सेवासदन/४२

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सेवासदन  (1919) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १८५ ] ढाल जो दीवार से लटक रही थी इस झनकार से थरथराने लगी। बोले, सच कहिये, आपने किससे सुना?

पझसिंह इस समय हँसी का तात्पर्य न समझकर कुछ भौंचक से हो गये। उन्हें मालूम हुआ कि कुँवर साहब मुझे बनाना चाहते है। चिढ़कर बोले, सभी कह रहे है, किस-किसका नाम लूँ?

कुँवर साहब ने फिर जोर से कहकहा मारा और हँसते हुए पूछा, और आपको विश्वास भी आ गया?

पद्मसिंह को अब इसमें कोई सन्देह न रहा कि यह सब मुझे झेपाने का स्वाँग है, जोर देकर वोले, अविश्वास करने के लिए मेरे पास कोई कारण नहीं है।

कुंवर——कारण यही है कि मेरे साथ घोर अन्याय होगा। मैंने अपनी समझ में अपनी सम्पूर्ण वाक्यशक्ति आपके प्रस्ताव के समर्थन से खर्च कर दी थी। यहाँ तक कि मैंने विरोध को गम्भीर विचार के लायक भी न सोचा। व्यंग्योक्ति ही से काम लिया। (कुछ याद करके) हां एक बात हो सकती है। समझ गया। (फिर कहकहा मारकर) अगर यह बात है मैं कहूँगा कि म्युनिसिपैलिटी बिलकुल बछिया के ताऊ लोगों ही से भरी हुई है। व्यंग्योक्ति तो आप समझते ही होंगे। बस, यह सारा कसूर उसी का है। किसी सज्जन ने उसका भाव न समझा। काशी के सुशिक्षित सम्मानित म्युनिसिपल कमिश्नरों में किसी ने भी एक साधारण-सी बात न समझी शोक! महाशोक!! महाशय, आपको बड़ा कष्ट हुआ। क्षमा कीजिये मैं इस प्रस्ताव का हृदय से अनुमोदन करता हूँ।

पद्मसिंह भी मुस्कुराये कुँवर साहब की बातों पर विश्वास आया। बोले, अगर इन लोगों ने ऐसा धोखा खाया तो वास्तव में उनकी समझ बड़ी मोटी है। मगर प्रभाकर राव धोखे में आ जायें, यह समझ में नहीं आता, पर ऐसा मालूम होता है कि नित्य अनुवाद करते-करते उनकी बुद्धि भी गयब हो गई है।

पद्मसिंह जब यहाँ से चले तो उनका मन ऐसा प्रसन्न था मानो वह [ १८६ ] किसी बड़े रमणीक स्थानकी सैर कर के आते हो। कुँवर साहब के प्रेम और उन्हें वशीभूत कर लिया था।

३७

सदन जब घर पर पहुँचा तो उसके मन की दशा उस मनुष्य की-सी थी जो बरसों की कमाई लिए, मन में सहस्रों मन्सूबे बाँधता, हर्ष से उल्लसित घर आये और यहाँ सन्दूक खोलने पर उसे मालूम हो कि थैली खाली पड़ी हैं।

विचारों की स्वतन्त्रता विद्या संगति और अनुभवपर निर्भर होती है। सदन ने सभी गुणों से रहित था। यह उसके जीवन का वह समय था जब उसको अपने धार्मिक विचारों पर, अपनी सामाजिक रीतियों पर एक अभिमान-सा होता है। हमें उनमें कोई त्रुटि नहीं दिखाई देती, जबहम अपने धर्म के विरुद्ध कोई प्रमाण या दलील सुनने का साहस नहीं कर सकते, तब हममें क्या और क्यों का विकास नहीं होता। सदन को घर से निकल भागना स्वीकार होता, इसके बदले कि वह घर की स्त्रियों को गंगा नहलाने ले जाय। अगर स्त्रियो की हँसी की आवाज कभी मरदाने में जाती तो वह तेवर बदले घर में आता और अपनी माँ को आड़े हाथों लेता। सुभद्रा ने अपनी सास का शासन भी ऐसा कठोर न पाया था। आत्मपतन को वह दार्शनिक की उदार दृष्टि से नहीं, शुष्क योगी की दृष्टि से देखता था। उसने देखा था कि उसके गाँव में एक ठाकुर ने एक बेड़िन बैठा ली थी तो सारे गाँव ने उनके द्वारपर आना जाना छोड़ दिया था और इस तरह उसके पीछे पड़े थे कि उसे विवश होकर बेड़िन को घर से निकालना पड़ा। नि:सन्देह वह सुमन बाई पर जान देता था, लेकिन उसके लौकिक शास्त्र में यह प्रेम उतना अक्षम्य न था जितना सुमन की परछाई का उसके घर में आ जाना। उसने अब तक सुमन के यहाँ पान तक न खाया था। वह अपनी कुल-मर्यादा और सामाजिक प्रथा को अपनी आत्मा से कहीं बढ़कर महत्व की वस्तु समझता था। उस अपमान और निन्दा की कल्पना ही उसके लिए असहय थी जो कुलटा स्त्री से सम्बन्ध हो जाने के कारण उसके कुल पर [ १८७ ]
ढाल जो दीवारसे लटक रही थी इस झनकारसे थरथराने लगी। बोले सचकहिये,आपने किससे सुना?

पद्मसिह इस कुसमय हँसीका तात्पर्य न समझकर कुछ भौंचक से हो गये। उन्हें मालूम हुआ कि कुँअर साहब मुझे बनाना चाहते है। चिढकर बोले, सभी कह रहे है, किस-किसका नाम लू?

कुँअर साहबने फिर जोरसे कहकहा मारा और हँसते हुए पूछा, और आपको विश्वास भी आ गया?

पद्मसिंहको अब इसमें कोई सन्देह न रहा कि यह सब मुझे झेंपानेका स्वाँग है, जोर देकर बोले, अविश्वास करनेके लिए मेरे पास कोई कारण नही है।

कुंअर-कारण यही है कि मेरे साथ घोर अन्याय होगा। मैने अपनी समझ में अपनी सम्पूर्ण वाक्यशक्ति आपके प्रस्तावके समर्थनमें खर्च कर दी थी। यहाँतक कि मैने विरोधको गम्भीर विचारके लायक भी न सोचा। व्यंग्योक्ति ही से काम लिया। (कुछ याद करके) हाँ एक बात हो सकती है। समझ गया। (फिर कहकहा मारकर) अगर यह बात है तो मैं कहुँगा कि म्युनिसिपैलिटी बिलकुल बछियाके ताऊ लोगो ही से भरी हुई हैं। व्यंग्योक्ति तो आप समझते ही होंगे । बस,यह सारा कसूर उसीका है। किसी सज्जन ने उसका भाव न समझा। काशीके सुशिक्षित सम्मानित म्युनिसिपल कमिश्नरों मे किसीने भी एक साधारण-सी बात न समझी। शोक! महाशोक!! महाशय, आपको बड़ा कष्ट हुआ। क्षमा कीजिये मैं इस प्रस्तावका हृदयसे अनुमोदन करता हूँ।

पद्मसिह भी मुस्कुराये। कुँअर साहबकी बातों पर विश्वास आाया। बोले, अगर इन लोगों ने ऐसा धोखा खाया तो वास्तव मे उनकी समझ बड़ी मोटी है। मगर प्रभाकरराव धोखें में आ जायें, यह समझ में नहीं आता, पर ऐसा मालूम होता है कि नित्य अनुवाद करते-करते उनकी बुद्धि भी गायब हो गई है।

