लिए लज्जा और दुःख की बात नहीं? यहाँ अब तुम्हारे सिवा और कौन वली-वारिस है! प्रभु का अब क्या ठिकाना,घर आये या न आये, अब तो जो कुछ हो,
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तुम्हीं हो। हमने अगर कभी कड़ी बात कही होगी, तो तुम्हारे ही भले को कही होगी। कुछ तुम्हारी दुश्मन तो हूँ नहीं। अब अपने घर में रहो। यो आने-जाने के लिए कोई रोक नहीं है, रानी साहब से भी मिल आया करो;पर रहना यहीं चाहिए। खुदा ने और तो सब अरमान पूरे कर दिये,तुम्हारा विवाह भी हो जाता,तो निश्चित हो जाती। प्रभु जब आता,देखी जाती। इतने दिनों का मातम थोड़ा नहीं होता,अब दिन गँवाना अच्छा नहीं। मेरी अभिलाषा है कि अबकी तुम्हारा विवाह हो जाय और गर्मियों में हम सब दो-तीन महीने के लिए मंसूरी चलें।"

सोफी ने कहा-"जैसी आपकी इच्छा,कर लूंँगी।"

माँ-"और क्या बेटी, जमाना सदा एक-सा नहीं रहता,हमारी जिंदगी का क्या भरोसा। तुम्हारे बड़े पापा यह अभिलाषा लिये ही सिधार गये। तो मैं तैयारी करूँ?"

सोफिया-"कह तो रही हूँ।"

माँ-"तुम्हारे पापा सुनकर फूले न समायेंगे। कुँवर विनयसिंह की मैं निंदा नहीं करती,बड़ा जवाँमर्द आदमी था; पर बेटी, अपने धर्मवालों में करने की बात ही और है।"

सोफिया-"हाँ,और क्या।"

माँ-"तो अब रानी जाह्नवी के यहाँ न जाओगी न?” सोफिया-"जी नहीं,न जाऊँगी।"

माँ-"आदमियों से कह दूँ,तुम्हारी चीजें उठा लायें?"

सोफिया-"कल रानीजी आप ही भेज देंगी।"

मिसेज़ सेवक खुश-खुश दावत का कमरा साफ कराने गई।

मि० क्लार्क अभी वहीं थे। उन्हें यह शुभ सूचना दी। सुनकर फड़क उठे। बाँछे खिल गई। दौड़े हुए सोफिया के पास आ गये और बोले-"सोफी, तुमने मुझे जिंदा कर दिया। अहा! मैं कितना भाग्यवान् हूँ! मगर तुम एक बार अपने मुँह से मेरे सामने कह दो। तुम अपना वादा पूरा करोगी?"

सोफिया-“करूंगी।"

और भी बहुत-से आदमी मौजूद थे, इसलिए मि० क्लार्क सोफिया का आलिंगन न कर सके। मूंछों पर ताव देते,हवाई किले बनाते,मनमोदक खाते घर गये।

प्रातःकाल सोफिया का अपने कमरे में पता न था! पूछ-ताछ होने लगी। माली ने कहा,मैंने उन्हें जाते तो नहीं देखा, पर जब यहाँ सब लोग सो गये थे,तो एक बार फाटक के खुलने की आवाज आई थी। लोगों ने समझा,कुँवर भरतसिंह के यहाँ गई होगी, तुरंत एक आदमी दौड़ाया गया। लेकिन वहाँ भी पता न चला। बड़ी खलबली मची,कहाँ गई।

जॉन सेवक-"तुमने रात को कुछ कहा-सुना तो नहीं था?" [ ५६८ ]
मिसेज सेवक-"रात को तो विवाह की बातचीत होती रही। मुझसे तैयारियाँ करने के लिए भी कहा। खुश-खुश सोई।"

जॉन सेवक-"तुम्हारी समझ का फर्क था। उसने तो अपने मन का भाव प्रकट कर दिया। तुमको जता दिया कि कल मैं न हूँगी। जानती हो, विवाह से उसका आशय क्या था? आत्मसमर्पण। अब विनय से उसका विवाह होगा; यहाँ जो न हो सका वह स्वर्ग में होगा। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था, वह किसी से विवाह न करेगी। तुमने रात को विवाह की बातचीत छेड़कर उसे भयभीत कर दिया। जो बात कुछ दिनों मे होती, वह आज ही हो गई। अब जितना रोना हो, रो लो; मैं तो पहले ही रो चुका हूँ।"

इतने में रानी जाह्नवी आई, आँखें रोते-रोते बीरबहूटी हो रही थीं। उन्होंने एक पत्र मि० सेवक के हाथ में रख दिया और एक कुर्सी पर बैठकर मुँह ढाँप, रोने लगीं।

