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अतीत-स्मृति/५ प्राचीन मिस्र में हिन्दुओं की आबादी

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अतीत-स्मृति  (1930) 
द्वारा महावीरप्रसाद द्विवेदी
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५-प्राचीन मिस्र में हिंदुओं की आबादी
अतीत-स्मृति.pdf

बहुत लोगों का खयाल है कि प्राचीन काल के हिन्दू कूपमण्डूकवत् रहना बहुत पसंद करते थे। अर्थात् वे अपना घर छोड़ कर दूसरे देशो को जाने के बड़े विरोधी थे। पर यह खयाल भ्रममूलक है। न्यूयार्क, अमेरिका, के ए॰ डी॰ मार साहब ने "इंडियन रिव्यू" मे एक लेख लिखा है। उसमें उन्होने सिद्ध किया है कि साढ़े तीन हजार वर्ष पहले भारतवासी व्यापार आदि के लिए अन्य देशो मे केवल आते जाते ही न थे; किन्तु वे मिस्र मे जाकर बस भी गये थे।

मिश्र में सोने की ऐसी बहुत सी खाने है जो ईसा के पहले सोलहवीं, सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी में खोदी जाती थीं। उस समय पश्चिमी संसार में कोई देश, आबादी या व्यापार में, इतना बढ़ा हुआ न था कि उसको सिक्के चलाने की जरूरत पड़ती। असल बात तो है कि इतने प्राचीन समय का एक भी पश्चिमी सिक्का अभी तक नही मिला। पुराने से पुराना सिक्का जो मिला है, ईसा के पहले चौदहवीं शताब्दी का है। इसके विरुद्ध इस बात के दृढ़ प्रमाण मिलते हैं कि भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीन काल में भी खाने खोदी जाती थी और उनसे सोना निकाल कर सिक्के बनाए जाते थे। श्रुति, स्मृति आदि भारत के

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प्राचीनतम काल के साहित्य में भी अनेक प्रकार के सिक्कों के नाम आते है। यहां आबादी और व्यापार बढ़ने के साथ साथ सिक्कों और गहनों आदि के लिए सोने की मांग भी अवश्य ही बढ़ गई होगी। सम्भव है, यहां काफी सोना न मिलने से भारतवासी मिश्र की खानों से सोना लाकर अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते रहे हों।

इस बात के सबूत मिलते हैं कि मिश्र में पहले पहल लंकानिवासी समुद्र के रास्ते से अरब, अबीसीनिया या एथिओपिया गये। इनके बाद मलाबार, कच्छ, उड़ीसा और बंगाल की खाड़ी के आस पास के रहने वाले मिश्र पहुँचे। उत्तरी भारत के निवासी वेक्ट्रिया, सीरिया और एशिया माइनर होते हुए, उन लोगों के बहुत पीछे, अर्थात् ईसा के पहले तेरहवी शताब्दी में वहाँ पहुंचे। यद्यपि मिश्रवालों ने अपने इतिहास में भारतवासियों का जिक्र नहीं किया, यद्यपि उन्होने अपने इतिहास में अपने धर्मशास्त्र और अपनो वंशपरम्परा को स्वतंत्र रूप देने की चेष्टा की है, तथापि उनकी प्रत्येक बात से हिन्दुस्तानीपन टपकता है। पूर्वोक्त मार साहब ने बड़ी ही दृढ़ और अकाट्य युक्तियों से यह साबित कर दिया है कि हिन्दू लोग मिश्र में जाकर बसे थे और उन्हीं से मिश्रवालों ने सभ्यता सीखी।

मिश्रवाले अपने पहले राजा और धर्म-शास्त्र प्रणेता का नाम मीनस बतलाते हैं, जो हमारे मनु के सिवा और कोई नहीं। केवल मिश्रवालों ही ने नहीं, किन्तु उस समय की अन्य जातियों के [ ५१ ] भी मनु को मनिस, मनस, मनः, मन, मन्नु आदि नामों से अपना व्यवस्थापक माना है। मिश्रवाले कहते है कि मनु को हुए कोई ८६८४ वर्ष बीते। रोम और ग्रीस वाले भी अपने एक देवता को इतने ही साल का पुराना मानते है। डियोडोरस और जस्टिन आदि इतिहासकारों का कथन है कि यह देवता भारतवर्ष का है।