पद्मसिहं जब यहाँ से चले तो उनका मन ऐसा प्रश्न या मानों वह [ १८८ ] सदन दालमंण्डी के सामने आकर ठिठक गया; उसकी प्रेमाकांक्षा मन्द हो गई। वह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थान पर आया जहाँ से सुमन की अट्टालिका। साफ दिखाई देती थी। यहाँ से कातर नेत्रों से उस मकान के द्वार की ओर देखा। द्वार बन्द या ताला पड़ा हुआ था। सदन के हृदय से एक बोझा-सा उतर गया। उसे कुछ वैसा ही आनन्द हुआ जैसा उस मनुष्य को होता है जो पैसा न रहने पर भी लड़के की जिद से विवश होकर खिलौने की दूकान पर जाता है और उसे बन्द पाता है।

लेकिन घर पहुँचकर सदन अपनी उदासीनता पर बहुत पछताया। वियोग को पीड़ा के साथ साथ उसकी व्यग्रता बढ़ती जाती थी। उसे किसी प्रकार का धैर्य न होता था। रात को जब सब लोग खा-पीकर सोये तो वह चुपके से उठा और दालमण्डी की ओर चला। जाड़े की रात थी, ठण्डी हवा चल रही थी, चन्द्रमा कुहरे की आड़ से झांकता था और किसी घबराये हुए मनुष्य के समान सवेग दौड़ता चला जाता था। सदन दालमण्डी तक बड़ी तेजी से आया, पर यहाँ आकर फिर उसके पैर बँध गये। हाथ-पैर की तरह उत्साह भी ठण्डा पड़ गया। उसे मालूम हुआ कि इस समय यहाँ मेरा आना अत्यन्त हास्यास्पद है। सुमन के यहाँ जाऊँ तो वह मुझे क्या समझेगी। उसके नौकर आराम से सो रहे होगें। वहाँ कौन मुझे पूछता है। उसे आश्चर्य होता था कि मैं यहाँ कैसे चला आया। मेरी बुद्धि उस समय कहाँ चली गई। अतएव वह लौट पड़ा।

दूसरे दिन सन्ध्या समय वह फिर चला। मन से निश्चय कर लिया था कि अगर सुमन ने मुझे देख लिया और बुलाया तो जाऊँगा, नहीं तो सीधे अपने राह चला जाऊँगा। उसका मुझे बुलाना ही बतला देगा कि उसका हृदय मेरी तरफ से साफ है। नहीं तो इस घटना के बाद वह मुझे बुलाने ही क्यों लगी। जब और आगे बढ़कर उसने फिर सोचा, क्या वह मुझे बुलाने के लिये झरोखेपर बैठी होगी। उसे क्या मालूम है कि मैं यहाँ आ गया। यह नहीं, मुझे एक बार स्वयं उसके पास चलना चाहिये। सुमन मुझ से, कभी नाराज नहीं हो सकती और जो नाराज भी हो तो क्या [ १८९ ] अच्छादित हो जाती। वह जनवा से में पंण्डित पद्मसिंह की बात सुन-सुनकर अधीर हो रहा था। वह डरता था कि कहीं पिताजी उनकी बातों में न आ जाँय। उसको समझ में न आता कि चाचा साहब को क्या हो गया है? अगर यही बातें किसी दूसरे मनुष्य ने की होती तो वह अवश्य उसकी जबान पकड़ लेता। लेकिन अपने चाचा से वह बहुत दबता था। उसे उनका‌ प्रतिवाद करने की बड़ी प्रबल इच्छा हो रही थी; उसकी तार्किक शक्ति कभी इतनी सतेज न हुई थी, और यदि विवाद तर्क हीं तक रहता तो वह जरुर उनसे उलझ पड़ता। लेकिन मदनसिंह की उद्रता ने उसके प्रतिवाद उत्सुक्ता को सहानुभूति के रूप में परिणत कर दिया।

इधर से निराश होकर सदन का लालसापूर्ण हृदय फिर सुमन की ओर लपका। विषय-वासना का चसका पड़ जान के बाद अब उसकी प्रेमकल्पना निराधार नहीं रह सकती थी। उसका हृदय एक बार प्रेमदीपक से आलोकित होकर अब अन्धकार में नहीं रहना चाहता था। वह पद्मसिंह के साथ ही काशी चला आया।

किन्तु यहाँ आकर वह एक बड़ी दुविधा में पट गया। उसे समय होने लगा कि कही सुमन बाई को ये सब समाचार मालूम न हो गये हो। वह वहाँ स्वयं तो न रही होगी, लोगों ने उसे अवश्य ही त्याग दिया होगा, लेकिन उसे विवाह की सूचना जरूर दी होगी। ऐसा हुआ होगा तो कदाचित्व ह मुझसे सीधे मुँह बात भी न करेगी। सम्भव है वह मेरा तिरस्कार भी करे। लेकिन संध्या होते ही उसने कपड़े बदले, घोड़ा कसवाया और दालमंडी की ओर चला। प्रेम मिलाप की आनन्दपूर्ण कल्पना के सामने वे शंकाए निर्मूल हो गई। वह सोच रहा था कि सुमन मुझसे पहले क्या कहेगी, ओर में उसका उत्तर क्या दूँगा, कही उसे कुछ न मालूम हो और वह जाते ही प्रेम से मेरे गले लिपट जाय और कहे कि तुम बड़े निठुर हो। इस कल्पना ने उसकी प्रेमाग्नि को और भी भड़कया, उसने घोड़े को एट लगाई और एक क्षणमे दालमंण्डी के निकट आ पहुँचा, पर जिस प्रकार एक खिलाड़ी लड़का पाटशाला के द्वारपर आकर भीतर जाते हुए डरता है उसी प्रकार [ १९० ] सदन दालमंण्डी के सामने आकर ठिठक गया; उसकी प्रेमाकांक्षा मन्द हो गई। वह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थानपर आया जहां से सुमनकी अट्टालिका साफ दिखाई देती थी। यहाँ से कातर नेत्रों से उस मकानके द्वार की ओर देखा। द्वार बन्द था ताला पड़ा हुआ था । सदन के हृदयसे एक बोझा-सा उतर गया। उसे कुछ वैसा ही आनन्द हुआ जैसा उस मनुष्यको होता है जो पैसा न रहनेपर भी लड़के की जिद से विवश होकर खिलौने की दूकान पर जाता है और उसे बन्द पाता है ।

लेकिन घर पहुँचकर सदन अपनी उदासीनता पर बहुत पछताया। वियोग की पीड़ा के साथ साथ उसकी व्यग्रता बढ़ती जाती थी। उसे किसी प्रकार धैर्य न होता था। रातको जब सब लोग खा-पीकर सोये तो वह चुपके से उठा और दालमण्डी की ओर चला। जाड़े की रात थी, ठण्डी हवा चल रहो थी, चन्द्रमा कुहरे की आड़ से झांकता था और किसी घबराये हुए मनष्य के समान सवेग दौड़ता चला जाता था। सदन दालमण्डी तक बड़ी तेजी से आया,पर यहाँ आकर फिर उसके पैर बंध गये । हाथ-पैर की तरह उत्साह भी ठण्डा पड़ गया। उसे मालूम हुआ कि इस समय यहाँ मेरा आना अत्यन्त हास्यास्पद है। सुमनके यहाँ जाऊँ तो वह मुझे क्या समझेगी। उसके नौकर आराम से सो रहे होंगे। वहाँ कौन मुझे पूछता है। उसे आश्चर्य होता था कि मैं यहाँ कैसे चला आया!मेरी बुद्धि उस समय कहाँ चली गई। अतएव वह लौट पड़ा।

