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स्वदेश/नया और पुराना

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स्वदेश  (1914) 
द्वारा रवीन्द्रनाथ टैगोर, अनुवाद महावीर प्रसाद गहमरी
[  ]
स्वदेश।

नया और पुराना।

म पुराने भारतवर्ष के लोग हैं; बहुत ही प्राचीन और बहुत ही थके हुए हैं। मैं बहुधा अपने में ही अपनी इस जातीय भारी प्राचीनता का अनुभव किया करता हूँ। मन लगाकर जब अपने भीतर नजर डालता हूँ तब देखता हूँ कि वहाँ केवल चिन्ता, विश्राम और वैराग्य है। मानों हमारी भीतरी और बाहरी शक्तियों ने एक लम्बी छुट्टी ले रक्खी है। मानों जगत् के प्रात:काल ही में हम लोग दफ्तर का कामकाज कर आये हैं, इसीसे इस दोपहर की कड़ी धूप में, जब कि और सब लोग कामकाज में लगे हुए हैं हम दर्वाजा बंद करके निश्चिन्त हो विश्राम या आराम कर रहे हैं; हमने अपनी पूरी तलब चुका ली है और पेंशन पा गये हैं। बस, अब उसी पेंशन पर गुजारा कर रहे हैं। मजे में हैं।

इतने ही में एकाएक देख पड़ा कि हालत बदल गई है। बहुत दिनों से ब्रह्मोत्तर में मिली हुई मजीन इस समय नये राजा की अमलदारीमें ठीक दलील-पट्टा न दिखा सकनेके कारण जब्त हो गई है। अचानक हम गरीब हो गये हैं। और सब किसान जैसे मेहनत मजदूरी कर करके मरते [  ]और मालगुजारी अदा करते हैं वैसे ही, वही, हमको भी करना होगा। पुरानी जाति को अब अचानक नई चेष्टा करने के लिए विवश होना पड़ है।

इसी लिए अपनी चिन्ता रहने दो, विश्राम से उठो, घरका कोना छोड़ो। अब केवल व्याकरण, न्यायशास्त्र, श्रुति, स्मृति, और गृहस्थीके नित्य और नैमित्तिक कामोंको ही लिये पड़े रहने से काम नहीं चलेगा; कड़े मिट्टीके ढेले फोड़ों, धरतीको उपजाऊ बनाओ और नये राजाको कर (टैक्स) दो; कालेजों में पढ़ो, होटलों में खाओ और आफिसों में नौकरी करो।

हाय! भारतवर्ष की चहारदीवारी को तोड़कर इस खुले हुए काम- काजके मैदानमें हम लोगोंको लाकर किसने खड़ा कर दिया। हम लोगोंने चारों ओर मानसिक 'बाँध' बाँधकर कालस्रोतको बन्द कर दिया था और अपनी इच्छाके अनुसार अपना सब कुछ समेटे हुए लिये बैठे थे। भारतवर्ष के बाहर चंचल परिवर्तन समुद्रकी तरह दिन रात गरजता था, पर हम लोग अटल स्थिरतामें स्थित रहकर गतिशील सारे संसार के अस्तित्वको भी भूले हुए बैठे थे। इसी समय न-जाने किस छिद्र से चिर-अशान्त मानवस्रोत हम लोगोंमें घुस आया और उसने हमारा सब कुछ नष्टभ्रष्ट कर दिया। उसने पुराने में नया मिला दिया, विश्वासमें संशय डाल दिया और सन्तोष में दुराशाका आक्षेप पटक दिया––इस प्रकार सब ही कुछ उलटपुलट डाला।

मान लो कि हमारे भारतके चारों ओर हिमालय और समुद्र की रुकावट और भी दुर्गम होती, तो यहाँ के लोग एक अज्ञात एकान्त घेरे में स्थिर शान्त भावसे एक प्रकारकी संकुचित परिपूर्णता प्राप्त करने का अवसर पाते। वे संसार की खबर कुछ विशेष न जान पाते और [  ]भूगोल के सम्बन्ध में उनकी धारणा अधूरी रहती; केवल उनके काव्य, उनके समाजतन्त्र, उनके धर्मशास्त्र, उनके दर्शनशास्त्र एक अपूर्व शोभा-सुषमा और सम्पूर्णता को प्राप्त करते; वे मानों पृथ्वी को छोड़कर और किसी छोटे ग्रहमें निवास करते; उनका इतिहास, उनके ज्ञानविज्ञान और उनकी सुख सम्पदा उन्हीं में परिपूर्ण रहती। जैसे समुद्र का एक अंश धीरे धीरे चारों ओर मिट्टी की तह जम जाने से घिरकर एक एकान्त शान्तिमय सुन्दर सरोवर बन जाता है; और वह तरंगरहित रह कर सुबहशाम के विचित्र रंगों की छटा से जगमगाया करता है––अँधेरी रात के झलकते हुए स्थिर नक्षत्रों के प्रकाशमें चुपचाप चिर रहस्य की चिन्तामें डूबा रहता है वही हाल यहाँका होता।

यह सच है कि कालके प्रबल प्रवाह में, परिवर्तन कोलाहल के केन्द्रमें, प्रकृति (Nature) की हजारों शक्तियों के रणकी रंगभूमि के बीच क्षोभ को प्राप्त होने––इधर उधर टक्करें खानेसे एक प्रकार की खूब कड़ी शिक्षा और सभ्यता प्राप्त होती है; किन्तु यही कैसे कहा जा सकता है कि निर्जनता, निस्तब्धता और गंभीरतामें उतरने से कोई रत्न हाथ नहीं लगता।

इस आन्दोलन-पूर्ण संसार-सागर में ऐसी निस्तब्धताका अवसर कोई जाति नहीं पा सकी। जहाँ तक मैं समझता हूँ, केवल भारत ने ही एक समय दैवसंयोग से वह विच्छिन्नता प्राप्त कर––सबसे अलग हो कर संसार-सागर में गोता लगाया था और वही उसकी तह तक पहुँचा था। जैसे जगत असीम है वैसे ही मनुष्य का आत्मा भी असीम है; अतएव जिन्होंने उस अप्रकट भीतरी भाग या देशका मार्ग खोज निकाला था उन्होंने कोई नया सत्य या कोई नया आनन्द नहीं प्राप्त किया; यह कहना अत्यन्त अविश्वास की बात है [  ]

भारतवर्ष उस समय एक ऐसी परीक्षा-शाला के समान था जिसका दर्वाजा बन्द हो और जो निर्जन तथा रहस्यमय हो। उसके भीतर एक परम सुन्दर सभ्यता की गुप्त रूप से परीक्षा हो रही थी। यूरोप के मध्ययुग में जैसे अल्कामी-तत्व की खोज करनेवाले लोगों ने गुप्त-गृह के भीतर बंद रहकर तरह तरह के यन्त्रों और तन्त्रों के द्वारा चिरजीवन रस (Elixir of Life) का आविष्कार करने की चेष्टा की थी वैसे हमारे देशके ज्ञानी पण्डितों ने गुप्त रूप से सावधानता के साथ आध्यात्मिक चिरजीवन पानेका उपाय ढूँढ़ा था। उन्होंने प्रश्न किया था कि––"ये-नाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम्" (जिसमें मैं अमर नहीं हो सकता उसे लेकर मैं क्या करूँ?) और अत्यन्त कष्टसाध्य उपाय से अपने ही हृदय में उस अमृतरस की खोज करना आरम्भ किया था।

उनकी उस खोज से क्या होता, इस बात को कौन जाने! 'अल्कामी' से 'केमिस्ट्री' की उत्पत्ति हुई है वैसे ही उनकी उस तपस्यासे मनुष्य की कौन सी एक निगूढ़ नूतन शक्तिका आविष्कार होता सो अब कौन कह सकता है!