यह सोफिया का पत्र था, अभी डाकिया दे गया था। लिखा था-"पूज्य माताजी आपकी सोफिया आज संसार से विदा होती है। जब विनय न रहे, तो यहाँ मैं किसके लिए रहूँ। इतने दिनों मन को धैर्य देने की चेष्टा करती रही। समझती थी, पुस्तकों में अपनी शोक-स्मृतियों को डुबा दूंँगी और अपना जीवन सेवा-धर्म का पालन करने में सार्थक करूँगी। किंतु मेरा प्यारा विनय मुझे बुला रहा है। मेरे बिना उसे वहाँ एक क्षण चैन नहीं है। उससे मिलने जाती हूँ। यह भौतिक आवरण मेरे मार्ग में बाधक है, इसलिए इसे यहीं छोड़े जाती हूँ। गंगा की गोद में इसे सौंपे देती हूँ। मेरा हृदय पुलकित हो रहा है, पैर उड़े जा रहे हैं, आनंद से रोम-रोम प्रमुदित है, अब शीघ्र ही मुझे विनय के दर्शन होंगे। आप मेरे लिए दुःख न कीजिएगा, मेरी खोज को व्यर्थ प्रयत्न न कीजिएगा। कारण, जब तक यह पत्र आपके हाथों में पहुँचेगा, सोफिया का सिर विनय के चरणों पर होगा। मुझे कोई प्रबल शक्ति खींचे लिये जा रही है और बेड़ियाँ आप-ही-आप टूटी जा रही हैं।

मामा और पापा से कह दीजिएगा, सोफी का विवाह हो गया, अब उसकी चिंता न करें।"

पत्र समाप्त होते ही मिसेज सेवक उन्मादिनी की भाँति कर्कश स्वर से बोली-"तुम्हीं विध की गाँठ हो, मेरे जीवन का सर्वनाश करनेवाली, मेरी जड़ों में कुल्हाड़ी मारनेवाली, मेरी अभिलाषाओं को पैरों से कुचलनेवाली, मेरा मान-मर्दन करनेवाली काली नागिन तुम्ही हो। तुम्ही ने अपनी मधुर वाणी से, अपने छल-प्रपंच से, अपने कूट-मंत्रों से मेरी सरला सोफी को मोहित कर लिया, और अंत को उसका सर्वनाश कर दिया। यह तुम्हीं लोगों के प्रलोभन और उत्तेजना देने का फल है कि मेरा लड़का आज न जाने कहाँ और किस दशा में है और मेरी लड़की का यह हाल हुआ। तुमने मेरे सारे मंसूबे खाक में मिला दिये।" [ ५६९ ]
वह उसी क्रोध-प्रवाह में न जाने और क्या-क्या कहती कि मि० जॉन सेवक उनका हाथ पकड़कर वहाँ से खींच ले गये। रानी जाह्नवी ने इन अपमानसूचक, कटु शब्दों का कुछ भी उत्तर न दिया, मिसेज सेवक को सहवेदना-पूर्ण नेत्रों से देखती रहीं और तब बिना कुछ कहे-सुने वहाँ से उठकर चली गई।

मिसेज सेवक की महत्त्वाकांक्षाओं पर तुषार पड़ गया। उस दिन से फिर उन्हें किसी ने गिरजाघर जाते नहीं देखा, वह फिर कभी गाउन और हैट पहने हुए न दिखाई दी, फिर योरपियन क्लब में नहीं गई और फिर अँगरेजी दायतों में सम्मिलित नहीं हुई। दूसरे दिन प्रातःकाल पादरी पिम और मि० क्लार्क मातमपुरसी करने आये। मिसेज सेवक ने दोनों को वह फटकार सुनाई कि अपना-सा मुँह लेकर चले गये। सारांश यह कि उसी दिन उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, मस्तिष्क इतने कठोराघात को सहन न कर सका। वह अभी तक जीवित हैं, पर दशा अत्यंत करुण है। आदमियों की सूरत से घृणा हो गई है, कभी हँसती हैं, कभी रोती हैं, कभी नाचती हैं, कभी गाती हैं। कोई समीप जाती है, तो दाँतों काटने दौड़ती हैं।

रहे मिस्टर जॉन सेवक। वह निराशामय धैर्य के साथ प्रातःकाल से संध्या तक अपने व्यावसायिक धंधों में रत रहते हैं। उन्हें अब संसार में कोई अभिलाषा नहीं है, कोई इच्छा नहीं है, धन से उन्हें निस्स्वार्थ प्रेम है, कुछ वही अनुराग, जो भक्तों को अपने उपास्य से होता है। धन उनके लिए किसी लक्ष्य का साधन नहीं है, स्वयं लक्ष्य है। न दिन को दिन समझते हैं, न रात को रात। कारबार दिन-दिन बढ़ता जाता है। लाभ दिन-दिन बढ़ता जाता है या नहीं, इसमें संदेह है। देश में गली-गली, दूकान-दूकान इस कारखाने के सिगार और सिगरेटों की रेल पेल है। वह अब पटने में एक तंबाकू की मिल खोलने की आयोजना कर रहे हैं, क्योंकि विहार-प्रांत में तंबाकू कसरत से पैदा होती है। उनको धनकामना विद्या-व्यसन की भाँति तृप्त नहीं होती।