दूसरे दिन सन्ध्या समय वह फिर चला। मनमे निश्चय कर लिया था कि अगर सुमनने मुझे देख लिया और बुलाया तो जाऊँगा, नहीं तो सीधे अपने राह चला जाऊंगा। उसका मुझे बुलाना ही बतला देगा कि उसका हृदय मेरी तरफ से साफ है। नहीं तो इस घटना के बाद वह मुझे बुलाने ही क्यों लगी। जछ और आगे बढ़कर उसने फिर सोचा,क्या वह मुझे बुलानेके लिये झरोखे पर बैठी होगी। उसे क्या मालूम है कि मैं यहाँ आ गया। यह नहीं,मुझे एक बार स्वयं उसके पास चलना चाहिये । सुमन मुझसे, कभी नाराज नहीं हो सकती और जो नाराज भी हो तो क्या
[ १९१ ] मैं उसे मना नहीं सकता? मैं उसके सामने हाथ जोडूँगा उसके पैर पडूँगा और अपने आँँसुओं से उसके मनकी मैल धो दूँगा, वह मुझसे कितनी रुठे, लेकिन मेरे प्रेम का चिन्ह अपने हृदय से नहीं मिटा सकती। आह! वह अगर अपने कमल नेत्रों मे आँँसू भरे हुए मेरी ओर ताके तो मैं उसके लिये क्या न कर डालूँँगा? यदि उसे कोई चिंता हो तो मैं उस चिंंता को दूर करनेके लिये अपने प्राण तक समर्पण कर दूँगा। तो क्या वह इस अपराध को क्षमा न करेगी? लेकिन ज्योंही वह दालमंडी के सामने, पहुँचा, उसकी यह प्रेम कामनाएँ उसी प्रकार नष्ट हो गई जैसे अपने गाँव में सन्ध्या समय नीम के नीचे देवी की मूर्ति देखकर उसकी तर्कनाएँ नष्ट हो जाती थी। उसने सोचा, कहीं वह मुझे देखें और अपने मन में कहे, वह जा रहे है कुँँअर साहब, मानों सचमुच किसी रियासत के मालिक है। कैसा कपटी धूर्त है। यह सोचते ही उसके पैर बंध गये। आगे न जा सका।

इसी प्रकार कई दिन बीत गये। रात और दिन में उसकी प्रेमकल्पनाएँ जो बालूकी दीवार खड़ी करती, वे सन्ध्या समय दालमंडी के सामने अविश्वास के एक ही झोके में गिर पड़ती था।

एक दिन वह घूमते हुए कुईन्स पार्क जा निकला वहाँ एक शामियाना तना हुआ था और लोग बैठे हुए प्रोफेसर रमेशदत्त का प्रभावशाली व्याख्यान सुन रहे थे। सदन घोड़े से उतर पड़ा और व्याख्यान सुनने लगा। उसने मनमे निश्चय किया कि वास्तव में वेश्याओं से हमारी बड़ी हानि हो रही है ये समाज के लिये हलाहल के तुल्य है। मैं बहुत बचा, नहीं तो कहीं का न रहता। इन्हें अवश्य शहर से बाहर निकाल देना चाहिए। यदि ये बाजार में न होती तो मैं सुमन बाई के जाल मे कभी न फंसता।

दूसरे दिन वह फिर कुईन्म पार्क की तरफ गया। आज यहाँ मुन्शी अबुलवफा का भावपूर्ण ललित व्याख्यान हो रहा था। सदन ने उसे भी ध्यान से सुना। उसने विचार किया, निस्संदेह वेश्याओ से हमारा उपकार होता है। सच तो है, ये न हो तो हमारे देवताओं की स्तुति करनेवाला भी कोई न रहे। यह भी ठीक ही कहा कि वेश्यागृह ही वह स्थान है जहाँ हिन्दू [ १९२ ] मुसलमान दिल खोलकर मिलते है, जहाँ द्वेष का वास नहीं है जहाँ जीवन संग्राम से विश्राम लेनेके लिये अपने हृदय शोक और दुःख भुलाने के लिये शरण लिया करते है। अवश्य ही उन्हें शहर से निकाल देना उन्ही पर नहीं, वरन् सारे समाज पर घोर अत्याचार होगा।

कई दिन के बाद यह विचार फिर पलटा खा गया। यह क्रम बन्द न होता था। सदन में स्वच्छद विचार की योग्यता न थी। वह किसी विषय के दोष और गुण तौलने और परखने की सामर्थ्य न रखता था। अतएव प्रत्येक सबल युक्ति उसके विचारों को उलट-पलट देती हैं।

उसने एक दिन पद्मसिह के व्याख्यान का नोटिस देखा। तीन ही बजे से चलने की तैयारी करने लगा और चार बजे बेनीबाग में जा पहुँचा। अभी वहाँ कोई आदमी न था, कुछ लोग फर्श बिछा रहे थे। वह घोड़े से उतर पड़ा और बिछाने में लोगों की मदद करने लगा। पाँच बजते बजते लोग आने लगे और आध घंटे मे वहाँ हजारों मनुष्य एकत्र हो गये। तब उसने एक फिटन पर पद्मसिंह को आते देखा। उसकी छाती धड़कने लगी। पहले रुस्तम भाई ने एक छोटी सी कविता पढ़ी, जो इस अवसर के लिये सैयद तेगअली ने रची थी। उसके बैठने पर लाला विट्ठलदास खड़े हुए। यद्यपि उनकी वक्तृता रूखी थी, न कही भाषण लालित्यका पता था, न कटाक्षोंका, पर लोग उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुनते रहे। उनके नि:स्वार्थ सार्वजनिक कृत्यों के कारण उनपर जनता की बडी श्रद्धा थी। उनकी रूखी बातों को लोग ऐसे चाव से सुनते थे जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीता है। उनके पानी के सामने दूसरों का शर्बत फीका पड़ जाता था। अन्त में पद्मसिंह उठे। सदन के हृदय में गुदगुदी-सी होने लगी, मानों कोई असाधारण बात होने वाली है। व्याख्यान अत्यन्त रोचक और करुणारस से परिपूर्ण था भाषा की सरलता और सरसता मन को मोहती थी। बीच-बीच मे उनके शब्द ऐसे भावपूर्ण हो जाते कि सदन के रोएँ खडे हो जाते थे। वह कह रहे थे कि हमने वेश्याओं को शहर के बाहर रखने का प्रस्ताव इसलिए नहीं किया कि हमें उनसे घृणा है। हमे उनसे घृणा करने का कोई अधिकार नहीं है। यह उनके [ १९३ ] नहीं किया; तुमको तो मैंने अपनी प्रेम सपत्ति सौंप दी थी। क्या उसका तुम्हारी दृष्टि में कुछ भी मूल्य नहीं है?” सदन फिर चौक पड़ता और मन को उधर से हटाने की चेष्टा करता। उसने एक व्याख्यान में सुना था कि मनुष्य का जीवन अपने हाथों में है, वह अपने को जैसा चाहे बना सकता है, इसका मूल मन्त्र यही है कि बुरे, क्षुद्र, अश्लील विचार मन में न आन पावे, वह बलपूर्वक इन विचारों को हटाता रहे और उत्कृष्ट विचारों तथा भावों से हृदय को पवित्र रक्खे। सदन इस सिद्धांत को कभी न भूलता था। उस व्याख्यान में उसने यह भी सुना था कि जीवन को उच्च बनाने के लिये उच्च शिक्षा की आवश्यकता नहीं, केवल शुद्ध विचारों और पवित्र भावों की आवश्यकता है। सदन को इस कथन से बड़ा संतोष हुआ था इसलिये वह अपने विचारों को निर्मल रखने का यत्न करता रहता। हजारों मनुष्यों ने उस व्याख्यान में सुना था कि प्रत्येक कुविचार हमारे इस जीवन को न आने वाले जीवन को भी नीचे गिरा देता है। लेकिन औरों ने जो कुछ विज्ञ थे, सुना और भूल गये, सरल हृदय सदनने सुना और उसे गाँठ में बाँध लिया। जैसे कोई दरिद्र मनुष्य सोने की एक गिरी हुई चीज पा जाय और उसे अपने प्राण से सभी प्रिय समझे। सदन इस समय आत्म-सुधार की लहर मे बह रहा था। रास्ते में अगर उसकी दृष्टि किसी युवती पर पड़ जाती तो तुरन्त ही अपने को तिरस्कृत करता और मन को समझाता, क्या इस क्षणभर के नेत्र सुख के लिये तू अपने भविष्य जीवन का सर्वनाश किये डालता है। इस चेतावनी से उसके मन को शान्ति होती थी।