किन्तु एकाएक उसी खोज के समय दर्वाजा तोड़कर बाहर के उद्यमी लोग भारतवर्ष की उस पवित्र परीक्षा-शाला में जबर्दस्ती घुस आये और उस खोज का नतीजा सर्वसाधारण के निकट अप्रकाशित ही रह गया। नहीं कहा जा सकता कि आजकल की नई अपार सभ्यता में उस परीक्षा के लिए वैसा प्रशान्त अवसर कभी फिर मिलेगा या नहीं।

पृथ्वीके और लोगोंने उस परीक्षाशाला में प्रवेश करके क्या देखा? देखा, एक बूढ़ा तपस्वी बैठा है; कपड़े नहीं हैं, आभूषण नहीं हैं, पृथ्वी के इतिहास की विशेष अभिज्ञता नहीं है। वह जो कुछ कहना [  ]चाहता है उसकी कोई प्रतीति करानेवाली भाषा नहीं है, प्रत्यक्ष करने-वाला कोई प्रमाण नहीं है और समझमें आने योग्य कोई परिणाम या नतीजा नहीं है।

यह देखकर वे कहने लगे कि हे वृद्ध, हे चिन्तातुर, हे उदासीन, तुम उठो, पोलिटिकल ऐजिटेशन अर्थात् राजनैतिक आन्दोलन करो; अथवा दिनकी नींद में पड़े पड़े अपने पुराने, जवानी के, प्रताप की घोषणा करते हुए शिथिल––पुरानी हड्डियों के बल पर बलफो––खम ठोको। देखो, उससे तुम्हारी लज्जा निवृत्त होती है कि नहीं।

किन्तु मुझे बाहरी लोगों के इस उपदेश पर श्रद्धा या प्रवृत्ति नहीं होती। केवल अखबारों की पाल चढ़ाकर दुस्तर संसारसागर में यात्रा आरम्भ करने का मुझे साहस नहीं होता। यह सच है कि जब धीमी और अनुकूल हवा चलती है तब यह खबर के कागजों की पाल गर्व से फूल उठती है, किन्तु जब कभी समुद्र में तूफान आवेगा तब यह दुर्बल दम्भ सैकड़ों जगह से फटकर बेकाम हो जायगा।

यदि पास ही कहीं उन्नति नामक बन्दरगाह होता और वहाँ पर किसी तरह पहुँचते ही 'दही-पेड़ा दीयतां और भुज्यतां' की बात होती तो चाहे अवसर सोचकर, आकाशका रंगढंग देखकर, अत्यन्त चतुरता और सावधानी के साथ एकबार पार होने की चेष्टा की भी जाती। किन्तु जब यह जानते हैं कि इस उन्नति के मार्ग में यात्राका अन्त नहीं है; कहीं पर नाव बाँध नींद लेने का स्थान नहीं है; ऊपर केवल ध्रुवतारा चमक रहा है और सामने केवल अन्तहीन समुद्र की जलराशि है; हवा प्रायः प्रतिकूल ही चला करती है और लहरें सदा भारी वेग से उठा करती हैं, तब बढे बैठे केवल फूल्सकेप कागज की नाव तैयार करने को जी नहीं चाहता। [  ]तथापि इस सागर में नाव चलाने की इच्छा होती है। जब देखता हूँ कि मनुष्य-प्रवाह चला जा रहा है; चारों ओर विचित्र कल्लोल, प्रचण्ड वेग, प्रबल गति और विश्राम-रहित कर्म की छटा दिखाई पड़ रही है तब मेरा भी मन नाच उठता है; तब जी चाहता है कि बहुत वर्षों के गृहबन्धन को तोड़ताड़ कर एकदम बाहर निकल पडूँ। किन्तु उसके बाद ही अपनेको खाली-हाथ देखकर सोचता हूँ कि राह खर्च कहाँ है! हृदय में वह असीम आशा, जीवन में वह न थकनेवाला बल, और विश्वास का वह अटल प्रभाव कहाँ है! तब तो पृथ्वी के एक कोने में यह हमारा अज्ञात-बास ही भला है, यह स्वल्प सन्तोष और निर्जीव शान्ति ही हमारे लिए गनीमत है।

तब बैठे बैठे मन को यही कहकर समझाता हूँ कि हम यद्यपि यन्त्र (कलें) नहीं तैयार कर सकते, जगत् के गूढ़ तत्त्वों का आ विष्कार नहीं कर सकते, किन्तु प्रेम कर सकते हैं, क्षमा कर स कते हैं, एक दूसरे के लिए, अपनी जगह छोड़कर, जगह दे स कते हैं। फिर दुःसाध्य निराशा से अस्थिर होकर भटकते फिरने की क्या जरूरत है! बुराई क्या है, हम एक किनारे ही पड़े रहेंगे। टा इम्स के जगत्प्रकाशक कालमों में हमारा नाम न छपेगा, न सही।

किन्तु प्रश्न यह होता है कि जब दुःख है, दारिद्य है, प्रबल का त्याचार है, असहाय के भाग्य में अपमान है, तब केवल एक कि नारे बैठे बैठे घर का काम और अतिथि सत्कार करते रहने से कैसे काम चलेगा? इन दुःखों का प्रतिकार कैसे होगा?

हाय, यही तो भारतवर्ष को असह्य दुःख है! हम किससे लड़ेंगे! रूढ़ मनुष्य प्रकृति की चिरकाल की निठुराई के साथ? ईसामसीह का पवित्र रक्त प्रवाह भी जिसकी निकम्मी कठिनता को आजतक कोमल [  ]न बना सका उस पत्थर के साथ? प्रबलता हमेशा से निर्बल के प्रति दयाहीन रही है; हम उसी आदिम पशु–प्रकृति को कैसे जीतेंगे? सभायें करके? या प्रार्थना करके? आज ज़रा सी भीख पाकर और कल एक गहरी डाँट खाकर? नहीं, यह तो कभी न होगा।

तब फिर कैसे जीतेंगे? प्रबल के बराबर सबल होकर? हाँ, यह हो सकता है। किन्तु जब विचार करके देखता हूँ कि यूरोप कितना प्रबल है और किन किन कारणों से प्रबल है; जब इस दुर्दम्य शक्ति को कभी शरीर और मन से, सम्पूर्ण रूप से, अनुभव करके देखता हूँ तब फिर आशा नहीं होती । जी में आता है कि आओ भाई, सहनशील होकर रहें––सबको प्यार करें––ने की करें। हम पृथ्वी पर जो कुछ काम करें उसे सचाई के साथ करें, ढोंग न करें। क्योंकि असमर्थ के लिए मुख्य विपत्ति यही है कि वह कोई भारी काम नहीं कर पाता, इसी कारण भारी ढोंग को अच्छा समझता है। वह नहीं जानता कि मनुष्यत्व प्राप्त करने के लिए भारी झूठ की अपेक्षा छोटा सत्य अधिक मूल्यवान् है––अधिक कामकी चीज है ।

मैं उपदेश देने नहीं बैठा हूँ। मैं केवल यही देखने की चेष्टा करता हूँ कि हमारी असली हालत क्या है। किन्तु उसे देखने के लिए न तो प्राचीन वेद, पुराण, संहिता आदि खोलकर उनमें से मनमाने-अपने मतलब के श्लोक एकत्र करके किसी एक कल्पना-मय काल की सृष्टि करनी होगी, और न अन्य जाति की प्रकृति और इतिहास के साथ अपनी कल्पना मिलाकर, अपने को उसी में लीन करके, इस नवीन शिक्षा की कमजोर नीव पर भारी दुराशा का किला खड़ा करने की जरूरत है। हमको केवल यही देखना होगा कि हम कहाँ पर हैं। हम जहाँ पर स्थित हैं वहाँ पर पूर्व दिशा से भूतकाल की और पश्चिम दिशा से [  ]भविष्यत् की मरीचिकायें आकर हमको अपनी अपनी ओर आकृष्ट कर रही हैं। इन दोनों को भरोसा करने योग्य 'सत्य' न जानकर एक बार हमें यह देखना चाहिए कि हम वास्तव में किस मिट्टी पर खड़े हुए हैं।