भारत और मिश्र के प्राचीन सम्बन्ध के अनेक प्रमाण पाये जाते हैं। मिस्र की एक प्राचीन जाति का नाम "दानव" है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि "दानव" शब्द पुराणों में सैकड़ों जगह पाया है। सत्ताईस सौ वर्ष पुराने काल्डिया के शिला लेखों से मालूम होता है कि भारत का व्यापार फारस की खाड़ी में खूब होता है। जिनाफन अपने ग्रन्थ में लिखता है कि ईसा के ६०० वर्ष पहले भारत का एलची, सीज़र बादशाह के दरबार में, गया था। उसके बाद भारत का व्यापार केवल मिश्र ही मे नही, किन्तु कार्थेज और रोम तक फैल गया था।

बड़े बड़े विद्वानों का कथन है कि भारतवर्ष ने साढ़े तीन हजार वर्ष पहले ज्योतिष मे खूब उन्नति कर ली थी। मिश्र ने सैकड़ो वर्ष पीछे भारतवासियों ही के द्वारा ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त किया। इस बात को डूपस नामक एक फ्रेंच विद्वान् ने बड़ी अच्छी तरह सिद्ध किया है।

मिश्र की इमारतें और गुफा-मन्दिर सब हिन्दोस्तानी ढंग के है। यही क्यों, एक साहब की तो राय है कि आयरलैंड के बुर्ज भी हिन्दोस्तानी काट-छाँट के हैं। [ ५२ ]मिश्र की कोई साढ़े तीन हजार वर्ष पुराना कब्रों में नील, इमली की लकड़ी और ऐसी ही अन्य कई चीजें मिली हैं, जो केवल भारतवर्ष में पैदा होती हैं। यूफ्रेटिस नदी के किनारे मघेर नामक स्थान की एक कब्र में सागौन की लकड़ी पाई गई है। वह ५००० वर्ष की पुरानी साबित हुई है। स्मरण रहे, सागौन के पेड़ हिन्दोस्तान के सिवा दुनिया में और कहीं नहीं होते। कई इतिहासकारों का मत है कि प्राचीन समय में मिश्र, रोम, ग्रीस और एशिया माइनर में ऐसी बहुत सी औषधियाँ और वनस्पतियाँ काम में आती थीं, जो केवल हिन्दोस्तान में उत्पन्न होती हैं।

प्राचीन भारत के सिक्कों के नाम भी मिश्र आदि कई पश्चिमी देशों में प्रचलित थे। जैसे माशा, सिकल, (सिक्का) दीनारस (दीनार) आदि। वहाँ की तौल-नाप के वाट आदि भी हिन्दोस्तान ही के समान थे। सबसे बढ़ कर विचित्र बात यह है कि यहाँ का रुपया इसी नाप, तौल और रूप में प्राचीन मेक्सिको में प्रचलित था।

प्राचीन मिश्रवाले हिन्दोस्तानियों ही के वंशज थे। मार्टन नाम के एक साहब ने अपने ग्रन्थ में एक जगह लिखा है कि मसाला लगे हुए मुद्रों की सौ में अस्सी खोपड़ियाँ आर्य्य-जाति की थीं। भारत के समान मिश्र वाले भी कई वर्षों में विभक्त थे।

एपोनस और प्लीनी आदि इतिहास-लेखकों का कथन है कि लौकी, नारंगी, इंजीर, नाशपाती, चावल और लोहा आदि कई चीजें भारत ही से मिश्र आदि देशों में गईं। [ ५३ ] मिश्र की बहुत सी जगहों के नाम-जैसे नील, शिव, एलीफेंटा और मेरु आदि बिल्कुल भारतवर्ष की नकल है। मासी साहब ने अपनी एक पुस्तक के परिशिष्ट में ऐसे ५६० शब्द दिये है जो संस्कृत और मिश्री, दोनो भाषाओं मे, एक ही से व्यवहृत हैं।

इन सब प्रमाणों से सिद्ध है कि प्राचीन काल में भारतवासी मिश्र मे जाकर अवश्य आबाद हुए थे और इन्हीं से मिश्र वालों ने सभ्यता सीखी।

[सितम्बर १९०८