एक दिन सदन को गंगास्नान के लिए जाते हुए चौक में वेश्याओं का एक जुलूस दिखाई दिया। नगर की सबसे नामी गिरामी वेश्या ने एक उर्म(धामिक जलसा) किया था। यह वेश्याएँ वहाँ से वापस आ रही थी। सदन इस दृश्य को देखकर चकित हो गया। सौंदर्य, सुवर्ण, और सौरभ का ऐसा चमत्कार उसने कभी न देखा था। रेशम, रंग और रमणीयता का ऐसा अनुपम दृश्य, श्रृंगार और जगमगाहट की ऐसी अद्भुत छटा उसके लिए बिलकुल नई थी, उसने मनको बहुत रोका, पर न रोक सका। उसने उन [ १९४ ] अलौकिक सौदर्य मूर्तियों को एक बार आँख भरकर देखा, जैसे कोई विद्यार्थी महीनों के कठिन परिश्रम के बाद परीक्षा से निवृत्त होकर अमोद प्रमोद मे लीन हो जाय। एक निगाह से मन तृप्त न हुआ तो उसने फिर निगाह दौड़ाई, यहाँ तक कि उसकी निगाहों उस तरफ जम गई और बह चलना भूल गया। मूर्ति के समान खड़ा रहा। जब जुलूस निकल गया तो उसे सुधि आई चौका, मन को तिरस्कृत करने लगा। तूने महीनों की कमाई एक क्षण में गंवाई? वाह! मैंने अपनी आत्मा का कितना पतन कर दिया? मुझमें कितनी निर्बलता है? लेकिन अन्त में उसने अपने को समझाया कि केवल इन्हें देखने ही से मैं पाप का भागी थोड़े ही हो सकता हूँ? मैने इन्हे पाप-दृष्टि से नहीं देखा। मेरा हृदय वासनाओं से पवित्र है। परमात्मा की सौंदर्य सृष्टि से पवित्र आनन्द उठाना हमारा कर्तव्य है।

यह सोचते हुए वह आगे चला, पर उसकी आत्मा को संतोष न हुआ। मैं अपने ही को धोखा देना चाहता हूँ? यह स्वीकार कर लेने से क्या आपत्ति है कि मुझसे गल्ती हो गई, हाँ हुई और अवश्य हुई। मगर मन की वर्तमान अवस्था के अनुसार मैं उसे क्षम्य समझता हूँ। मैं योगी नहीं, सन्यासी नहीं, एक बुद्धिहीन मनुष्य हूँ। इतना ऊंचा आदर्श सामने रखकर मैं उसका पालन नहीं कर सकता। आह! सौंदर्य भी कैसी वस्तु है। लोग कहते हैं कि अधर्म से मुख की शोभा जाती रहती है। पर इन रमणियों का अधर्म उनकी शोभा को और भी बढ़ाता है। कहते है मुख सौदर्य का दर्पण है। पर यह बात भी मिथ्या ही जान पड़ती है।

सदन ने फिर मन को सँभाला और उसे इस ओर से विरक्त करने के लिये इस विषय के दूसरे पहलू पर विचार करने लगा। हाँ वे स्त्रियाँ बहुत ही सुन्दर है, बहुत ही कोमल है, पर उन्होंने अपने इन स्वर्गीय गुणों का कैसा दुरुपयोग किया है। उन्होंने अपनी आत्मा को कितना गिरा दिया है। हां! केवल इन रेशमी वस्त्रों के लिये इन जगमगाते हुए आभूषणों के लिये‌ उन्होंने अपनी आत्माओं का विक्रय कर डाला है। वे आँखे जिनसे प्रेम की ज्योति निकलनी चाहिये थी, कपट कटाक्ष और कुचेष्टाओं से भरी हुई है। [ १९५ ] वे हृदय जिनमें विशुद्ध निर्मल प्रेम का स्रोत बहना चाहिये था, कितने दुर्गंध विशाक्त मलिनता से ढँके हुए है। कितनी अधोगति है।

इन घृणात्मक विचारों सदन को कुछ शान्ति हुई। वह टहलता हुआ गंगातटकी ओर चला। इसी विचार में आज उसे देर हो गई थी। इसलिये वह उस घाट पर न गया। जहाँ वह नित्य नहाया करता था। वहाँ भीडभाड़ हो गई होगी। अतएव उस घाटपर गया जहाँ विधवाश्रम स्थित था। वहाँ एकात रहता था। दूर होने के कारण शहर के लोग वहाँ कम जाते थे।

घाट के निकट पहुँचने पर सदन ने एक स्त्री को घाट की ओर से जाते देखा। तुरन्त पहचान गया। यह सुमन थी, पर यह कितनी बदली हुई। न वह लंबे लंबे केश, न वह कोमल गति, न वह हंसते हुए गुलाब के से होठ, न वह चंचल ज्योति से चमकती हुई आँख न वह बनाव सिंगार, न वह रनजटित आभूषणों की छटा, वह केवल सफेद साडी पहने हुए थी। उसकी चाल मे गंभीरता औीर मुख से नैराश्य और वैराग्य भाव झलकता था काव्य वही था, पर अलंकार विहीन, इसलिये सरल और मार्मिक। उसे देखते ही सदन ने प्रेम से विह्वल होकर कई पग बड़े वेग से चला पर उसका यह रूपांतर देखा तो ठिठक गया, मानो उसे पहचानने में भूल हुई, मानो वह सुमन नहीं कोई और स्त्री थी। उसका प्रेमोत्साह भंग हो गया। समझ में न आया कि यह कायापलट क्यों हो गई? उसने फिर सुमन की ओर देखा वह उसकी ओर ताक रही थी, पर उसकी दृष्टि में प्रेम की जगह एक प्रकार की चिंता थी, मानो वह उन पिछली बातों को भूल गई है, या भूलना चाहती हैं। मानो यह हृदय की दी हुई आग को उभारना नहीं चाहती। सदन को ऐसा अनुमान हुआ कि वह मुझे, धोखेबाज और स्वार्थी समझ रही है। उसने एक क्षण बाद फिर उसकी ओर देखा। यह निश्चय करने के लिये कि मेरा अनुमान भ्रांतिपूर्ण तो नहीं है। फिर दोनों की आँखें मिली पर मिलते ही हट गई। सदन को अपने अनुमान का निश्चय हो गया। निश्चय के साथ ही अभिमान का उदय हुआ। उसने अपने मन को धिक्कारा। अभी अभी मैंने अपने को इतना समझाया है और इतनी ही देर में फिर उन्हीं [ १९६ ] कुवासनाओं में पड़ गया। उसने फिर सुमन की तरफ नहीं देखा। वह सिर झुकाये उसके सामने से निकल गई। सदन ने देखा, उसके पैर काँप रहे थे, वह जगह से न हिला, कोई इशारा भी नहीं किया। अपने विचार में उसने सुमन पर सिद्ध कर दिया कि अगर तुम मुझसे एक कोस भागोगी तो मैं तुमसे सौ कोस भागने को प्रस्तुत हैं। पर उसे यह ध्यान न रहा कि मैं अपनी जगह पर मूर्तिवत् खड़ा हूँ। जिन भावों को उसने गुप्त रखना चाहा, स्वंय उन्ही भावों की मूर्ति बन गया।