हम एक बहुत ही जीर्ण और प्राचीन नगर में निवास करते हैं। इतना पुराना नगर है कि उसका इतिहास लुप्तप्राय हो गया है; मनुष्यों के हस्तलिखित सब स्मृतिचिह्न काई से ढक गये हैं। इसी से भ्रम होता है कि मानों यह नगर मनुष्यों के इतिहास से परे है––यह मानों अनादि 'प्रकृति की पुरानी राजधानी है। मनुष्यों के इतिहास की रेखा मिटाकर प्रकृति ने अपने श्यामवर्ण के अक्षर इसके सब अंगों में विचित्र आकार से सजा रक्खे हैं। यहाँ हजारों वर्ष की वर्षा-ऋतुएँ अपने आँसुओं के चिह्न की रेखा रख गई हैं और हजारों वर्ष की वसन्त-ऋतुएँ इसकी दीवार की हरएक दरार में अपने आने जाने की मिती हरे रंग के अङ्कों में अङ्कित कर गई हैं। एक ओर से इसे नगर कह सकते हैं तो दूसरी ओर से इसे जंगल भी कह सकते हैं। यहाँ केवल छाया और विश्राम, चिन्ता और विषाद रह सकते हैं। यहाँ झींगुरों की झनकार से गूंजते हुए जंगलों में––यहाँ विचित्र आकारवाली जटाओं से व्याप्त शाखा-प्रशाखाओं और रहस्यमय पुराने महलों की दीवारों में सैकड़ों हजारों छायाओं में काया का और कायाओं में माया का भ्रम होता है। यहाँ की इस सनातन महती छाया में सत्य और कल्पना ने भाई और बहन की तरह विरोध-रहित भाव से आश्रय पाया है। अर्थात् यहाँ प्रकृति के विश्वकार्य और मनुष्य की मानसिक सृष्टि, दोनों ने परस्पर हिलमिलकर अनेक आकार के छायाकुंजों की रचना की है। यहाँ लड़की–लड़के दिनभर खेला करते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि यह खेल है। ऐसे ही सयाने लोग रातदिन स्वप्न देखते हैं; पर [  ]उसे स्वप्न न समझकर 'कर्म' समझते हैं। जगत् के मध्याह्न-सूर्य का प्रकाश छिद्र-मार्ग से प्रवेश करके केवल छोटी छोटी मणियों की तरह झलकता दिखाई देता है और प्रबल आँधी सैकड़ों तंग डालियों के बीच में टकराकर मन्द मर्मर-ध्वनि सी जान पड़ती है। यहाँ जीवन और मृत्यु, सुख और दुःख, आशा और निराशा की सीमा के चिह्न मिट से गये हैं; अदृष्टवाद और कर्मकाण्ड––वैराग्य और गृहस्थाश्रम एक ही साथ चल रहे हैं। यहाँ आवश्यक और अनावश्यक ने ब्रह्म और मिट्टी के पुतले ने, छिनमूल सूखे हुए भूतकाल और जिसमें नई कोंपलें निकल रही हैं ऐसे सजीव वर्तमान-काल ने समान आदर पाया है। शास्त्र जहाँ पड़ा है वहीं पड़ा हुआ है। जिस जगह शास्त्र को ढककर हजारों प्रथा-रूप कीड़ों ने अपना घर बना लिया है वहाँ पर भी कोई आलस्य-मयी भक्ति के मारे हाथ नहीं डालता––सफाई नहीं करता। यहाँ ग्रन्थों के अक्षर और उन ग्रन्थों में लगे हुए कीड़ों के छेद, दोनों ही समान सम्मान के शास्त्र हैं। यहाँ के पीपल के पेड़ों से दरार खाये हुए और टूटे फूटे पड़े हुए मन्दिरों में देवता और उपदेवता, दोनों ही एकत्र आश्रय को प्राप्त होकर विराजमान हैं।

यह क्या तुम्हारे सांसारिक समर की छावनी डालने की जगह है! यहाँ की गिरी हुई दीवार क्या तुम्हारे कल––कारखानों के––तुम्हारे आग की साँस लेनेवाले सहस्रबाहु लौह-दानवों के कारागार बनाने के योग्य है। यह सच है कि अस्थिर उद्योग के वेग से तुम इसकी पुरानी ईंटों को मिट्टी में मिला दे सकते हो; किन्तु यह तो बताओ कि फिर पृथ्वी की यह अत्यन्त प्राचीन शय्याशायिनी (बिछौनों पर पड़ी रहनेवाली) जाति कहाँ जाकर खड़ी होगी? याद रक्खो, ज्यों ही यह चेष्टाहीन नगररूपी घना जंगल नष्ट होगा त्यों ही एक बूढ़ा ब्रह्मराक्षस, जो यहाँ [ १० ]सदा के सूनसान स्थान में हजारों वर्षों से एकान्तवास कर रहा है, एका-एक आश्रयहीन हो जायगा!

यहाँ के लोगों ने बहुत दिनों से अपने हाथों गृह-निर्माण नहीं किया; वह अभ्यास इनको नहीं है और इनमें के बहुतेरे अधिक विचारशील लोगों को यही एक बड़ा गर्व है। वे लोग जो इस बातको लेकर पुच्छलेखनी फटकारते हैं सो बिलकुल ठीक है––उसका प्रतिवाद किसी से नहीं हो सकता। सचमुच ही इन लोगों को अपने अत्यन्त प्राचीन आदि-पुरुषों की बस्ती कभी छोड़नी नहीं पड़ी। समय के फेर से यद्यपि अनेक ऊँची नीची अवस्थाओं का सामना करना पड़ा है, अनेक नये सुभीते और अड़चनें आकर उपस्थित हुई हैं; किन्तु इन्होंने सबको खींच-खाँचकर, मृत और जीवित को, सुभीतों और अड़चनों को, जी जा नसे एकत्र कर अपने बाप-दादाओं की बनाई हुई उसी एक ही दीवार में चुन रक्खा है। इस प्रकार की बात कभी, इनके शत्रुपक्ष के लोगों के मुँहसे भी नहीं सुनी जाती कि उन्होंने कभी अड़चन में पड़कर भी, अपने सुभीत के लिए, औरों से लागडाँट करके अपने हाथसे कोई नया घर बनाया या पुराने घरकी मरम्मत, अर्थात् संस्कार किया है। घर की छत में जहाँ छिद्र दिखाई पड़ा है वहाँ आपसे आप उगे हुए बरगद के पेड़की शाखाने कभी छाया कर दी है और कभी धीरे धीरे जमी हुई मिट्टी की तहने उस छिद्र को थोड़ा बहुत बंद कर दिया है, लेकिन इन्होंने कभी उधर ध्यान नहीं दिया।

इस वनलक्ष्मी से शून्य घने वन में, इस पुर-लक्ष्मी से सूनी टूटी-फूटी पुरी में हम धोती पहन कर चादर ओढ़कर बहुत ही धीरे धीरे टहलते हैं, भोजन के बाद जरा सो लेते हैं, छाँह में बैठकर गंजीफा––चौसर खेलते हैं। जो कुछ असंभव और संसारी काम काज के बाहर [ ११ ]हैं उस पर झटपट विश्वास कर लेना हमें पसंद है। जो कुछ काम के लायक और आँख के सामने है उसके प्रति हमारे मन का अविश्वास किसी प्रकार अच्छी तरह से दूर नहीं होता। और इसके ऊपर अगर कोई लड़का जरा भी चञ्चलता प्रकट करता है तो हम सब मिलकर सिर हिला हिला कर कहते हैं––सर्वमत्यन्तर्हितम्।

इसी समय तुम लोग एकाएक न-जाने कहाँ से आकर कूद पड़े और हमारे जीर्ण अस्थिपञ्जर में जोर से दो तीन खोंचे मारकर कहते हो कि "उठो, उठो; तुम्हारे सोने के कमरे में हम आफिस (office) खोलना चाहते हैं। तुम सोते थे; किन्तु सारा संसार नहीं सोता था। इस बीच में, जगत् में अनेक परिवर्तन हो गये हैं। सुनो, वह घंटी बज रही है; यह पृथ्वी की दुपहरिया है––काम करने का समय है।"