जब सुमन कुछ दूर निकल गई तो वह लौट पड़ा और उसके पीछे अपने को छिपाता हुआ चला। वह देखना चाहता था कि सुमन कहाँ जातीहै। विवेक ने वासना के आगे सिर झुका लिया।

३९

जिस दिन से बारात लौट गई, उसी दिन से कृष्णचन्द्र फिर घर से बाहर नहीं निकले। मन मारे हुए अपने कमरे में बैठे रहते। उन्हे अब किसी को अपना मुँह दिखाते लज्जा आती थी। दुश्चरित्रा सुमन ने उन्हे संसार की दृष्टि में चाहे कम गिराया हो, पर वे अपनी दृष्टि पे कहीं के न रहे। वे अपने अपमान को सहन न कर सकते थे। वे तीन चार साल कैद रहे, फिर भी अपनी आँखों में इतने नीचे नही गिरे थे। उन्हे इस विचार से संतोष हो गया था कि यह दंड भोग मेरे कुकर्म का फल है, इस कालिमा ने उनके आत्म-गौरव सर्वनाश कर दिया। वे अब नीच मनुष्यों के पास भी नहीं जाते थे, जिनके साथ बैठकर वह चरस की दम लगाया करते थे। वे जानते थे कि मैं उनसे भी नीचे गिर गया हूँ। उन्हें मालूम होता था कि सारे संसार में मेरी ही निन्दा हो रही है। लोग कहते होगें कि इसकी बेटी, यह ख्याल आते ही वह लज्जा और विषाद के सागर में निमग्न हो जाते। हाय! यदि मैं जानता कि वह यो मर्यादा का नाश करेगी तो मैंने उसका गला घोंट दिया होता। यह मैं जानता हूँ कि वह अभागिनी थी, किसी बड़े धनी कुल में रहने योग्य थी, भोग विलासपर जान देती थी। पर यह मैं न जानता था कि [ १९७ ] उसकी आत्मा इतनी निर्बल है। संसार में किसके दिन समान होते है? विपत्ति सभी पर आती है। बड़े-बड़े धनवानों की स्त्रियाँ अन्न वस्त्र को तरसती है पर कोई उनके मुखपर चिन्ता का चिन्ह भी नहीं देख सकता। वे रो रोकर दिन काटती है, कोई उनके आँसू नहीं देखता। वे किसी के सामने अपनी विपत्ति की कथा नहीं कहती। वे मर जाती है पर किसीका एहसान सिरपर नहीं लेती। वे देवियाँ है। वे कुल मर्यादा के लिये जीती है और उसकी रक्षा करती हुई मरती है, पर यह दुष्टा, यह अभागिनी.... और उसका पति कैसा कायर है कि उसने उसका सिर नहीं काट डाला। जिस समय उसने घर से बाहर पैर निकाला, उसने क्यों उसका गला नहीं दबा दिया? मालूम होता है वह भी नीच, दुराचारी नामर्द है। उसने अपनी कुलमर्यादा का अभिमान होता तो यह नौबत न आती। उसे अपने अपमान की लाज न होगी पर मुझे हैं और मैं सुमन को इसका दण्ड दूँगा। जिन हाथों से उसे पाला, खिलाया, उन्हीं हाथों से उसके गलेपर तलवार चलाऊँगा। यही आँखे कभी उसे खेलती देखकर प्रसन्न होती थी, अब उसे रक्त में लोटती देखकर तृप्त होगी। मिटी हुई मर्यादा पुनरुद्धार का इसके सिवाय कोई उपाय नहीं। संसार को मालूम हो जायगा कि कुल मर्य्यादा पर मरने वाले पापाचरण का क्या दंड देते है।

यह निश्चय करके कृष्णचन्द्र अपने उद्देश्य को पूरा करने के साधनों पर विचार करने लगे। जेलखाने में उन्होंने अभियुक्तों से हत्याकांड के कितने ही मन्त्र सीखे थे। रात दिन उन्हीं बातों की चर्चाएंं रहती थी। उन्हें सबसे उत्तम साधन यही मालूम हुआ कि चलकर तलवार से उसको मारूँ और तब पुलिस में जाकर आप ही इसकी खबर दूँ मैजिस्ट्रेट के सामने मेरा जो बयान होगा उसे सुनकर लोगो को आँखें खुल जायगी। मन-ही-मन इस प्रस्ताव से पुलकित होकर वह उस बयान की रचना करने लगे। पहले कुछ सभ्य समाज की विलासिता की उल्लेख कहूँगा, तब पुलिस के हथकड़ी की कलई खोलूँगा, इसके पश्चात् वैवाहिक अत्याचारों का वर्णन करूँगा। दहेज प्रथा पर ऐसी चोट कहूँगा कि सुनकर लोग दंग रह जाय। पर [ १९८ ] पर सबसे महत्वशील वह भाग होगा जिसमे में दिखाऊँगा कि अपनी कुल मर्यादा के मिटाने वाले हम है। हम अपनी कायरता से, प्राण भय से, लोकनिन्दा के डर से, झूठे संतान प्रेम से अपनी बेहयाई से आत्मगौरव की हीनता से ऐसे पापा चरणों को छिपाते है, उन पर परदा डाल देते है। इसी का यह परिणाम है कि दुर्बल आत्माओं का साहस इतना बढ़ गया है।

कृष्णचन्द्र ने यह संकल्प तो कर लिया पर अभी तक उन्होंने यह न सोचा कि शान्ता की क्या गति होगी। इस अपमान की लज्जा ने उनके हृदय में ओर किसी चिन्ता के लिये स्थान न रखा था। उनकी दशा उस मनुष्य की-सी थी जो अपने बालक को मृत्युशय्यापर छोड़कर अपने किसी शत्रु से वैर चुकाने के लिये उद्यत हो जाय, जो डोंगीपर बैठा हुआ पानी में एक सर्प देखकर उसे मारने के लिये झपटे और उसे यह सुधि न रहे कि इस झपट से डोगी डूब जायगी।

संध्या का समय था। कृष्णचन्द्र ने आज हत्या मार्गपर चलने का निश्चय कर लिया था। इस समय उनका चित्त कुछ उदास था। यह वही उदासीनता थी जो किसी भयंकर काम के पहले चित्तपर आच्छादित हो जाया करती है। कई दिनों तक क्रोध के वेग से उत्तेजित और उन्मत्त रहने के बाद उनका मन इस समय जछ शिथिल हो गया था जैसे वायु कुछ समय तक वेग से चलने के बाद शान्त हो जाती है। चित्त की ऐसी अवस्था में यह उदासीनता बहुत ही उपयुक्त होती है। उदासीनता वैराग्य का एक सूक्ष्म स्वरूप है जो थोड़ी देर के लिए मनुष्य को अपने जीवनपर विचार करने की क्षमता प्रदान कर देती है, उस समय कि जब पूर्वस्मृतियाँ हृदयमे क्रीड़ा करने लगती है। कृष्णचन्द्र को वह दिन याद आ रहे थे जब उनका जीवन आनन्दमय था, जब वे नित्य सन्ध्या समय अपनी दोनों पुत्रियों को साथ लेकर सैर करने जाया करते थे। कभी सुमन को गोद उठाते, कभी शान्ता को जब वे लोटते तो गंगाजली किसी तरह ने प्रेम से दौड़कर दोनों लड़कियों को प्यार करने लगती थी। किसी आनन्द का अनुभव इतना सुखद नहीं होता जितना उनका स्मरण। वही जंगल और पहाड़ जो कभी आपको सुनसान और [ १९९ ]

बीहड़ प्रतीत होते थे; वही नदियाँ और झील जिनके तट पर से आप आंँखें बन्द किये निकल जाते थे, कुछ समय के पीछे एक अत्यंत मनोरम, शान्तिमय रूप धारण करके आपके स्मृति-नेत्रो के सामने आती है और फिर आप उन्हीं दृश्यों को देखने की आकांक्षा करने लगते है। कृष्णचन्द्र उस भूत- कालिक जीवन का स्मरण करते-करते गद्गगद् हो गये। उनकी आँखों से आंँसू की बूंद टपक पड़ी। हाय! उस आनन्दमय जीवन का ऐसा विवादमय अन्त हो रहा है! मैं अपने ही हाथो से अपनी ही गोद की खिलाई हुई लड़की का वध करने को प्रस्तुत हो रहा हूँ! कृष्णचन्द्र को सुमन पर दया आई। वह बेचारी कुएँ में गिर पड़ी है। क्या मैं अपनी ही लड़की पर, जिसे में आँखों की पुतली समझता था, जिसे सुख से रखनके लिये मैंने कोई बात उठा नहीं रखी, इतना निर्दय हो जाऊँ कि उसपर पत्त्थर फेकूं? लेकिन यह दया का भाव कृष्णचन्द्र के हृदय में देर तक न रह सका। सुमन के पापाभिनय का सबसे घृणोत्पादक भाग यह था कि आज उसका दरवाजा सबके लिये खुला हुआ है। हिन्दू, मुसलमान सब वहाँ प्रवेश कर सकते है। यह ख्याल आते ही कृष्णचन्द्र का हृदय लज्जा और ग्लानि से भर गया।

इतने में पंडित उमानाथ उनके पास आकर बैठ गये और बोले, मैं वकील के पास गया था। उनकी सलाह है कि मुकद्दमा दायर करना चाहिये।

कृष्णचन्द्र ने चौंककर पूछा कैसा-मुकदमा?

उमा---उन्ही लोगोंपर, जो द्वार से बारात लौटा ले गये।

कृष्ण---इससे क्या होगा?

उमा---इससे यह होगा कि या तो वह फिर कन्या से विवाह करेगे या हरजाना देंगे।

कृष्ण—पर क्या और बदनामी न होगी?

उमा—बदनामी जो कुछ होनी थी हो चुकी, अब किस बात का डर है? मैंने एक हजार रुपये तिलक में दिये चार पाँच सौ खिलाने पिलाने में खर्च किये, यह सब क्यों छोड़ दूँगा, यही रुपये किसी कंगाल कुलीन को दे [ २०० ] दूँगा तो वह खुशी से विवाह करने पर तैयार हो जायगा। जरा इन शिक्षित महात्माओं की कलई तो खुलेगी!

कृष्णचन्द्र ने लंबी सांस लेकर कहा, पहले मुझे विष दे दो, तब यह मुकद्दमा दायर करो।

उमानाथने कुद्ध होकर कहा, आप क्यों इतना डरते है?

कृष्णचन्द्र-मुकदमा दायर करने का निश्चय कर लिया है?

उमा—हाँ, मैने निश्चय कर लिया है। कल सारे शहर के बड़े-बड़े वकील वैरिस्टर जमा थे। यह मुकद्दमा अपने ढंग का निराला है। उन लोगों ने बहुत कुछ देख-भालकर तब यह सलाह दी है। दो वकीलों को बयाना तक दे आया हूँ।

कृष्णचन्द्र ने निराश होकर कहा, अच्छी बात है, दायर कर दो।

उमा---आप इससे असन्तुष्ट क्यों है?

कृष्ण---जब तुम आपही नहीं समझते तो मैं क्या बताऊँ? जो बात अभी दो चार गाँव में फैली है वह सारे शहर में फैल जायगी। सुमन अवश्य ही इजलास पर बुलाई जायगी, मेरा नाम गली-गली बिकेगा।

उमा—अब इससे कहाँ तक डरूँ? मुझे भी अपनी दो लड़कियों का विवाह करना है। यह कलंक अपने माथे लगाकर उनके विवाह में क्यों बाधा डालूँ?

कृष्ण-—तो तुम यह मुकदमा इसलिये दायर करते हो, जिसमें तुम्हारे नामपर कोई कंलक न रहे।

उमानाथ ने सगर्व कहा, हाँ, अगर आप उसका यह अर्थ लगाते है तो यही सही। बारात मेरे द्वार से लौटी है, लोगों को भ्रम हो रहा है कि सुमन मेरी लड़की है। सारे शहर से मेरा ही नाम लिया जा रहा है। मेरा दावा दस हजार का होगा, अगर पाँच हजार की डिगरी हो गयी तो शान्ता का किसी उत्तम कुल में ठिकाना लग जायगा। आप जानते है, जूठी वस्तु को मिठास के लोभ से लोग खाते हैं। जब तक रुपये का लोभ न होगा शान्ता का विवाह कैसे होगा? एक प्रकार से मेरे कुल में भी कलंक लग गया। पहले [ २०१ ] वह अपनी वाणी से कह सकती थी। उसके मन ने कहा, जिसे पतिव्रत जैसा साधन मिल गया है उसे और किसी साधन की क्या आवश्यकता? इसमें सुख, सन्तोष और शान्ति सब कुछ है।

आधी रात बीत चुकी थी। कृष्णचन्द्र घर से बाहर निकले। प्रकृति सुन्दरी किसी वृद्धा के समान कुहरे की मोटी चादर ओढे निद्रामें मग्न थी? आकाश में चन्द्रमा मुँह छिपाये हुए वेग से दौड़ा चला जाता था, मालूम नहीं कहाँ?

कृष्णचन्द्र के मन मे एक तीव्र आकांक्षा उठी, शान्ता को कैसे देखूँ। संसार में यही एक वस्तु उनके आनन्दमय जीवन का चिह्न रह गई थी। नैराश्य के धने अन्धकार में यही एक ज्योति उनको अपने मन की ओर खींच रही थी। वह कुछ देर तक द्वार पर चुपचाप खड़े रहे तब एक लंबी साँस लेकर आगे बढ़े। उन्हें ऐसा मालूम हुआ मानो गंगाजली आकाश में बैठी। हुई उन्हें बुला रही है।

कृष्णचन्द्र के मन में इस समय कोई इच्छा, कोई अभिलाषा, कोई चिन्ता न थी। संसार से उनका मन विरक्त हो गया था। वह चाहते थे कि किसी प्रकार जल्दी गंगातट पर पहुँचूँ और उसके अथाह जल में कूद पड़ूँ। उन्हें भय था कि कहीं मेरा साहस न छूट जाय। उन्होंने अपने संकल्प को उत्तेजित करने के लिये दौड़ना शुरू किया।

लेकिन थोड़ी ही दूर चलकर वह फिर ठिठक गये और सोचने लगे। पानी में कूद पड़ना ऐसा क्या कठिन है, जहाँ भूमि से पैर उखड़े कि काम तमाम हुआ। यह स्मरण करके उनका हृदय एक बार काँप उठा, अकस्मात् यह बात उनके ध्यान में आई कि कहीं निकल क्यों न जाऊँ? जब यहाँ रहूँगा ही नहीं तो अपना अपमान कैसे सुनूँगा? लेकिन इस बात को उन्होंने मन में जमने न दिया। मोह की कपटलीला उन्हें घोखा न दे सकीं। यद्यपि वह धार्मिक प्रकृति के मनुष्य नहीं थे और अदृश्य के एक अव्यक्त भय से उनका हृदय काप रहा था, पर अपने संकल्प को दृढ़ रखने के लिये वह अपने मन को यह विश्वास दिला रहे थे कि परमात्मा बड़ा दयालु और करुणाशील [ २०२ ] है। आत्मा अपने को भूल गई थी। वह उस अपने ही घर में जाते डरता है।