तुम्हारे कथनको सुनकर हममें से कुछ लोग जल्दी से उठकर "कहाँ काम है?––कहाँ काम है?" कहते हुए घर के चारों कोनों में व्यस्त भाव से दौड़धूप कर रहे हैं। और उनमें से जो जरा मोटेताजे और घमंडी हैं वे करवट बदल कर कहते हैं––"कौन है जी! काम की बात कौन कहता है! तो क्या तुम यह कहना चाहते हो कि हमलोग कामकाजी आदमी नहीं है! तुम्हारा यह भारी भ्रम है! भारतवर्ष को छोड़कर काम करने का स्थान और कहीं नहीं है। देखते क्यों नहीं, मानव-इतिहास के प्रथम युग में आर्यों और अनार्यों का युद्ध यही हो गया है; यही कितने ही राज्यों की स्थापना, कितने ही नीतिधर्मों का अभ्युदय और कितनी ही सभ्यताओं का संग्राम हो गया है। भाई, केवल हम लोग ही काम के आदमी हैं। अतएव हमसे अब काम करने के लिए मत कहो। अगर तुमको विश्वास न हो तो तुम लोग बल्कि एक काम करो––अपने पैने ऐतिहासिक फावड़े से भारतभूमि की अनेक युगसाञ्चित विस्मृति की तह [ १२ ]खोदकर देख लो कि मनुष्य-सभ्यता की दीवार में कहाँ कहाँ हम लोगों के हाथों का चिह्न है। हम लोग तबतक इसीतरह एक झपकी और ले लें।"

इसी तरह हम लोगों में से कोई कोई आधे अचेत जड़मूढ, दाम्भिक भाव से, जराजरा खुली नींद-भरी आँखों से, आलस्य-पूर्ण अस्पष्ट रुष्ट हुंकार से, जगत् में जो दिनका प्रकाश फैला हुआ है उसका अनादर या उपेक्षा कर रहे हैं; और कोई कोई, गहरी आत्मग्लानि के साथ अपनी ढीली रगों के चेष्टाहीन उद्यम––उत्साह को बारम्बार पीटकर जगाने की चेष्टा कर रहे हैं। और जो लोग जाग्रत् अवस्था में स्वप्न देखने वाले हैं––जो लोग कर्म और विचार के बीच में अस्थिर चित्त से डगमगा रहे हैं––जो लोग पुराने की जीर्णता देख पाते हैं और नवीन की असम्पूर्णताका भी अनुभव करते हैं, वे अभागे बारंबार सिर हिला-हिला कर कहते हैं:––

"हे नये आदमियो! तुमने जो नई काररवाई शुरू कर दी है उसकी समाप्ति तो अभीतक नहीं हुई; उसमें क्या सच है और क्या झूठ-इसका फैसला तो अभीतक नहीं हुआ; मनुष्य के भाग्य की चिर-काल से चली आती हुई समस्याओं में से तो किसी एककी भी मीमांसा नहीं हुई। फिर हम अभी तुम्हारे अनुयायी कैसे बनें?

"तुमने बहुत कुछ जाना और बहुत कुछ पाया है, किन्तु यह तो बताओ कि कुछ सुख भी पाया है? हम जिस विश्व-ब्रह्माण्ड को 'माया' माने बैठे हैं उसीको तुम निश्चित सत्य मान कर काम में जान दे रहे हो; तुम क्या हमसे अधिक सुखी हुए हो? तुम जो नित्य नई नई आवश्यकताओं का आविष्कार करके गरीबों की गरीबी दिन-दिन बढ़ा रहे हो, अपने को घर के स्वास्थ्यजनक आश्रय से विश्राम-शून्य कर्म की उत्तेजना में घसीटे लिये जा रहे हो, कर्म को ही सारे जीवन का कर्तां [ १३ ]बनाकर उन्माद (बावलेपन या जोश) को विश्राम के स्थान पर बिठा रहे हो, तो क्या तुम स्पष्टरूप से यह जानते हो कि तुम्हारी यह उन्नति तुमको कहाँ लिये जा रही है?

"हम लोग अच्छी तरह जानते हैं कि हम कहाँ आ पहुँचे हैं। हम लोगों की जरूरतें बहुत ही थोड़ी हैं। हम अपने घरों में गाढ़े स्नेह से परस्पर, एक दूसरे के साथ, मिले हुए अपने नित्य-नैमित्तिक छोटे-मोटे आवश्यक कर्तव्यों का पालन करते जाते हैं। हम लोंगों की जितनी सुख-समृद्धि है उसको हम लोगों ने––अमीर और ग़रीब, निकट-सम्बन्धी और दूर-सम्बन्धी, अतिथि, अनुचर और भिक्षुक, सबने मिलकर बाँट लिया है। जहाँतक हो सकता है, हम लोग यथासम्भव सुख से जीवन बिता रहे हैं। हम लोगों में कोई किसी को त्याग करना नहीं चाहता, और जीवन की आँधी में पड़कर, उसके झपेटे में, कोई किसी को छोड़ने के लिए लाचार भी नहीं होता।

"भारतवर्ष ने सुख कभी नहीं चाहा; उसने सन्तोष चाहा था, वह उसे मिल भी गया है। भारतवर्ष, सब जगह सब तरह सन्तोष-की स्थापना भी कर चुका है। अब उसे कुछ करने के लिए बाकी नहीं है। वह अपने विश्राम-भवन में बैठे बैठे तुम लोगों के उन्माद-पूर्ण जीवन-विप्लव को देखकर तुम्हारी सभ्यता की अन्तिम सफलता के सम्बन्ध में मन-ही-मन संशय का अनुभव भले ही कर सकता है। वह सोच सकता है किसी समय अन्त को जब एक दिन तुम लोगों को अपना कामकाज बंद करना होगा तब तुम लोग क्या इसी तरह धीरे से, इसी तरह सहज में ऐसे ही विश्राम को प्राप्त कर सकोगे? क्या हमारी तरह ऐसी सहृदय परिणति या पूर्णता पासकोगे? जिस तरह 'उद्देश्य' धीरे धीरे 'लक्ष्य' पर पहुँचकर समाप्त हो जाता है, गरम दिन जिस तरह [ १४ ]सौन्दर्यपूर्ण होकर संध्या के अन्धकार में डूब जाता है वैसी ही मधुर समाप्ती क्या तुम पा सकोगे? या, जैसे 'कल' एकाएक बिगड़ कर बंद हो जाती है, जैसे लगातार बढ़ती हुई आग और गरमी जमा होने से एकाएक एंजिन फट जाता है, जैसे एक ही लाईन पर आमने-सामने से आती हुई दो रेलगाड़ियाँ आपसकी टक्कर से अचानक चूर चूर हो जाती हैं उसी तरह प्रबल वेग में एक दारुण अपघातसे तुम्हारी समाप्ति होगी?

"जो कुछ हो, तुम लोग इस समय एक अपरिचित समुद्र में उसके अप्रकट किनारे की खोज में चले हो। इस लिए यही अच्छा होगा कि तुम अपनी राह जाओ और हम अपने घर में रहें।"

किन्तु भाई भारत-वासियो, मनुष्य मनुष्य को इस तरह रहने कब देता है? तुम जिस समय विश्राम करना चाहते हो उस समय पृथ्वी के और लोग तो थके हुए नहीं हैं। गृहस्थ जिस समय नींद के मारे बेचैन हैं उस समय आवारा लोग तरह तरह के उपद्रव करते हुए राह राह मारे मारे फिरते हैं।