कृष्णचन्द्र इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए कोई चार मील चले गये। ज्यों-ज्यो गंगा तट निकट होता जाता था, त्यों-त्यों उनके हृदय की गति बढ़ती जाती थी। भय से चित्त अस्थिर हुआ जाता था। लेकिन वे इस आन्तरिक निर्बलता को कुछ तो अपने वेग और कुछ तिरस्कार से हटाने की चेष्टा कर रहे थे। हाँ मैं कितना निर्लज्ज, आत्मशून्य हूँ। इतनी दुर्दशा होने पर भी मरने से डरता हूँ। अकस्मात् उन्हें किसी के गाने की ध्वनि सुनाई दी। ज्यों-ज्यों वे आगे बढते थे, त्यों-त्यों वह ध्वनि निकट आती जाती थी। गाने वाला उन्हीं की ओर चला आ रहा था। उस निस्तब्ध रात्रि में कृष्णचन्द्र को वह गाना अत्यंत मधुर मालूम हुआ। कान लगाकर सुनने लगे :

हरिसों ठाकुर और न जनको।
  जेहि जेहि विधि सेवक सुख पावै तेहि विधि राखत तिनको॥
           हरिसों ठाकुर और न जनको।
       भूखे को भोजन जु उदर को तृषा तोय पट तनको।
  लाग्यो फिरत सुरभी ज्यों सुत सग उचित गमन गृह वनको।
           हरिसो ठाकुर और न जनको॥

यद्यपि गान माधुर्य-रस पूर्ण न था, तथापि वह शास्त्रोक्त था इसलिये कृष्णचन्द्र को उसमें बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। उन्हे इस शास्त्र का अच्छा ज्ञान था। इसने उनके विदग्ध हृदय को शान्ति प्रदान कर दी।

गाना बन्द हो गया और एक क्षण के बाद कृष्णचन्द्र ने एक दीर्घकाय जटाधारी साधु को अपनी ओर आते देखा। साधु ने उनका नाम और स्थान पूछा। उसके भाव से ऐसा ज्ञात हुआ कि वह उनसे परिचित है। कृष्णचन्द्र आगे बढ़ना चाहते थे कि उसने कहा, इस समय आप इधर कहाँ जा रहे हैं?

कृष्णचन्द्र——कुछ ऐसा ही काम आ पड़ा है। [ २०३ ]साधु—आधी रात को आपका गंगातट पर क्या काम हो सकता है?

कृष्णचन्द्र ने रुष्ट होकर उत्तर दिया, आप तो आत्मज्ञानी है। आपको स्वयं जानना चाहिये।

साधु——आत्मज्ञानी तो मैं नही हूंँ, केवल भिक्षुक हूँ, इस समय में आपको उधर न जाने दूँगा।

कृष्णचन्द्र——आप अपनी राह जाइये। मेरे काम में विघ्न डालने का आपको क्या अधिकार है?

साधु——अधिकार न होता तो मैं आपको रोकता ही नहीं। आप मुझसे परिचित नहीं है, पर मैं आपका धर्मपुत्र हूँ, मेरा नाम गजाधर पांडे हैं।

कृष्णचन्द्र——ओ हो! आप गजाधर पांडे है। आपने यह भेष कब से धारण कर लिया? आपसे मिलने की मेरी बहुत इच्छा थी, मैं आपसे‌ बहुत कुछ पूछना चाहता था।

गजाधर——मेरा स्थान गंगातटपर एक वृक्ष के नीचे है, चलिये वहाँ थोडी देर विश्राम कीजिये, मैं सारा वृत्तांत आपसे कह दूँगा।

रास्ते में दोनों मनुष्यों में कुछ बातचीत न हुई। थोड़ी देर में वे उस वृक्ष के नीचे पहुँच गये, जहाँ एक मोटासा कन्दा जल रहा था। भूमि पर पुआल बिछा हुआ था और एक मृग चर्म, एक कमंडल और एक पुस्तकों का बस्ता उसपर रखा हुआ था।

कृष्णचन्द्र आग तापते हुए बोले, आप साधु हो गये है, सत्य ही कहियेगा, सुमन की यह कुप्रवृत्ति कैसे हो गई?

गजाधर अग्निके प्रकाश में कृष्णचन्द्र के मुख की ओर मर्मभेदी दृष्टि से देख रहे थे। उन्हें उनके मुखपर उनके हृदय के समस्त भाव अकिंत देख पड़ते थे। वह अब गजाधर न थे। सत्मग और विरक्ति ने उनके ज्ञान को विकसित कर दिया था। वह उस घटना पर जितना ही विचार करते थे। उतना ही उन्हें पश्चात्ताप होता था। इस प्रकार अनुतप्त होकर उनका [ २०४ ] हृदय सुमन की ओर से बहुत उदार हो गया था। कभी-कभी उनका जी चाहता था कि चलकर उसके चरणों पर सिर रख दूँ।

गजाधर बोले, इसका कारण मेरा अन्याय था। यह सब मेरी, निर्दयता ओर अमानुषीय व्यवहार का फल है। वह सर्वगुण संपन्न थी, वह इस योग्य थी कि किसी बड़े घर की स्वामिनी बनती। मुझ जैसा दुष्ट दुरात्मा दुराचारी मनुष्य उसके योग्य न था। उस समय मेरी स्थूल दृष्टि उसके गुणों को न देख सकी। ऐसा कोई कष्ट न था जो उस देवी को मेरे साथ न झेलना पड़ा हो। पर उसने कभी मन मैला न किया। वह मेरा आदर करती थी। पर उसका यह व्यवहार देखकर मुझे उसपर संदेह होता था कि वह मेरे साथ कोई कौशल कर रही है। उसका संतोष, उसकी भक्ति, उसकी गभीरता मेरे लिये दुर्बोध थी। मैं समझता था, वह मुझसे कोई चाल चल रही है। अगर वह मुझसे छोटी-छोटी वस्तुओं के लिये झगड़ा करती, रोती, कोसती, ताने देती तो उसपर मुझे विश्वास होता। उसका ऊँचा आदर्श मेरे अविश्वास का कारण हुआ। मैं उसके सतीत्व पर संदेह करने लगा। अन्त को यह दशा हो गई कि एक दिन रात को एक सहेली के घरपर केवल जरा विलब हो जानेके कारण मैंने उसे घर से निकाल दिया।

कृष्णचन्द्र बात काटकर बोले, तुम्हारी बुद्धि उस समय कहाँ गई थी? तुमको जरा भी ध्यान न रहा कि तुम अपनी इस निर्दयता से कितने बड़े कुल को कलंकित कर रहे हो?