इसके सिवा यह भी स्मरण रखना चाहिए कि तुम पृथ्वी में जहाँ आकर ठहरोगे वहीं से तुम्हारा ध्वंस होना आरम्भ हो जायगा। क्यों कि तुम्ही अकेले ठहरोगे, और कोई नहीं ठहरेगा। यदि तुम जगत्प्रचाव के साथ समान गति से नहीं चल सकते तो सारे प्रवाह का दौड़ता हुआ वेग तुम पर आकर पड़ेगा; उसके धक्के से तुम या तो टूटभट-कर उलट-पलट जाओगे, और या धीरे धीरे क्षय को प्राप्त होकर कालस्रोत की तलहटी में डूब जाओगे! इस कारण या तो लगातार चलो और जीवन की चर्चा करो, और नहीं तो विश्राम करो और मिट जाओ। पृथ्वी परका ऐसा ही नियम है। [ १५ ]अतएव यह ठीक है कि हम जो संसार में संहार के सामने आकर उपस्थित हुए हैं, इसके बारे में किसी के कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु जब हम इसके सम्बन्ध में विलाप करते हैं तब यों करते हैं कि––"ऊपर जिस प्राकृतिक नियम का वर्णन किया गया है वह साधारणतः संसार में चलता है सही, किन्तु हम लोगों ने उसी में कुछ ऐसा सुभीता कर लिया था कि बहुत दिनोंतक वह नियम हम पर लागू नहीं हुआ। जैसे, साधारणतः यह कहा जाता है कि वृद्ध होना और मरना जगत् का नियम है; किन्तु हमारे योगी लोगों ने अपनी जीवनी शक्ति (श्वासा) को रोककर मुर्दे की तरह होकर जीवित रहने का एक उपाय ढूँढ़ निकाला था। समाधि की अवस्था में जैसे उनकी वृद्धि नहीं होती थी वैसे ही क्षय भी नहीं होता था। जीवन की गति को रोकने से ही मृत्यु आती है, किन्तु जीवन की गति को रोककर ही वे लोग चिरजीवन पाते थे

"हमारी जाति के सम्बन्ध में भी साधारणतः यही बात कही जा सकती है। अन्य जातियों जिस कारण से मरती हैं, हमारी जातिने उसी कारण को उपाय बनाकर बहुत दिनोंतक जीते रहने का मार्ग ढूँढ़ निकाला था। आकांक्षा का वेग जब कम हो जाता है, थका हुआ उद्यम जब ढीला पड़ जाता है तब कोई जाति नाशको प्राप्त होती है। किन्तु हम लोगों ने बड़े यत्न से दुराकांक्षा या तृष्णा को कम करके और उद्यमको जड़सा बनाकर समान भावसे आयु-रक्षा करने की चेष्टा की थी।

"जान पड़ता है, वह चेष्टा कुछ कुछ सफल भी हुई थी। घड़ी- की सुई जहाँ पर आपसे आप ठहर जाती है, वहीं पर समय को भी अपूर्व कौशल-पूर्वक ठहरा दिया गया था। जीवन को पृथ्वीतल से बहुत कुछ [ १६ ]अलग करके एक ऐसे मध्य आकाश में उठा रक्खा गया था जहाँ पृथ्वी की धूल अधिक नहीं पहुँचती थी; वह (जीवन) सदैव निर्लिप्त, निर्मल और निरापद रहता था।

"किन्तु एक दन्तकथा प्रचलित है कि कुछ दिन हुए कलकत्ते में पास के किसी जंगल से एक दीर्घजीवी समाधिस्थ योगी लाया गया था। वहाँ अनेक उपद्रव करके वह समाधि से जगा दिया गया और उससे उसकी मृत्यु हो गई। हमारी जातीय योग-निद्राको भी उसी तरह बाहर के लोगों ने बहुत उपद्रव करके तोड़ दिया है। अब दूसरी जातियों में और हममें कुछ अन्तर नहीं है, यदि कुछ है तो यही कि बहुत दिनों तक बाहरी विषयों में उद्योग न करने के कारण हमको जीवन की चेष्टा का अभ्यास नहीं रहा है। हम योगाध्याय से निकलकर एकदम गड़बड़ाध्याय में आ पड़े हैं।"

ऐसी अवस्थामें अब कर्तव्य क्या है? इस समय पहले के उस वि- लक्षण नियमसे काम नहीं चलनेका। अब तो जो साधारण नियम है उन्हींके अनुसार प्रचलित प्रथाओं से आत्मरक्षा की चेष्टा करनी होगी। लंबी जटा और नख कटवाकर, नियमित स्नान आहार करके कुछ कपड़े-लत्ते पहनकर हाथ-पैर चलाना होगा।

किन्तु इस समय मामला ऐसा ही आपड़ा है कि यद्यपि हमने जटा और नख कटवा डाले हैं और संसार में प्रवेश करके समाजके लोगों के साथ मिलनाजुलना भी शुरू कर दिया है, किन्तु मन के भावको अर्थात् स्वभाव को हम अभीतक नहीं बदल सके। अब भी हम कहते हैं कि हमारे पूर्व-पुरुषों ने केवल हड़ें खाकर या नंगे बदन रहकर महत्त्व प्राप्त किया था। फिर हम सँवार-सिंगार, आहार-विहार और रहनसहन का इतना आदर क्यों करें? यों कहकर हम लोग आधी धोती [ १७ ]ओढ़कर दर्वाजे के सामने बैठे बैठे कर्म के प्रति आलस्य और अनासक्ति से भरी दृष्टि डालते हुए हवा खाया करते है।

हमको यह स्मरण नहीं है कि जो योगासन परम आदरणीय है वहीं समाज की दृष्टि से जंगलीपन है। प्राण न रहने से जैसे शरीर अपवित्र हो जाता है वैसे ही भाव के बिना बाहरी अनुष्ठान भी निन्द्य हो जाया करते हैं। तात्पर्य यह कि जब हममें योगियों के भाव नहीं है तब केवल दिखावा नहीं सोहता।

जो लोग हमारे तुम्हारे समान हैं; जो तपस्या भी नहीं करते और भविष्य भी नहीं खाते; जूता मोजा पहनकर, ट्रामगाड़ी पर चढ़कर पान चबाते चबाते प्रतिदिन आफिस या स्कूल को जाते हैं; जिनकी आदि से अन्त तक खूब खोज खोजकर देखने से भी किसी प्रकार विश्वास नहीं होता कि ये याज्ञवल्क्य, वसिष्ठ, गौतम, जरत्कारु, वैशम्पायन या भगवान् कृष्ण-द्वैपायन के अवतार हैं; जिन छात्रों को देखकर अबतक कभी किसी को बालखिल्य ऋषियों का भ्रम नहीं हुआ; जो लोग एकदिन भी यदि सबेरे, दोपहर और शामको नहाकर एक हड़ खालें तो उसके बाद उन्हें दो एक दिन आफिस या कालेज में गैरहजिर होना परम आवश्यक हो पड़े, उनके लिए इस प्रकार ब्रह्मचर्य का बाहरी आडम्बर करना और पृथ्वी की अधिकांश उद्योगी माननीय जातियों को देखकर नाक सिकोड़ना केवल अद्भुत, असङ्गत, और हँसी की बात ही नहीं है, किन्तु पूर्ण रूप से हानिकर भी है।

भिन्न भिन्न कामों की अलग अलग व्यवस्थायें हुआ करती हैं। पहलवान लँगोट पहनता है, बदन में मिट्टी लगाता है और छाता उभार कर चलता है। यह देखकर रास्ते के लोग खुश होते हैं और वाहवाह करते हैं। परन्तु उस पहलवान का लड़का बहुत ही काहिल और कमजोर है और [ १८ ]केवल एन्ट्रेन्स तक पढ़कर आज पाँच वर्ष से सेक्रेटरियट के दफ्तर में अप्रैटिसी (उम्मेदवारी) कर रहा है। वह भी यदि लँगोट पहनकर मिट्टी मलकर उठते-बैठते ताल ठोके और भले आदमियों के द्वारा उसका कारण पूछे जाने पर कहे कि मेरा बाप पहलवानी की है, इसी से मैं भी ऐसा करता हूँ; तो यह देख-सुनकर ग़ैरोंको जो चाहे दिल्लगी सूझे, मगर उसके स्वजनों और हित-मित्रों को उसके लिए विशेष चिन्ता हुए बिना न रहेगी। इसलिए या तो सचमुच तपस्या करो और नहीं तो तपस्या का आडम्बर छोड़ो।