गजाधर——महाराज, अब मैं क्या बताऊँ कि मुझे क्या हो गया था? मैने फिर उसकी सुध न ली। पर उसका अन्तःकरण शुद्ध था? पापाचरण से उसे घृणा थी। अब वह विधवाश्रम मे रहती है और सब उससे प्रसन्न है। उसकी धर्मनिष्ठा देखकर लोग चकित हो जाते है।

गजाधर की बात सुनकर कृष्णचन्द्र का हृदय सुमन की ओर से कुछ नरम पड़ गया। लेकिन वह जितना ही इधर नरम था उतना ही दूसरी ओर कठोर हो गया। जैसे साधारण गति से बहती हुई जलधारा सामने रुककर दूसरी ओर और भी वेग से बहने लगती है। उन्होंने गजाधर को सरोष नेत्रों से [ २०५ ] देखा, जैसे कोई भूखा सिंह अपने शिकार को देखता है। उन्हें निश्चय हो रहा था कि यही मनुष्य मेरे कुल को कलंकित करने वाला है। इतना हीं, उसने सुमन के साथ भी अन्याय किया है। उसे नाना प्रकार के कष्ट दिये हैं। क्या मैं उसे केवल इसलिये छोड़ दूँ कि वह अब अपने दुष्कृत्यों पर लज्जित है? लेकिन उसने यह बात मुझसे कह क्यों दी? कदाचित वह समझता है कि मैं उसका कुछ नही बिगाड़ सकता। यही बात है, नहीं तो वह मेरे सामने अपना अपराध इतनी निर्भयता से क्यों स्वीकार कृष्णचन्द्र ने गजाधर के मनोभावों को न समझा। वह क्षणभर आग की तरफ ताकते रहे, फिर कठोर स्वर से बोले, गजाधर, तुमने मेरे कुल को डुबा दिया। तुमने मुझे कही मुँह दिखाने योग्य न रखा। तुमने मेरी लड़की की जान ले ली, उसका सत्यानाश कर दिया, तिसपर भी तुम मेरे सामने इस तरह बैठे हो मानो कोई महात्मा हो। तुम्हें चिल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए।

गजाघर जमीन की मिट्टी खुरच रहे थे। उन्होंने सिर उठाया।

कृष्णचन्द्र फिर बोले, तुम दरिद्र थे, इसमें तुम्हारा दोष नहीं। तुम अगर अपनी स्त्री का उचित रीति से पालनपोषण नहीं कर सके तो इसलिये तुम्हें दोषी नहीं ठहराता। तुम उसके मनोभावों को नहीं जान सके, उसके सद्वविचारों का मर्म नहीं समझ सके, इसके लिए भी मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराता। तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने उसे घर से निकाल दिया। तुमने उसे मार क्यों नहीं डाला? अगर तुमको उसके पातिव्रत पर सन्देह था‌। तो तुमने उसका सिर काट क्यों नहीं लिया? और यदि उतना साहस नहीं था, तो स्वयं क्यों न प्राण त्याग कर दिया? विष क्यों न खा लिया अगर तुमने उसके जीवन का अन्त कर दिया होता तो उसकी यह दुर्दशा न हुई होती, मेरे कुल में यह कलंक न लगता। तुम भी कहोगे कि मैं पुरुष हूँ। तुम्हारी इस कायरता पर, इस निर्लज्जता पर धिक्कार है! जो पुरुष इतना नीच है कि अपनी स्त्री को दूसरों से प्रेमालाप करते देखकर उसका रुधिर खौल नहीं उठता वह पशुओं से भी गया बीता है।

गजाधर को अब मालूम हुआ कि सुमन को घर से निकालने की बात [ २०६ ] कहकर वह मानो ब्रह्मफाँस से फँस गये। वह मनसे पछताने लगे कि उदारता की धुन में मैं इतना असावधान क्यों हो गया। तिरस्कार की मात्रा भी उनकी आशा से अधिक हो गई। वे न समझे थे कि वह यह रूप धारण करेगा और उससे मेरे हृदयपर इतनी चोट लगेगी। अनुतप्त हृदय वह तिरस्कार चाहता है जिसमे सहानुभूति और सहृदयता हो, वह नहीं जो अपमानसूचक और क्रूरतापूर्ण हो। पका हुआ फोड़ा नश्तर का घाव चाहता है, पत्थर का आघात नहीं। गजाधर अपने पश्चात्ताप पर पछताये। उनका मन अपना पूर्वपक्ष समर्थन करने के लिये अधीर होने लगा।

कृष्णचन्द्र ने गरजकर कहा, क्यों, तुमने उसे मार क्यों नहीं डाला?

गजाधर ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, मेरा हृदय इतना कठोर नहीं था।

कृष्ण——तो घर से क्यों निकाला?

गजाधर——केवल इसलिये कि उस समय मुझे उससे गला छुड़ाने का और कोई उपाय न था।

कृष्णचन्द्र ने मुँह चिढ़ाकर कहा, क्यों जहर खा सकते थे।

गजाधर इस चोट से बिलबिलाकर बोले, व्यर्थ में जान देता?

कृष्ण——व्यर्थ जान देना व्यर्थ जीने से अच्छा है?

गजाधर——आप मेरे जीने को व्यर्थ नहीं कह सकते। आपसे पंडित उमानाथ ने न कहा होगा, पर मैंने इसी याचना-वृत्ति से उन्ह शान्ता के विवाह के लिए १५००J दिये है और इस समय भी उन्हीं के पास यह १०००) लिये जा रहा था, जिससे वह कही उसका विवाह कर दे।

यह कहते कहते गजाधर चुप हो गये। उन्हे अनुभव हुआ कि इस बात का उल्लेख करके मैंने अपने ओछेपन का परिचय दिया। उन्होंने संकोच से सिर झुका लिया।

कृष्णचन्द्र ने संदिग्ध स्वर से कहा, उन्होंने इस विषय में मुझसे कुछ नहीं कहा।

गजाधर——यह कोई ऐसी बात भी नही थी कि वह आपसे कहते। [ २०७ ] मैंने भी तो पाप किये है, पर कभी इस शक्ति का अनुभव नहीं किया कुछ नहीं, यह सब इनके शब्दजाल है, इन्होंने अपनी कायरता को शब्दों के आडम्बर में छिपाया है, यह मिथ्या है, पाप से पाप ही उत्पन्न होगा, अगर पाप से पुण्य होता तो आज संसार में कोई पापी न रह जाता।

यह सोचते हुए वे उठ बैठे, गजाधर भी आग के पास पड़े हुए थे। कृष्णचन्द्र चुपके से उठे और गंगा तट की ओर चले। उन्होने निश्चय कर लिया था कि अब इन वेदनाओं का अन्त ही करके छोड़ेगा।

चन्द्रमा अस्त हो चुका था। कुहरा और भी सघन हो गया था। अन्धकार ने वृक्ष, पहाड़ और आकाश में कोई अन्तर न छोड़ा था। कृष्ण चन्द्र एक पगडंडी पर चल रहे थे, पर दृष्टि की अपेक्षा अनुमान से अधिक काम लेना पड़ता था। पत्थर के टुकडों और झाड़ियों से बचने में वह ऐसे लीन हो रहे थे कि अपनी अवस्था का ध्यान न था।

करार के किनारे पहुँचकर उन्हें कुछ प्रकाश दिखाई दिया। वह नीचे उतरे। गंगा कुहरे की मोटी चादर ओढ़े पड़ी कराह रही थी। आस-पास के अन्धकार और गंगा में केवल प्रवाह का अन्तर था। यह प्रवाहित अन्धकार था। ऐसी उदासी छाई हुई थी जो मृत्यु के बाद घरों में छा जाती है।

कृष्णचन्द्र नदी के किनारे खड़े थे। उन्होने विचार किया, हाय! अब मेरा अन्त कितना निकट है। एक पल में यह प्राण न जाने कहाँ चले जायेंगे। न जाने क्या गति होगी? संसार से आज नाता टूटता है। परमात्मन् अब तुम्हारी शरण आाता हूँ, मुझपर दया करो, ईश्वर मुझे सँभालो।

इसके बाद उन्होंने एक क्षण अपने हृदय में बल का संचार किया। उन्हें मालूम हुआ कि मैं निर्भय हूँ। वह पानी में घुसे। पानी बहुत ठंडा था। कृष्णचन्द्र का सारा शरीर दहल उठा। वह घुसते हुए चले गये। गलेतक पानी में पहुँचकर एक बार फिर विराट तिमिर को देखा, यह संसार-प्रेम की अंतिम घड़ी थी, यह मनोबल की, आत्माभिमान की अंतिम परीक्षा थी। अब तक उन्होंने जो कुछ किया था यह केवल इसी परीक्षा की तैयारी थी।