पूर्वसमय में ब्राह्मणों का एक खास सम्प्रदाय था। उन पर एक विशेष कार्य का भार था। उन्होंने इसलिए कि वे उस कार्य में विशेष उपयोगी बने रहें, अपने चारों ओर कुछ आचरण––अनुष्ठानों की एक सीमा-रेखा खींच रक्खी थी। वे लोग अत्यन्त सावधानता के साथ अपने चित्तको उस सीमाके भीतर ही रखते थे, बाहर नहीं जाने देते थे। प्रायः सभी कामों की ऐसी ही एक उपयोगी सीमा हुआ करती है, जो दूसरे काम के लिए बाधा-स्वरूप होती है। हलवाई की दूकान में यदि वकील अपना व्यवसाय चलाना चाहे तो हजारों तरह की रुकावटें और विघ्न उपस्थित हुए बिना न रहेगे। ऐसे ही जहाँ पहले किसी वकील का आफिस रहा हो वहाँ यदि किसी विशेष कारण-वश हलवाई-की दूकान खोलना पड़े तो उस समय क्या कुरसी-टेबल, कागज-पत्र और अलमारियों में तहकी तह सजी हुई कानूनी रिपोटो का मोह करने से काम चल सकता है कभी नहीं।

इस समय ब्राह्मणों में वह पहले की विशेषता नहीं रही। वे केवल पढ़ने-पढ़ाने और धर्म-चर्चा करने में ही नहीं लगे हुए हैं। उनमें से अधिकांश ब्राह्मण नौकरी करते हैं। तपस्या करते तो हम किसीको भी नहीं [ १९ ]देखते। ब्राह्मण और ब्राह्मणेतर अन्य जातियों के काम-धन्धे में कुछ अन्तर नहीं देख पड़ता। ऐसी अवस्था में ब्राह्मणत्त्व के संकीर्ण धेरे में बंद रहने की कोई सार्थकता या सुभीता नहीं दिखाई देता।

किन्तु इस समय यह हालत है कि ब्राह्मण-धर्म ने केवल ब्राह्मणों को ही नहीं बाँध रक्खा है। जिन शूद्रों के लिए शास्त्र का बन्धन कभी दृढ़ नहीं था, वे भी मौका पाकर उसी घेरे में घुस बैठे हैं। अब वे किसी तरह उस जगह को छोड़ना नहीं चाहते।

पहले समय में ब्राह्मणों ने केवल ज्ञान और धर्म का अधिकार ग्रहण कर रक्खा था। ऐसी दशा में समाज के अनेक छोटे-मोटो कामों का भार शूद्रों पर आ-पड़ना स्वाभाविक ही था[१]। इसी कारण उन शूद्रों के ऊपर से आचार-विचार और यन्त्र-तन्त्र के हजारों बन्धन-पाश हटाकर उन्हें बहुत कुछ स्वच्छन्द गति का अवसर दे दिया गया था। पर इस समय एक भारत-व्यापी भारी मकड़ी के जाले में ब्राह्मण से लेकर शूद्र तक, सबके हाथ-पैर बँध गये हैं और वे मुर्दो की तरह निश्चल होकर पड़े हुए हैं। न तो पृथ्वी का काम करते हैं और न परमार्थ-रूप योग ही साधते हैं। पहले जो काम था वह भी बंद हो गया और इस समय जो काम आवश्यक हो पड़ा है उसके होने में भी पगपग पर रुकावटें डाली जाती हैं।

अतएव हमको समझना चाहिए कि इस समय हम जिस, गतिशील संसार में अचानक आ गये हैं उसमें रहकर यदि हमें अपनी प्राणरक्षा और मानरक्षा करनी है तो हर घड़ी साधारण आचार विचारों को लेकर तर्क वितर्क करने से या कपड़ा समेटकर, नाक की नोक सिकोड़कर, बेत[ २० ]रह सँभल सँभलकर पैर रखने से काम नहीं चलेगा। ऐसा सोचना भूल है कि यह विशाल विश्व ब्रम्हाण्ड कीचड़ का कुण्ड है; सावन भादों की कच्ची सड़क है; पवित्र पुरुषों के चरणकमल रखने के अयोग्य है। इस समय अगर प्रतिष्ठा चाहते हो तो उसके लिए चित्तकी उदारता, सर्वाङ्गीण नीरोगता, स्वास्थ भाव, शरीर और बुद्धि की प्रबलता, ज्ञान का प्रचार और प्रसार तथा विश्रामहीन तत्परता की बड़ी आवश्यकता है। इधर ध्यान दो।

हम लोग पृथ्वी के अन्य लोगों के छू जाने से भी यत्नपूर्वक बच कर अपने महामान्य 'आपे' को सदा धो माँजकर, छिप छुपकर और दूसरों को नीच म्लेच्छ आदि नाम देकर उनसे घृणा करते हुए जिस ढंग से चल रहे थे उसको आध्यात्मिक बाबुआना या शौकीनी कहते हैं। मनुष्यत्व इस प्रकार की अति विलासिता में धीरे धीरे निकम्मा और चौपट हो जाता है।

जड़ पदार्थ ही शीशे के घेरे में बंद रक्खा जाता है। किन्तु यदि जड़ और जीव के भेद को भूलकर जीव को भी खूब साफ रखने के लिए निर्मल बिल्लौरी संपुट के भीतर बंद रक्खा जाय, तो यह सच है कि उसमें धूलका आना रुक जायगा, मगर उसके साथ ही स्वास्थ्य भी रुकेगा; अर्थात् ऐसा करना मलिनता और जीवन दोनों को ही यथा-संभव घटा देना है।

हमारे पण्डित लोग कहा करते हैं कि हम लोगों ने जो एक अद्भुत आर्यपवित्रता प्राप्त की है वह बहुत साधना करने से मिली है––वह बड़ी ही कीमती चीज है। उसकी बड़ी सावधानी से रक्षा करने की आवश्यकता है। इसी लिए हम लोग सब प्रकार से म्लेच्छों और यवनों से बचने की––उनसे छूतक न जायँ, इसकी––चेष्टा किया करते हैं। [ २१ ]इस सम्बन्ध में दो बातें कहने की हैं। एक तो यह कि यद्यपि हम सभी लोग विशेष रूप से पवित्रता की चर्चा करनेवाले या पवित्र रहने-वाले नहीं हैं, तथापि अधिकांश मनुष्यजाति को अपवित्र समझकर एक सर्वथा अन्याय विचार, अभूलक अहंकार, और आपस में अनर्थक अन्तर या विरोध उत्पन्न करने का उद्योग किया जाता है। इस बात को बहुत लोग स्वीकार ही नहीं करते कि यह पवित्रता की दुहाई देकर हम जो विजातीय मनुष्यों से घृणा करते हैं सो वह घृणा हमारे चरित्र के भीतर धुनका काम कर रही है। वे बेधड़क कह उठते हैं कि हम लोग धृणा कहाँ करते हैं? हमारे शास्त्रों में ही लिखा है––"वसुधैव कुटुम्बकम्।" किन्तु यहाँ पर यह विचारणीय नहीं है कि शास्त्रों में क्या लिखा है और बुद्धिमान् लोग व्याख्या करके उसका क्या अर्थ ठहराते हैं। विचार केवल यह करना है कि हमारे आचरण या बर्ताव से क्या प्रकट होता है; और उस आचरण का आदिकारण चाहे जो हो किन्तु उससे सर्वसाधारण के हृदय में सहज ही मनुष्य-धृणा उत्पन्न होती है कि नहीं; तथा एक जाति के छोटे से लेकर बड़े तक सब आदमियों को किसी दूसरी जाति मात्र पर बिना विचारे घृणा करने का अधिकार है या नहीं।

दूसरी बात यह है कि जड़ पदार्थ ही बाहरी मलिनता से दूषित होते हैं। हम जब घराऊ पोशाक पहनकर घूमने निकलते हैं तब बहुत संभलकर चलना होता है। तब बहुत सावधानी से सँभलकर बैठना होता है जिसमें कहीं धूल न लग जाय, पानी की छीटें न पड़ जायें, कहीं किसी तरह का दाग न लग जाय। पवित्रता अगर ऐसी ही पोशाक हो तो अवश्य ही यों डरना ठीक है कि इन लोगों की छूत से कहीं वह काली न हो जाय, उन लोगों की हवा लगने से कहीं उसमें धब्बा न [ २२ ]पड़ जाय। इस तरह की पोशा की पवित्रता लेकर संसार में रहना सच-मुच ही एक भारी विपत्ति है। जनसमाज की युद्धभूमि, कर्मभूमि और रङ्गभूमि में ऐसी सँवारी हुई पवित्रता को सँभालकर चलना अत्यन्त कठिन समझकर, जिनकी शुचि-वायु का रोग है वे अभागे जीव अपने चलने-फिरने और रहने की जगह अत्यत संकीर्ण (तंग) बना लेते हैं और अपने को कपड़े-लत्तों की तरह सदा सन्दूक में बन्द रखते हैं उनके द्वारा मनुष्य का परिपूर्ण विकास या उन्नति कभी नहीं हो सकती।

आत्मा की आन्तरिक पवित्रता के प्रभाव से बाहरी मलिनता के प्रति थोड़ी-बहुत उपेक्षा किये बिना काम ही नहीं चल सकता। जो मनुष्य सौन्दर्य का बड़ा भारी भक्त है वह अपना रंग बिगड़ने के डरसे पृथ्वी की धूल-मिट्टी और हवा-धूप-पानी से सदा बच कर चलने की चेष्टा करता है और मोम के पुतले की तरह निरापद स्थान में बैठा रहता है। वह भूल जाता है कि रंग की सुकुमारता या सोफियानापन सौन्दर्य की एक बाहरी सामग्री है, उसकी भीतरी प्रतिष्ठा-भूमि स्वास्थ्य ही है––अर्थात् स्वास्थ्य ही सौन्दर्य की नींव है। जड़ पदार्थ के लिए स्वास्थ्य की जरूरत नहीं है, इसीसे यदि जड़को ढक रक्खें-बंद कर रक्खें तो कोई हानि नहीं। अतएव यदि हम आत्मा को जड़ या मृत पदार्थ नहीं समझते तो थोड़ी बहुत मलिनता का खटका होने पर भी उसके स्वास्थ्य के खयाल से, उसे सबल बनाने के उद्देश्य से उसका साधारण जगत् से सम्बन्ध स्थापित करना बहुत जरूरी है।

अब यहाँ मालूम हो जायगा कि ऊपर आध्यात्मिक बाबुआना शब्द का प्रयोग क्यों किया गया था। जैसे बेहद बाहरी सुखों के सेवन की आदत को ही विलासिता, बाबुआना या शौकीनी कहते हैं वैसे ही अत्यन्त बाह्य-पवित्रता-प्रियता को आध्यात्मि [ २३ ]विलासिता कह सकते हैं। खाने-पीने सोने-बैठने के ढंग में जरा इधर-उधर होते ही सुकुमार पवित्रता में धक्का लग गया––ऐसा समझना आध्यात्मिक बाबुआना में ही शामिल है। और इसमें कोई सन्देह ही नहीं कि बाबुआना चाहे जिस तरह का हो उससे मनुष्यत्व का बल और वीर्य नाश हो जाता है।

यह बात अस्वीकार नहीं की जा सकती कि संकीर्णता और जड़ता दोनों ही बहुत कुछ निरापद हैं। और यह भी सच है कि जिस समाज में मनुष्य-प्रकृति का पूर्ण विकास और जीवन में गति है उस समाज को बहुत से उपद्रवों का सामना करना पड़ता है। जहाँ जीवन अधिक है वहाँ स्वाधीनता अधिक है और इसी कारण विचित्रता भी अधिक है। वहाँ भले और बुरे, दोनों की प्रबलता है। यदि मनुष्यों के नख और दाँत उखाड़ लिये जायँ, आहार कम कर दिया जाय और उन्हें दोनों वक्त चाबुक का डर दिखाया जाय तो एक प्रकार के चलने की शक्ति से शून्य अत्यन्त निरीह पालतू प्राणियों का दल पैदा हो जायगा; जीव-स्वभाव की विचित्रता एकदम मिट जायगी; और तब यह देखकर जान पड़ेगा कि भगवान्ने इस पृथ्वीमण्डल को एक भारी पिंजेड के रूप में बनाया है––जीव के रहने के लिए इसकी सृष्टि नहीं की।

किन्तु समाज-बालक की जो पुरानी धायें हैं वे समझती हैं कि मोटे ताजे तन्दुरुस्त लड़के नटखट होते हैं; वे कभी रोले-मचलते हैं, कभी कूदते फाँदते और दौड़ते हैं; कभी बाहर जाना चाहते हैं; वे बहुत हैरान करते हैं। इस कारण उन्हें जरासी अफीम की मात्री दे कर वे अफीम के नशे में मृतप्राय बनाकर रक्खे जाय तो फिर घर का कामकाज खूब निश्चिन्त होकर किया जा सकता है। [ २४ ]स्वाभाविक नियम के अनुसार समाज जितनी ही उन्नति करता है उतनी ही उसकी जिम्मेदारी और कर्तव्य की उलझन बढ़ती जाती है। यदि हम कहें कि हम इतना नहीं कर सकते, हममें इतना उ द्यम नहीं है, शक्ति नहीं है; यदि हमारे माता-पिता कहें कि हम बेटे बेटियों को उपयुक्त अवस्था तक मनुष्यत्व की शिक्षा देने में तो असमर्थ हैं, किन्तु मनुष्य के लिए जितना शीघ्र सम्भव है (यहाँ तक कि असम्भव भी कहा जा सकता है), हम माता-पिता बनने को तैयार हैं; यदि हमारे विद्यार्थी लोग कहें कि संयम हमसे नहीं हो सकता, शरीर और मनकी सम्पूर्णता प्राप्त करने की राह देखने में हम बिलकुल असमर्थ हैं, असमय में अपवित्र स्त्रीपुरुष-सम्बन्ध हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है, क्यों कि हिन्दूधर्म का यही विधान है––हम न उन्नति चाहते हैं, न झंझट चाहते हैं, हमारा इसी प्रकार बड़े मजे में काम चला जायगा; तो चुप रहने के सिवा इसका कुछ उत्तर ही नहीं है। परन्तु यह बात फिर भी कहनी ही पड़ती है कि हीनता को हीनता समझना भी अच्छा है किन्तु बुद्धि के बल से निर्जीवता या जड़ता को साधुता और असमर्थता को सर्वश्रेष्ठता साबित करना अच्छा नहीं। ऐसा करना सद्गति की राह में चारों ओरसे एकदम काँटे रूँध देने के बराबर हैं।

असल बात यह है कि यदि सर्वांगपूर्ण मनुष्यत्व के ऊपर हमको श्रद्धा और विश्वास रहे तो इतनी बात ही न उठे। तब तो अपने को कुछ कूट-कौशल-पूर्ण व्याख्याओंमें भुलाकर थोड़े से बाहरी संकीर्ण संस्कारों के घेरे में बंद हो रहनेकी प्रवृत्ति ही न हो।

जिस समय हमारी जाति वास्तव में एक जाति थी, उस समय हम भी युद्ध और बनिज-व्यापार करते थे; हमारा शिल्पकौशल उत्तम और [ २५ ]प्रसिद्ध था; हम देश-देशान्तरों में आते जाते और अन्य जातियों से अनेक विद्यायें सीखते और उनको सिखाते थे; हमारे पास दिग्विजय करनेवाला बल और विचित्र ऐश्वर्य था। आज इसको बहुत वर्ष बीत गये; इस समय और उस समय के बीच में अनेक उलट फेरों का अन्तर आ पड़ा है। आज हम समय के सीमान्त-प्रदेश में स्थित उसी भारतीय सभ्यता को, पृथ्वी से बहुत दूर पर स्थित एक तपस्या से पवित्र और होम-धूम-रचित अलौकिक समाधि-राज्य की तरह देख पाते हैं; और उसका मिलान अपने इस वर्तमान ठंडी छाँहवाले, कर्महीन, निद्रालस, निस्तब्ध गाँव के साथ करते हैं। किन्तु इस मिलान में यथार्थता कुछ भी नहीं है।

हमारी यह कल्पना निरी कल्पना ही है कि हमारे यहाँ केवल आ- ध्यात्मिक सभ्यता थी; उपवास करने से दुर्बल हुए हमारे सारे पूर्वपुरुष अलग अलग अकेले बैठकर अपने अपने जीवात्मा को हाथ में लिये उसे सान पर चढ़ाया करते थे––उसको कर्म से बिलकुल अलग रखकर अत्यन्त सूक्ष्म ज्योति की रेखा बना डालने की चेष्टा में लगे रहते थे।

हमारी उस सर्वाङ्गसम्पन्न प्राचीन सभ्यता को मरे बहुत दिन हो गये। हमारा वर्तमान समाज उसकी प्रेतयोनि मात्र है। अपने क्षीण अङ्गोंको देखकर हम अनुमान करते हैं कि हमारी पुरानी सभ्यता के भी इसी प्रकार शरीर का लेश भी न था; वह केवल एक छायामय आध्यात्मिकता थी। उसमें पृथ्वी-जल-अग्निका नाम भी न था; था केवल थोड़ा सा वायु और आकाश।

केवल महाभारत को पढ़ने से ही इस बात का पता लग जाता है कि हमारी उस समय की सभ्यता में जीवन का वेग कितना प्रबल था। [ २६ ]उसमें कितने ही समाजविप्लव और कितनी ही परस्परविरोधी शक्तियों की टक्करें देख पड़ती हैं। वह समाज किसी एक बड़े बुद्धिमान् कारीगर आदमी के हाथ का गढ़ा हुआ अत्यन्त सुन्दर सुसज्जित समतायुक्त 'कल' का समाज न था। उस समाज में एक तरफ लोभ, हिंसा, भय, द्वेष और असंयत अहङ्कार ने और दूसरी तरफ विनय, वीरता, आत्मत्याग, उदार महत्व और अपूर्व साधु-भाव ने मनुष्यचरित्र में हलचल डालकर उसे सजग सचेत बना रक्खा था। उस समाज में सभी पुरुष साधु न थे, सभी स्त्रियाँ सती न थीं और सभी ब्राह्मण तपस्वी न थे। उस समाज में विश्वामित्र ऐसे क्षत्रिय थे; द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और परशुराम ऐसे ब्राह्मण थे; कुन्ती ऐसी सती थीं; क्षमाशील युधिष्ठिर ऐसे राजा थे; शत्रुओं के रक्त की प्यासी तेजस्विनी द्रौपदी ऐसी रमणी थीं। उस समय के समाज में भलाई और बुराई, प्रकाश और अन्धकार आदि जीवन के लक्षण वर्तमान थे। उस समय का मनुष्यसमाज रेखा-चिह्नित, विभाग-युक्त, संयत और सिलसिलेवारनाशी के समान नहीं था। विप्लव के द्वारा क्षोभ को प्राप्त हुई विचित्र मनुष्य प्रवृत्तियों के घात-प्रतिघात के कारण, सदा जागते रहने की शक्ति से-परिपूर्ण उसी समाज में हमारी वह प्राचीन सभ्यता छाती फुलाये विशाल शाल वृक्ष की तरह सिर ऊँचा किये विराजमान थी।

उसी प्रबल वेगवाली सभ्यता को आज हम अपनी कल्पना से निपट निश्चेष्ट निर्विरोध निर्विकार निरापद और निर्जीव बताकर कहते हैं कि हम लोग वही सभ्यजाति हैं, हम लोग वही आध्यात्मिक आर्य हैं। हम लोग केवल जप तप करेंगे; दलबन्दी करेंगे और समुद्रयात्राको रोककर, दूसरी जातियों को अछूत बताकर, उस महान् हिन्दू-नाम को सार्थक करेंगे। [ २७ ]किन्तु इसके बदले यदि हम सत्य को प्यार करें, विश्वास के अनुसार काम करें, घर के लड़कों को ढेर के ढेर झूठ में डालकर गोल गोल गले की फाँसी न बनावें––बरन् उन्हें सत्य की शिक्षा से सरल, सबल और दृढ़ बनाकर सिर ऊँचा करके खड़ा कर सकें; यदि अपने हृदय में ऐसी अभिमानरहित उदारता की चर्चा कर सकें कि हम चारों ओर से शान और महत्त्व को नियम-पूर्वक सानन्द, सादर, संभाषण करके ला सकते हैं; यदि हम संगीत, शिल्प, साहित्य, इतिहास, विज्ञान आदि विविध विद्याओं की आलोचना और चर्चा करके, देश-विदेश में घूमकर, सारी पृथ्वी को रत्ती रत्ती छान––कर जाँच परतालकर और मन लगाकर निष्पक्ष भाव से विचार कर, अपने को चारों ओर से खोलकर विकसित कर ऊपर उठा सकें, तो, यह तो नहीं कहा जा सकता कि जिसे मैं 'हिन्दूपना' कहता हूँ वह पूरी तौर से टिकेगा कि नहीं, किन्तु यह अवश्य होगा कि प्राचीन काल में जो सजीव सचेष्ट तेजस्वी हिन्दू-सभ्यता थी उससे हमारा बहुत कुछ मेल हो सकेगा।

यहाँ पर मेरे जी में एक उपमा आती है। वर्तमान समय में भारत की प्राचीन सभ्यता खान के भीतर के पत्थर के कोयले के समान है। किसी समय जब उसमें घटने-बढ़ने और लेने-देने का नियम था तब वह बड़े भारी जंगल के रूप में जीवित थी। उस समय उस में वसन्त और वर्षा का सजीव समागम होता था, उसमें फल फूल और नव पल-बों का स्वाभाविक विकास था। इस समय उसमें वृद्धि या गति न होने पर भी वह हमारे लिए अनावश्यक नहीं हो गई है। उसके भीतर अनेक युगों की गरमी और प्रकाश छुपा हुआ है। किन्तु हमारे निकट वह अन्धकार मय और ठण्डी है। हम उससे केवल घोर काले अहंकार स्तम्भ बनाकर खेल करते हैं। इसका कारण यही है कि [ २८ ]अपने हाथ में अगर रोशनी नहीं है तो केवल अनुसन्धान के द्वारा प्राचीन काल की तह में गढ़ा खोदकर चाहे जितने खनिज पदार्थों के ढोके निकाल लाओ वे सब किसी काम के नहीं हैं। फिर हम उन्हें आप निकालते भी तो नहीं हैं; अँगरेज़ों की रानीगंज की आढ़त से खरीद लाते हैं। इसमें भी कोई चिन्ता नहीं; किन्तु हम करते क्या हैं? आग तो है नहीं, केवल फूंक मारते हैं और कागज हिला हिलाकर हवा करते हैं। कोई कोई ऐसे भी हैं जो उसपर सेंदुर पोत कर सामने बैठे भक्तिभाव से घंटा बजा रहे हैं।

हमको याद रखना चाहिए कि जब हममें सजीव मनुष्यत्व होगा तभी हम प्राचीन और आधुनिक मनुष्यत्व को, पूर्व और पश्चिम के मनुष्यत्व को अपने व्यवहार में––काम में ला सकेंगे।

मृत मनुष्य ही जहाँ का तहाँ पड़ा रहता है। जो जीवित है वह दशों दिशाओं में चलता-फिरता आता-जाता है। वह भिन्नता में ए-कता स्थापित करके परस्पर विपरीत भावों के बीच पुल बाँध सारे सत्य तक अपनी पहुँच कर लेता है––उस पर अपना अधिकार कर लेता है। वह एक ओर झुकने को नहीं, किन्तु चारों ओर फैलने को ही अपनी यथार्थ उन्नति जानता है।

  1. बंगाल में ब्राह्मण और शूद्र दो ही वर्ण हैं। इसीसे लेखक महाशय ने यहाँ उन्हीं दो का उल्लेख किया है।––अनुवादक।